लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आ चुके हैं। बीजेपी ने एक बार फिर 2014 से भी बड़ी जीत प्राप्त की है। इस चुनाव में कांग्रेस के तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, आदि कई दिग्गजों ने अपनी सीट गंवा दी। सबसे ज्यादा चर्चा जिसकी जीत की हो रही है, वो है स्मृति ईरानी के जीत की। स्मृति ईरानी अमेठी से राहुल गांधी को 54731 मतों से हराकर विजयी हुईं हैं। बता दें कि राहुल गांधी इस सीट से 2004 से लगातार तीन बार सांसद रह चुके थे।

लेकिन इन सब के बीच एक ऐसे शख्स ने भी इतिहास रचा है, जो पूर्व में कांग्रेस पार्टी के जिला स्तर का एक कार्यकर्ता मात्र था। उस शख्स का नाम है- डॉ. कृष्णपाल सिंह यादव। केपी यादव ने मध्यप्रदेश के गुना लोकसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के कद्दावर नेता एवं सीटिंग एमपी ज्योतिरादित्य सिंधिया को रिकॉर्ड मतों से हराकर इतिहास रच दिया है। आपको मालूम होगा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस पार्टी का एक ऐसा नाम है, जो अपनी रणनीति, लोकप्रियता एवं संसद में दमदार भाषण के लिए जाना जाता है। यह सीट 2002 से ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं उसके पहले उनके पिता माधवराव सिंधिया के पास रही है। यानी दो दशक से भी ज्यादा समय से यह सीट कांग्रेस के पास रही है, जिससे इसे पार्टी के लिए कवच माना जाने लगा।

इस बार भाजपा प्रत्याशी डॉ. केपी यादव ने ज्योतिरादित्य को 124750 मतों से हराकर ‘सिंधिया’, परिवार का किला उखाड़कर फेंक दिया। इस सीट को भाजपा के लिए जीतना उतना आसान नहीं था, जितना जीतने के बाद लग रहा है। 2014 में मोदी लहर के बावजूद भी बीजेपी इस सीट पर अपना परचम नहीं लहरा सकी थी। लेकिन इस चुनाव में सिंधिया को उन्हीं की पार्टी के पूर्व कार्यकर्ता ने बुरी तरह हराकर लगभग 2 दशक से भी ज्यादा समय के बीजेपी के सूखे को खत्म कर दिया। 1956 के बाद यह पहली बार है, जब सिंधिया परिवार का कोई सदस्य चुनाव हारा है।

कौन हैं केपी यादव?

दरअसल, केपी यादव पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर हैं।यह कोई बहुत बड़ा नाम नहीं है। चुनाव जीतने से पहले तक इन्हें पार्टी का कोई प्रदेश स्तर का नेता भी नहीं जानता होगा। ये पहले कांग्रेस पार्टी के जिले स्तर के कार्यकर्ता थे एवं पार्टी के लिए नि:स्वार्थ भाव से कार्य करते थे। उनके पिता भी कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। केपी यादव एक समय ज्योतिरादित्य के बहुत करीब थे एवं उन्होंने 2014 में उनके चुनाव जीतने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन एक बार जब वो सिंधिया की गाड़ी के पास आए और उनके साथ सेल्फी लेने की इच्छा जताई, तब सिंधिया ने अहंकारी स्वभाव दिखाते हुए उन्हें झिड़क दिया और अपनी गाड़ी का दरवाजा नहीं खोला।

इसके अलावा 2018 के मुंगावली विधानसभा के उपचुनाव में यादव को टिकट मिलना लगभग तय था। सिंधिया ने भी उन्हें तैयारी करने के लिए कह दिया, जिससे वो अपने प्रचार में जुट गए। लेकिन पार्टी ने ऐन वक्त पर उनको धोखा दे दिया। इससे यादव काफी नाराज हुए और उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद लोकसभा चुनाव के बीजेपी के टिकट वितरण के सिलसिले में जब राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गुना गये थे, तब अचानक केपी यादव ने आकर उनसे कहा कि वो कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं और ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ चुनाव लड़ना चाहते हैं। चाहें वो गुना से लड़ें या ग्वालियर से। अमित शाह के पूछने पर यादव ने बताया कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी को 20 साल दिए हैं, लेकिन उनके मेहनत की कद्र नहीं की गई। उन्होंने अमित शाह के साथ अपने साथ घटित हुई सेल्फी वाली घटना का भी जिक्र किया।

बस अमित शाह ने उस व्यक्ति के मेहनत को भांप लिया और तुरंत ही उन्हें गुना से प्रत्याशी घोषित कर दिया। नतीजा यह हुआ कि महाराजा कहे जाने वाले सिंधिया को 1 लाख से भी ज्यादा के मतों के अंतर से मुंह की खानी पड़ी। यह पिछले तीन सालों में यादव की कड़ी मेहनत का फल ही था कि उन्हें ज्योतिरादित्य को टक्कर देने में कोई समस्या नहीं हुई।

आपको एक बात और बता दें। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने अहंकार के लिए भी जाने जाते हैं। उनका स्वभाव हमेशा अहंकारी रहता है। इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि जुलाई 2018 में जब सिंधिया बुंदेलखंड यात्रा पर पहुंचे तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उन्हें सिंदूर लगा हुआ नारियल भेंट किया। बाद में वापस लौटते समय थोड़ी दूर आगे जाकर उन्होंने उस नारियल को अंधविश्वास के चलते नीचे सड़क पर फेंक दिया। जिसके बाद काफी विवाद हुआ था।