कर्नाटक सरकार ने ‘कर्नाटक इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट रूल्स, 1961’ में संशोधन करने का निर्णय लिया है ताकि निजी क्षेत्रों में ग्रुप C और D की नौकरियों में कन्नड़ लोगों को प्राथमिकता देगी।

ये सब 1984 में बनी सरोजिनी महिषी समिति की रिपोर्ट के आधार पर किया जा रहा है। आइये एक नजर इस रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर नजर डालते हैं:

1. राज्य सरकार के सभी सरकारी विभागों तथा सरकारी उपक्रमों में कन्नड लोगों को 100% आरक्षण दिया जाये।

  1. केंद्र सरकार के सभी विभागों तथा सरकारी उपक्रमों की ग्रुप सी व ग्रुप डी नौकरियों में कन्नड लोगों के लिए 100% आरक्षण।

  2. केंद्र सरकार के सभी विभागों तथा सरकारी उपक्रमों की ग्रुप बी नौकरियों में कन्नड लोगों के लिए न्यूनतम 80% आरक्षण।

  3. केंद्र सरकार के सभी विभागों तथा सरकारी उपक्रमों की ग्रुप ए नौकरियों में कन्नड़भाषी के लिए 65% आरक्षण।

जैसा कि रिपोर्ट के मुख्य सुझावों को देखकर ही लग रहा है कि इसमें कितना पूर्वाग्रह भरा हुआ है। योग्यता को दरकिनार करके केवल एक क्षेत्र विशेष में पैदा होने का फायदा देने की अनुशंसा की जा रही है। आपकी जानकारी के लिए बता दें, कन्नड़ केवल उन्हीं लोगों को माना जायेगा जो कन्नड़ भाषा पूरी तरह लिख, बोल और पढ़ सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति कर्नाटक में 15-20 वर्ष से रह रहा है लेकिन कन्नड़ भाषा पूरी तरीके से नहीं आती है तो वो इसका लाभ नहीं ले सकेगा।

भारत का एक ही ध्वज है – तिरंगा; इसके बावजूद कर्नाटक में अपना अलग ध्वज बनाया गया। भारतीय संविधान ने हमें कभी भी रहने, बसने और अपना व्यवसाय शुरू करने की स्वतंत्रता दे रखी है इसके बावजूद भाषायी स्तर पर भेदभाव किया जा रहा है। देश में जब 15वें वित्त आयोग की बात चल रही थी तो कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अलग द्रविड़नाडु बनाने की धमकी दी थी। हिंदुओं से लिंगायतों को अलग कर दिया गया। ये सब जानबूझकर किया जा रहा है।

यदि आज कर्नाटक में बंगलौर जैसे शहरों का इतना विकास हुआ है तो इसमें देशभर के लोगों का योगदान रहा है तो क्या इस तरह कदम सभी लोगों में भेदभाव पैदा नहीं करेंगे? जो निजी कंपनियां अभी कर्नाटक में है प्रदेश सरकार अगर उनको ऐसा करने के लिए बाध्य करती है तो क्या वह राज्य छोड़कर कहीं और जाने पर भी विचार करेंगी? ऐसे तमाम प्रश्न हैं जिनके बारे में भविष्य ही बताएगा लेकिन अभी के लिए कर्नाटक सरकार का ये प्रयोग कितना कारगर रहेगा ये देखना जरूरी इसलिए भी है क्योंकि कर्नाटक की देखादेखी दूसरे राज्य भी ऐसे कदम उठा सकते हैं जिससे आने वाले समय में देश में भेदभाव बढ़ने की प्रबल आशंका है।