लगभग ₹5920 करोड़ की लागत से बनकर तैयार हुआ ‘बोगीबील’ पुल आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश ने समर्पित किया।

आइए इसकी विशेषताओं पर एक नजर डालते हैं :
1. लंबाई : 4.94 किलोमीटर
2. ये ब्रम्हपुत्र नदी पर बना चौथा और सबसे लंबा पुल है। बाकी के तीन पुल हैं : पंडु सरायघाट, कोलिया ब्जम्बूरागुरी और नारायनसेतु।
3. ये देश का चौथा सबसे लंबा पुल है।
4. ये डिब्रूगढ़ को धेमाजी से जोड़ेगा।
5. ये डबल डेकर ब्रिज है यानि इसपे ट्रेन और गाड़ियां एक साथ चलेंगी। नीचे डबल लाइन ट्रेन ट्रैक है और ऊपर थ्री लाइन रोड।
6. अगर ट्रेन से यात्रा की बात की जाए तो डिब्रूगढ़ से ईटानगर जाने वाली ट्रेन की दूरी 700 किलोमीटर तक कम हो जाएगी।
7. ये पुल गैमन इंडिया, हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी और DSD जर्मनी ने मिलकर बनाया है।
8. दमदार नींव और 42 खम्बों से बना हुआ ये पुल इंजिनीरिंग का अद्भुत नमूना है।
9. सड़कमार्ग की बात करें तो इसका इस्तेमाल करके असम से अरुणाचल जाने में करीब 400 किलोमीटर की दूरी कम हो गई। सामरिक दृष्टि से ये महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अब आर्मी के सभी उपकरण अरुणाचल में भारत-चीन सीमा तक 12 घण्टे पहले पहुँच जाएंगे।

लेकिन ये पुल बनना इतना आसान नहीं था, सरकारों ने हमेशा की तरह उत्तर-पूर्वी राज्यों की अनदेखी की। आइए घटनाक्रम पर नजर डालते हैं :
1. सन 1977 को डिब्रूगढ़ सिटीजन फोरम के सदस्य प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को इस पुल निर्माण के सुझाव का एक ज्ञापन सौंपते हैं।
2. दो दशक निकल जाते हैं, दिल्ली से इसपर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।
3. 1996 में चुनावों के तुरंत बाद असम गण परिषद के पांच सांसद विस्तार से डिब्रूगढ़ को धीमाजी से जोड़ने वाले पुल प्रोजेक्ट की रिपोर्ट पेश करते हैं।
4. ₹2000 करोड़ की प्रस्तावित लागत वाले पुल का प्रोजेक्ट इसलिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है क्योंकि रेलवे बोर्ड को लग रहा था कि ये असम जैसे छोटे राज्य के लिए बहुत महंगा पड़ेगा।
5. HD देवगौड़ा की कैबिनेट में AGP के दो मंत्री थे : इस्पात एवं खनन मंत्री बीरेंद्र प्रसाद वैश्य और राज्यमंत्री मानव संसाधन एवं विकास, मुहिराम सैकिया। दौनों मंत्री देवगौड़ा और तत्कालीन रेलमंत्री रामविलास पासवान से मिलते हैं लेकिन फिर भी उनको बुरी तरह नकार दिया जाता है और 1996 के बजट से ये पुल हट जाता है।
6. भारी विरोध के बाद आखिरकार सरकार झुक जाती है और रामविलास पासवान एक पुल निर्माण की घोषणा मीडिया ब्रीफिंग के दौरान करते हैं। आखिरकार 22 जनवरी, 1997 को धीमाजी में प्रधानमंत्री देवगौड़ा उद्घाटन करते हैं।
7. उद्घाटन होने के बावजूद कोई काम न हो सका और उसके बाद सन 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने दोबारा उद्घाटन करके काम की शुरुआत करवाई।
8. इसके कुछ साल बाद सरकार फिर बदली और समय से बजट न मिल पाने के कारण इसके काम पर भी असर पड़ा। सन 2014 में मोदी सरकार आने के बाद इसके काम की रफ्तार फिर बढ़ी और आखिरकार आज से ये नागरिकों के लिए खोल दिया गया।
9. UPA सरकार के ढुलमुल रवैये के कारण इस प्रोजेक्ट की लागत जहां ₹1,767 करोड़ होती वहीं आज ये ₹5,920 करोड़ हो गई है।

सोचिए, यदि ये पुल पहले बन चुका होता तो चीनी सैनिक अरुणाचल प्रदेश में हमारी सीमा में कभी भी घुसपैठ करने की हिम्मत न करते। मोदी सरकार ने इसे रोकने के लिए ब्रह्मोस मिसाइल को तैनात किया और अब बेहतर कनेक्टिविटी के लिए पुल निर्माण के लिए प्राथमिकता दी।

हालांकि NDTV जैसे न्यूज़ चैनल इस पुल निर्माण से काफी आहत नजर आ रहे हैं, अच्छे कामों में भी इन्हें बेवकूफी भरी कमियां ढूंढनी हैं।

वहीं जब पुल नहीं होता है तो NDTV वाले जागरूक पत्रकार ऐसे कोसते हैं :

अति विशिष्ट मस्तिष्क के स्वामी NDTV के पत्रकारों से इसी तर्क के आधार ये पूछना चाहिए कि TV आने के बाद दैनिक पत्रकार क्या बरोजगार हो गए थे? यदि नहीं तो फिर ये लोग बेरोजगार कैसे हो जाएंगे? रोजगार तकनीकी के साथ बदलता रहता है। ई-रिक्शा ने साईकल रिक्शे का स्थान ले लिया है और पहले साईकल रिक्शा ने हाथ से खींचने वाले रिक्शे की जगह ली थी लेकिन लोग बेरोजगार नहीं हुए बल्कि जमाने के साथ ढल गए। विकास यही है, बदलाव थोड़े दिन के लिए जरूर असर करता है लेकिन लंबे समय के लिए लोगों की भलाई ही करता है, उम्मीद है जागरूक पत्रकार इसे समझेंगे।