श्रीलंका में ईस्टर रविवार को हुए चर्च और होटलों पर आत्मघाती हमले के बाद मुस्लिमों के खिलाफ नफरत की आग शांत होने का नाम नहीं ले रही है। इस हमले के लिए एक मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन नैशनल तौहीद जमात (NTJ) पर संदेह है। इस बीच, श्रीलंका में मुस्लिम समुदाय को हर कोई शक के घेरे में देख रहा है। 

खुद के ऊपर लगे इन्हीं सवालिया निशानों को मिटाने के लिए मदतुंगामा के मुस्लिम समुदाय ने नैशनल तौहीद जमात की एक मस्जिद को नष्ट कर दिया। मस्जिद प्रमुख M.H.M. अकबर खान ने बताया कि विदेशी संगठनों से फंड की वजह से मस्जिद पर सवाल खड़े हो रहे थे। कथित तौर पर इस मस्जिद का इस्तेमाल प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन तौहीद जमात (NTJ) के सदस्यों द्वारा किया जाता था। 

देश के हालात को देखते हुए मस्जिद की प्रशासन कमेटी ने फैसला किया कि गांव में दूसरी मस्जिद नहीं रहेगी। इस मस्जिद की उस शिलापट्टी को भी तोड़ दिया गया जिस पर अरबी अक्षरों में निर्माताओं के नाम लिखे थे। गांव वालों का कहना है कि उनके सिंहली पड़ोसियों के साथ लंबे वक्त से अच्छे रिश्ते रहे हैं और इलाके के मुस्लिम समुदाय ने एकमत होकर उनके विश्वास को जीतने के लिए मस्जिद तोड़ने का फैसला किया। 

श्रीलंका में मुस्लिमो के द्वारा तोड़ी गयी मस्जिद

मस्जिद के मुख्य ट्रस्टी एम.एच.एम अकबर खान ने कहा कि मस्जिद का इस्तेमाल NTJ द्वारा किया गया था जिसमें विदेशी फंड की मदद ली गई थी। उन्होंने कहा कि देश के वर्तमान हालात को देखते हुए वहां दो मस्जिदों की कोई जरूरत नहीं है। अकबर ने बताया कि आतंकी हमले के बाद पुलिस मस्जिद पर अक्सर आया करती थी। इससे हमारे और दूसरे समुदाय के बीच अविश्वास और ज्यादा बढ़ रहा था। 

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, मई महीने में पुरानी मस्जिद के एक सदस्य ने एक बैठक बुलाई, जिसमें तय हुआ कि सारे विवाद की जड़ इस मस्जिद को ही खत्म कर दिया जाए। मुस्लिमों ने अपने हाथों से इस मस्जिद को तोड़ दिया। 

हालांकि, इस कदम का विरोध भी हो रहा है। इस्लाम के धार्मिक मुद्दों पर मुख्य अथॉरिटी मानी जाने वाली संस्था सीलोन जमायतुल उलेमा का मानना है कि प्रार्थना की जगह को इस तरह तोड़ा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने एक बयान में कहा, ”सभी मस्जिदें अल्लाह की हैं, इसका प्रबंधन कौन कर रहा है, इसके इतर इसे नष्ट करना और नुकसान पहुंचाना इस्लाम के खिलाफ है।” 

अकबर खान कहते हैं, ”मस्जिद के विध्वंस के बाद हमारे प्रति दुश्मनी का रुख कम हुआ है। सिंहली और तमिलों ने पड़ोसी के रूप में हमारे साथ जुड़ना शुरू कर दिया है, इसने तनाव कम कर दिया है।” 

ईस्टर हमले के बाद श्रीलंका में अधिकतर मुसलमान खुद को एक दोषी की तरह महसूस कर रहे हैं जबकि ये भी एक सच्चाई है कि आत्मघाती हमले से उनका कोई लेना-देना नहीं था। कोलंबो में रह रहे इफहाम निजाम कहते हैं, आपको पता ही है कि हम मुस्लिम अपने धर्म का पालन करना कर्तव्य समझते हैं। लेकिन देश में डर और बेचैनी का ऐसा माहौल है कि हम अपनी हताशा बयां ही नहीं कर सकते हैं। वह कहते हैं, हम भी हमलों के बाद बहुत ही बुरा महसूस कर रहे हैं लेकिन ईसाई हमारे भाई हैं और जो कुछ भी हुआ, उसके लिए हम खुद को कसूरवार महसूस करते हैं। 

पूर्ण रूप से न सही परंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आंशिक रूप से ही सही ज़िम्मेदारी मुस्लिम समुदाय की बनती है। पिछले दिनों श्रीलंका में एक डॉक्टर गिरफ्तार किया गया जितने क़रीबन आठ हजार महिलाओं की डिलीवरी के बाद अगला बच्चा पैदा करने को ऑपरेशन करके खत्म कर दिया और किसी को इस काम की भनक भी नहीं लगने दी। आज अगर बौद्ध श्रीलंका को लगता है कि मुस्लिमों की गुपचुप तरीक़े से उनके देश पर गिनती बढ़ाकर क़ब्ज़ा करने की सोच थी तो पूरी तरह से ग़लत उनकी सोच को भी नहीं ठहराया जा सकता। बहुत सी घटनाएँ चर्च धमाकों के बाद रौशनी में आई हैं जो जाने अनजाने इसी तरफ इशारा करती हैं।