ऑल इंडिया मुस्लिम लॉ बोर्ड (AIMPLB) की ओर से देश में हर जिले में शरिया अदालतें (दारुल कजा) खोलने की योजना बनाई गई हैं। मुस्लिम लॉ बोर्ड के इस फैसले के खिलाफ बीजेपी से लेकर सपा तक खड़ी हो गयी हैं।बीजेपी का मानना है कि देश के गांवों और जिलों में शरिया अदालतों का कोई स्‍थान नहीं है, वहीं सपा कहती है कि देश में एक संविधान है और उसी का पालन होना चाहिए।

बहरहाल, हम आपके सामने शरिया अदालतों से दिए हुए कुछ चर्चित फैसले और फतवों के बारे में बताना चाहते हैं, ताकि आपको पता चल सके कि दुनिया में इस तरह की अदालतें कैसे काम करती हैं? और क्या यह एक सभ्य समाज के लिए जरूरी हैं?

उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर की इमराना के साथ उसके 69 वर्षीय ससुर ने बलात्कार किया था। छह जून 2005 को हुई यह घटना उस समय चर्चा में आई थी जब अल्पसंख्यक समुदाय पंचायत ने फरमान जारी किया था कि बलात्कार के बाद इमराना को अपने पति को अपना बेटा मानना होगा क्योंकि उसका निकाह खारिज हो चुका है। पंचायत के इस आदेश के बावजूद इमराना ने कूकरा गांव में अपने पति नूर इलाही के साथ रहना जारी रखा था। अभी कल की ही एक खबर है कि किसी ने हलाला करवाने के लिये अपने पिता से हलाला करवाया यानि बहू का हलाला ससुर ने किया। पाकिस्तान के एक गांव में मुख्तारन माई नाम की एक मुस्लिम लड़की के भाई ने गांव की किसी लड़की के साथ बलात्कार किया जिसके एवज में पंचायत ने शरीयत के आधार पर यह फैसला सुनाया कि सारे पंच सजा के तौर पर मुख्तारन के साथ बलात्कार करे, यह मसला अंतराष्ट्रीय सुर्खियों में छाया रहा था।

शरई कानूनों को मानने वाले मुल्क सऊदी अरब से कुछ साल पूर्व एक मजेदार घटना सामने आई। अरब में शरीयत कानून लागू है जिसके अंदर ये प्रावधान है कि पीड़ित व्यक्ति अपराधी के लिये भी उसी सजा की मांग कर सकता है जो उसके साथ घटित हुई है। वहां की एक घटना है, किसी ने एक आदमी को छुरे के वार से घायल कर दिया जिसके कारण वो व्यक्ति लकवा का शिकार हो गया, अब वो शरीयत कानून का हवाला देकर ये मांग कर रहा है कि उसे लकवाग्रस्त करने वाले को भी लकवाग्रस्त किया जाये। अदालत उसकी इस मांग पर हाथ बांध कर खड़ी है, क्योंकि डॉक्टरों के अनुसार कृत्रिम तरीके से अगर उसे लकवाग्रस्त किया गया तो उसके जान जाने का खतरा है। सारी दुनिया के मीडिया इस मुद्दे पर लाचार सऊदी सरकार का मजाक बना रही हैं। इस्लाम का मजाक बनाने वाले शरई फरमानों की ऐसी दसियों मिसालें इतिहास में भी दफ़न हैं और आज भी हो रही है।

मलेशिया में महाथिर मोहम्मद की सरकार जब चल रही थी तब वहां की जनता ने ‘सर्वइस्लामवाद’ का प्रचार करने वाली पार्टी “ऑल मलाया मुस्लिम पार्टी” का बहिष्कार किया था और इसके साथ ही वित्त मंत्री अनवर इब्राहीम के नेतृत्व में चलाये जनजागरण अभियान का लोगों ने भरपूर स्वागत किया जिसमें यह कहा जाता था कि “इस्लाम शरीयत नहीं है, वह तात्कालिक अरब समाज का कानूनी विधान था जो आज कालवह्य हो चुकी है। भूख, गरीबी, रोजगार की बात न कर कर शरीयत में उलझाये रखना गरीब मुसलमानों को गुमराह करना है और इस कानून को आज के इस युग में लागू करने की मांग केवल और केवल दुनिया में मलेशिया का मजाक बनवायेगा।”

