पिछले दिनों महाराष्ट्र के एक मेडिकल कॉलेज ‘नायर हॉस्पिटल’ की छात्रा पायल तड़वी ने आत्महत्या कर लिया। पायल के वकील का आरोप है कि तीन सीनियर छात्राओं ने पायल पर जातिगत टिप्पणी की थी, जिससे क्षुब्ध होकर उसने आत्महत्या कर ली। पुलिस ने आरोपित तीनों डॉक्टर्स हेमा आहूजा, भक्ति मेहरे और अंकिता खंडेलवाल को गिरफ्तार कर बुधवार (29 मई) को कोर्ट में पेश किया, जहां कोर्ट ने उन्हें शुक्रवार (31 मई) तक पुलिस कस्टडी में भेज दिया। पुलिस मामले की जांच कर रही है।

अब जब से मीडिया में रिपोर्ट आई है कि जातिगत टिप्पणी के कारण पायल ने आत्महत्या की है, तब से देश के स्वघोषित बुध्दिजीवी एवं दलित चिंतक नींद से जाग उठे हैं। जातिगत नफरत का फैलाने का दौर एक बार फिर शुरू हो चुका है। तथाकथित दलित हितैषी संगठन एवं समाजसेवकों ने इस घटना की आड़ में एक जाति एवं एक पार्टी विशेष के खिलाफ अपना एजेंडा फिर से सेट कर लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पायल का एडमिशन आरक्षित कोटे से हुआ था, इसलिए उसके सीनियर उस पर जातिगत टिप्पणी करते थे।

बहरहाल, इस केस में धीरे धीरे कुछ ऐसे तथ्य आ रहे हैं, जिससे इस केस पर कुछ सवाल उठना स्वाभाविक है। पहला, जिस पायल तड़वी को जातिगत टिप्पणी की वजह से खुदकुशी करने की बात कही जा रही है, उसके व्हाट्सएप चैट डिटेल से यह बात सामने आ रही है कि आरोपित डॉक्टर्स को उसकी जाति के बारे में कुछ पता नहीं था। ये बात खुद पायल ने अपनी मां को व्हाट्सएप पर बात करते हुए बताई थी। पायल ने अपनी मां से कहा था, “मैं जब खुदकुशी कर लूं, तो मेरी जाति को बीच में मत घसीटना। मेरी जाति कोई नहीं जानता है और किसी ने जाति को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की।” पायल ने अपनी मां को सीनियर डॉक्टर्स द्वारा प्रताड़ित करने की बात कही थी, लेकिन जाति को लेकर बात नहीं कही। फिर भी गिरफ्तार डॉक्टर्स पर दलित एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

पायल तड़वी की व्हाट्सएप चैट  (फोटो- नवभारत टाइम्स)

दूसरा, जिस पायल तड़वी को दलित बताया जा रहा है, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं। एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार, पायल की मां का नाम आदीबा सलीम और पिता का नाम सलीम है। सेकेंड ईयर में पढ़ने वाली पायल की शादी असिस्टेंट प्रोफेसर सलमान से हुई थी। माता-पिता के नाम से यह पता चलता है कि पायल हिंदू नहीं, बल्कि मुस्लिम है।

तीसरा, आरोपित तीन डॉक्टर्स में से एक डॉक्टर भक्ति मेहरे भी अनुसूचित जाति से संबंध रखती हैं और उन्हें जातिगत कोटे से ही कॉलेज में प्रवेश मिला है। तीनों आरोपियों का कहना है कि जब पायल की मौत का पता चला तो उन्होंने डीन का रूख किया, लेकिन डीन ने उन्हें अपना बयान दर्ज कराने के लिए पुलिस के पास जाने को कहा।

दूसरी तरफ, बचाव पक्ष के वकील आबाद पोंडा ने अदालत में दलील दी कि तीनों डॉक्टर्स को तड़वी की जाति के बारे में पता भी नहीं था। उन्होंने कहा, “आत्महत्या के लिए तब उकसाया जाता है, जब कोई जानबूझकर व्यक्ति को नुकसान पहुंचाना चाहता है। लेकिन आरोपियों ने (इस मामले में) केवल उनके काम के लिए उन्हें डांटा था और उनको नुकसान पहुंचने की उनकी कोई मंशा नहीं थी।”

उपर्युक्त तीनों बिंदुओं पर गौर करें, तो यह मामला रैगिंग का लगता है। कॉलेजों में रैगिंग की समस्या एक बड़ी समस्या है। सरकार द्वारा इस पर प्रतिबंध और इसके खिलाफ कड़ा कानून बनाने के बाद भी रैगिंग रुक नहीं रही है। रैगिंग के दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन हमारे देश के तथाकथित दलित हितैषी इस मामले को जबर्दस्ती दलित से जोड़ने की हर कोशिश कर रहे हैं। एक रैगिंग और सामान्य प्रताड़ना की घटना की जाति का रंग दे दिया गया है। ठीक वैसे ही, जैसे रोहित वेमुला आत्महत्या केस में किया गया था। रोहित वेमुला केस में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एके रूपनवाल ने अपनी जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट कर दिया था कि रोहित ना ही दलित और ना ही आदिवासी। उसने निजी कारणों के कारण आत्महत्या की थी। इसी तरह पायल तड़वी केस में अभी तक सामने आई रिपोर्ट्स और जानकारी के आधार पर पायल ना ही दलित है और ना ही आदिवासी।

लेकिन एजेंडा चलाने के लिए पूरी असहिष्णुता जमात एक बार फिर से उठ खड़ी हुई है और इस केस में फैसला कर चुकी है। बस आरोपी इनके हाथ में नहीं हैं, वरना अभी आरोपियों को सजा भी मिल चुकी होती। आज दलित हितैषी का मुखौटा लगाए हुए तथाकथित बुध्दिजीवी हाल ही में उत्तर प्रदेश के मैनपुरी, मथुरा की घटना और वर्ष 2018 की राजस्थान के बीकानेर की घटना पर मौन धारण किए हुए थे, क्योंकि इन घटनाओं में आरोपी मुस्लिम समुदाय से संबंध रखते थे। इस जमात को अगर इनके एजेंडे के मुताबिक कोई केस मिल गया, तो ये लोग एक झटके में फैसला कर देते हैं और अगर इसका उल्टा हुआ तो उस केस को झूठा सिद्ध करने में जमीन आसमान एक कर देते हैं।

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