ईसाई प्रचारक टेरेसा मिशनरीज़ में जिस तरह मानवता को शर्मसार करने वाले गुनाहों की परत दर परत खुलती जा रही है, उसे पढ़कर ही कलेजा काँप जाता है। टेरेसा के नाम पर खुली ये मिशनरी कहने को तो ग़रीबों की सेवा और परोपकार के लिए थी पर सेवा की आड़ में यहाँ की नन और संयोजक जो गंदा खेल खेल रहे थे उसे जानकर ही खून खौल उठता है कि कैसे कोई इंसान इतना निर्मम और क्रूर हो सकता है।

टेरेसा मिशनिरिज के ख़ुलासे में पता चला कि किस तरह मजबूर लड़कियों से ज़बरदस्ती देह व्यापार कराया जाता था और फिर उनसे जन्मे बच्चों को नीलाम कर सबसे बड़ी क़ीमत लगाने वालों को दे दिया जाता था। इस तरह अब तक कुल 280 मासूमों का सौदा कर चुकी है ये धर्म का लबादा ओढ़ने वाली नने। मानवता और धर्म की आड़ में मदर टेरेसा मिशनरी वालों के इस गंदे पर सवाल उठने स्वाभाविक है। पर पाखंडी पत्रकार राजदीप सरदेसाई एक पत्रकार की तरह यहाँ पर मिशनरी से सवाल पूछने के बजाय चर्च और मिशनरी के बचाव में कूद पड़े।

ईसाई मिशन की ननों द्वारा बच्चा बेचने का यह मामला तो कई दिनो से सुर्ख़ियो में चल रहा था पर राजदीप ने इस टॉपिक पर अपना मुँह सिल रखा था और जब मुँह खोला भी तो एक ट्वीट से जहाँ वो मिशनरी द्वारा 280 बच्चों को बेचे जाने पर अचंभा जाहिर कर रहे है। उनका कहना है कि वो इस ख़बर से बड़े दुखी तो है पर

“कुछ लोगो के अपराधिक कृत्यों की वजह से मदर टेरेसा की विरासत या ईसाई धर्म ख़राब बताने की इजाज़त नहीं दी जा सकती”

वो इतने पर ही नहीं रुके इसके आगे उन्होंने मासूम बच्चों को अपमानित करने के लिए बेहद ही शर्मनाक तरीके से उनकी तुलना बाज़ार में बिकने वाली वस्तुओं से करते हुए पूछा कि “कल को अगर तिरूपती मंदिर में चोरी हो जाती है को क्या हिंदुत्व पर ऊँगली उठाना चाहिए।”

राजदीप सरदेसाई की नज़र में मंदिर में रखी वस्तुओं और जीते जागते मासूम बच्चों में कोई फ़र्क़ ही नहीं?

ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ कि राजदीप और उनके जैसे कई पत्रकारों ने मिशनरी का बचाव करने की कोशिश ना की हो। पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए है जहाँ राजदीप ने अपने हिंदू विरोधी होने को बार बार साबित किया है, और मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं कि राजदीप का ये हिंदू विरोध असल में उसके मोदी विरोधी होने का ही एक रूप है।

पत्रकारिता की आड़ में राजदीप अपना जातिवादी एजेंडा फैलाने से भी बाज नही आते, यहाँ तक कि जब लालू प्रसाद यादव को सज़ा होती है तो ये बोलते है कि लालू को मोदी विरोधी और पिछड़ी जाति का होने की वजह से सज़ा मिली हैं। मतलब इन्होंने देश की न्याय व्यवस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया।

जब ट्रेन में सीट की लडाई के ऊपर जुनैद मारा गया तो इसने उसकी मौत को गौ माँस से जोड़कर हिंदूओ को बदनाम करने की भरसक कोशिश की, जबकि बाद में यह अदालत ने माना की यह झगड़ा सीट को लेकर हुआ था जिसकी वजह से जुनैद मारा गया।

एक तरफ यह दादरी जैसी घटनाओं पर लोगो को आउटरेज करने के लिए उकसाते हैं, कहते हैं धर्म के नाम पर हुई हत्याओं के खिलाफ वह बोलेंगे और ऐसा करने वालो को एक्सपोज करेंगे।

पर वहीं जब बीजेपी से जुड़े दलित, मुस्लिम या कोई और मारा जाता है तो इसके साँप सूंघ जाता है। विरोध का एक शब्द तक नहीं निकलता इसके मुँह से, बल्कि ये सलाह देते है कि मृतकों के ऊपर राजनीति नहीं होनी चाहिए। विडम्बना देखिये इन्हें दादरी की हत्या में धर्म दिख जाता हैं पर प्रशांत पुजारी की हत्या इन्हें राजनीति से प्रेरित लगती हैं।

पाखण्डपना की पराकाष्ठा कहीं देखनी हो तो आप राजदीप सरदेसाई की ट्वीट पढ़ लीजिये, जहाँ हिंदुओं की बात होती है वहाँ ये ताबड़तोड़ सबको एक ही कठघरे में खड़ा कर देते है पर जब बात दूसरे धर्म के लोगो से जुड़ी हो तो ये हमें धर्म को बीच में ना लाने की सलाह देते है।

कठुआ रेप कांड में भी इन्होंने तथ्यों को तरोड़ मरोड़ कर पेश करके हुए हिंदू संगठनों पर रेपिस्ट के बचाव में आंदोलन करने का इल्ज़ाम लगा दिया। जबकि सच यह था की आंदोलन सीबीआई जांच के लिये खड़ा किया गया था और इस आंदोलन में महिलाये और छोटी बच्चियां तक शामिल थी। जिसे आप इस वीडियो में देख सकते हैं।

ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ राजदीप सरदेसाई के पत्रकार होने का छद्म रूप फिसल जाता है और उनका असली ज़हर भरा पाखंडी चेहरा नज़र आ जाता है। यहाँ तक कि राजदीप की अभी कुछ दिन पहले ही “फेक न्यूज़” चलाने के एक केस में जमानत मिली हुई हैं। आप इसी घटना से समझ लीजिए कि यह कितने विश्वासनीय पत्रकार हैं, बाकी “कैश फ़ॉर वोट” कांड तो आप सभी को पता होगा कि किस प्रकार से पत्रकारिता धर्म का पालन राजदीप ने किया था।

सबने देखा था कि जब मिशनरी कांड पर डिबेट हो रही थी तो राजदीप ने कैसे मिशनरी प्रवक्ताओं के बयानों की अपने शब्दों में विवेचना कर फ़ैसला दे दिया और कहा कि ऐसी एक दो घटनाओं की वजह से पूरी मिशनरी पर ऊँगली नहीं उठाई जा सकती पर ये so called “journalist” किसी एक हिंदू की वजह से पूरे हिंदू धर्म और किसी एक बीजेपी सपोर्टर की वजह से PM पर जब चाहे तब ऊँगली उठा सकते है। इनकी हिप्पोक्रेसी देखकर यही लगता हैं जब सैकड़ो हिप्पोक्रेटस मरते होंगे तब जाकर राजदीप सरदेसाई जैसे पाखंडी पत्रकार इस दुनिया में अवतरित होते होंगे।

ट्विटर पर भी लोग इनके इस डबल स्टैंडर्ड का मजाक उड़ा रहे हैं देखिये कुछ ट्वीट।