मलेशिया की तरह ऐसी ही अक्ल और कई मुल्कों को भी आई। अल्जीरिया में इसी तरह शरीयत के स्थान पर काल सापेक्ष कानून लाने को लेकर अंतद्वंद चला। ईरान और तुर्की ने शरीयत शब्द को ही शब्दकोष से निकाल फेंका था। अल्बानिया विश्व का प्रथम मुस्लिम देश था जिसने शरीयत कानूनों से तंग आकर खुद को नास्तिक मुल्क घोषित किया था और शरीयत को बिलकुल ठुकरा दिया था।

आज पाकिस्तान समेत दुनिया के कई इस्लामी देश परिवार नियोजन को कानूनी मान्यता दे रहें हैं जो शरीयत के खिलाफ है। इतना ही नहीं इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान में ही शरीयत कानून के लागू करने को लेकर द्वंद चल रहा है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की मांग पर भारत के मुस्लिम समाज ये सोचना था कि आखिर शरीयत अगर इतना ही दैवीय विधान है तो क्यों एक भी मुस्लिम मुल्क ऐसा नहीं है जिसने यथारूप में शरीयत को लागू किया है और आखिर क्यों शरीयत कानूनों को मुसलमान मुल्कों में ही स्वीकार्यता नहीं मिल रही है? अगर वहां उन्हें स्वीकार्यता नहीं मिल रही है तो फिर भारत जैसे गैर-इस्लामी मुल्क में उसे लागू करवाने की मांग करना क्या जहालत नहीं है?

आखिर कोई तो वजह होगी जिसने Divine माने जाने वाले इस कानून के खिलाफ धार्मिक मुसलमानों को ही दुनिया भर में आवाज उठाने पर मजबूर किया? इस्लामी तारीख गवाह है कि मौलानाओं के द्वारा गढ़े गये शरीयत कानून ने न जाने कितने मासूमों की जिंदगियां तबाह की। इस कानून की ज्यादातर शिकार महिलायें हुई हैं। पुरुष केंद्रित समाज के लिये शरीयत और कुछ नहीं बल्कि महिलाओं का हक छीनने का हथियार है।

आपको शायद पता नहीं है कि आज पूरे विश्व में शरीयत के विषय और इसे बार-बार उसी मूल रुप में लागू किये जाने की कट्टरपंथियों की मांग ने इस्लाम और मुसलमानों की छवि जड़वादी, रुढिवादी और दकियानूस की बना दी है जिसके बारे में ये समझा जाने लगा है कि दुनिया आगे की चलती है तो मुसलमान पीछे की ओर जातें हैं। बदलाव और सुधार वक्त की जरुरत होती है और “मानव जीवन विधान” नदी की तरह होतें हैं, जो इसको नहीं समझता वो ठहरे हुये पानी की तरह हो जाता है जिससे सिवाये सड़न और बदबू के कुछ हासिल नहीं हो सकता और लोग भी जिसके किनारे दम घुटता हुआ महसूस करतें हैं। मौलानाओं की जरुरत से ज्यादा दखलंदाजी, निजी जीवन के मसलों में उनके घुसपैठ, हर बात की अपनी मनमानी व्याख्या ने मुसलमानों की जिंदगी को तो घुटन बनाया ही है साथ ही साथ उन्हें उन्हें अपने जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने भी नहीं दे रहें और तो और अपने हमवतनों के बीच भी उनकी छवि हास्यापद बना रहें हैं तथा मीडिया को मौके दे रहें कि वो चटकारे ले लेकर इन खबरों को परोसे।

मौलाना आजाद ने सही कहा था,  “मुफ्ती की कलम हमेशा से मुस्लिम आतताईयो की साझीदार रही है और दोनों ही तमाम ऐसे विद्वान और स्वाभिमानी लोगों के कत्ल में बराबर के जिम्मेदार हैं जिन्होनें इसकी ताकत के आगे सर झुकाने से इंकार कर दिया।“

शरीयत कानूनों की युगानुकुल व्याख्या हो, इस्लामी धर्मविधानों का वर्तमान विधानों के साथ सामंजस्य बिठाया जाये और मुसलमान जिस मुल्क में रहतें हैं उसके विधानों के अधीन जिंदगी गुजारने की कोशिश आरंभ करें, यही मुसलमानों के हक में सबसे सार्थक बात होगी।