ईद सभी के लिए भाईचारे, प्रेम और सद्भाव का एक अवसर है। चूंकि मुस्लिम त्यौहार पीईटीए (PETA) और एनजीटी (NGT) प्रतिबंधों की सूची में नहीं है, इस पर कैसे क्या करें और कैसे त्यौहार मनाया जाए जैसे निर्देश लागू नही होते, हम हर जगह प्यार, भाईचारा के संदेशों में सच्चापन होता है।

हालांकि, कुछ प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों ने भाईचारे फैलाने की कोशिश में कुछ ज्यादा ही आगे चले गए। इन बुद्धिजीवियों ने एक ‘पेंटिंग’ साझा की, जिसका अर्थ वह नहीं था जो कुछ बुद्धिजीवियों ने दिखाना चाहा।

चित्रकला साझा करने वाले इन सभी लोगों में से कुछ ने दावा किया कि यह 16 वीं शताब्दी की चित्रकला है और कुछ ने दावा किया कि यह 18 वीं शताब्दी की चित्रकला है। तथाकथित प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों ने यह भी दावा किया कि यह चित्र दिखाता है कि भगवान  श्री कृष्ण ने ईद के चंद्रमा को मुसलमानों के समूह में इंगित किया था। सांस्कृतिक सहिष्णुता और समावेश के सभी मानकों पर तथाकथित बुद्धिजीवियों इस पेंटिंग को खरा पाया।

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हालांकि, इसकी प्रामाणिकता पर कई लोगों ने प्रश्न उठाए। जैसा कि पेंटिंग के विषय में चर्चा जारी रही, सूचना सामने आई कि वास्तव में यह पेंटिंग 24 मई 2015 को स्वराज्य मैगजीन में दीपंकर देब के लेख ‘Krishna Through The Hands Of Muslim Artists’ में छपी थी।
दीपंकर देब ‘Muslim Devotees Of Krishna’ नामक पुस्तक के लेखक हैं। जहां उन्होंने मुस्लिम भक्तों द्वारा श्री कृष्ण संबंधित चित्र कला और साहित्य के प्रसार पर चर्चा की।

हालांकि,  दीपंकर ने दावा किया था कि यह मुस्लिम भक्तों को ईद चंद्रमा दिखाते हुए भगवान श्री कृष्ण की एक पेंटिंग थी।

पेंटिंग साझा करने वाले लोगों द्वारा किए गए दो मुख्य दावे थे। वह इस प्रकार हैं।

⏺यह चित्र राजस्थानी / मुगल चित्रकला है और समय अवधि 16 वीं / 18 वीं शताब्दी के आसपास हो सकती है।

⏺इसमें भगवान कृष्ण को ईद के चंद्रमा को उनके भक्तों (या रोज़ेदार, मुस्लिम जो रमजान में उपवास का पालन करते हैं) के रूप में दर्शाते हैं, जैसा कि शशि थरूर ने दावा किया।

 

यह पेंटिंग मुगलकालीन हैैं उनका यह तर्क संदिग्ध हैं।

लोकप्रिय ट्विटर हैंडल ट्रू इंडोलॉजी ने किए गए दावों को खारिज कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल इसी तरह के दावों के साथ विलियम डालेरीम्पल, शबाना आज़मी और राजदीप सरदेसाई ने भी यही चित्र साझा किया था। यह  दिलचस्प है कि लोग चित्रकला कि छवियों के विषय में अपने मनगढ़ंत अर्थ निकाल तमाम दावे कर रहे थे। इन लोगों ने खुद ही यह फैसला किया  कि चित्रकला में चित्रित लोग ‘रोज़ेदार’ थे, और  भगवान श्री कृष्ण उन्हें ईद का चांद दिखा रहे हैं।

एक अन्य ट्विटर उपयोगकर्ता विवेक कुमार मिश्रा ने इस कुछ सत्य और स्पष्टता लाने का प्रयास किया। चित्रकला में एक शाही कपड़े पहने हुए दाढ़ी वाले व्यक्ति को ज्यादातर लोगों द्वारा एक मुस्लिम व्यक्ति समझ लिया। मिश्रा ने दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय से इसी तरह की पेंटिंग से छवियां साझा कीं जो कि दाढ़ी वाले आदमी और एक बहुत ही समान सेटिंग को दर्शाती है। इन चित्रों ने भारतीय पौराणिक कथाओं में श्री कृष्ण की कहानी के एक बहुत ही लोकप्रिय खंड को चित्रित किया जहां श्री कृष्ण गोकुल के लोगों को वृंदावन का मार्ग दिखा रहे हैं।

आगे यह भी स्पष्ट हुआ कि शाही पोषक पहने खड़ा व्यक्ति कोई मुस्लिम नहीं बल्कि श्री कृष्ण के पालक पिता नंद महाराज हैं।

जैसे जैसे यह चित्र वायरल होने लगा, तमाम एक्सपर्ट्स ने अपनी राय दी। कुछ ही समय में सहिष्णुता और भाईचारे के नाम पर चलाए जा रहे प्रोपागैंडा की सच्चाई सबके सामने आ गई।

प्रकाशक इंदु चंद्रशेखर ने इस मामले पर प्रमुख कला इतिहासकार प्रोफेसर बी एन गोस्वामी की प्रतिक्रिया साझा की। प्रोफेसर गोस्वामी ने ‘ईद चंद्रमा’ उत्साही द्वारा किए गए सभी दावों को खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि चित्र राजस्थान या मुगल विरासत से नहीं है, लेकिन यह तेनरी-गढ़वाल शैली के साथ मणकु और नैनीख के बाद कलाकारों की पहली पीढ़ी से संबंधित है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘दाढ़ी वाला आदमी’ वास्तव में नंद महाराज है और उन्हें इस शैली की सभी चित्रों में समान पोशाक और शैली में चित्रित किया गया है। प्रोफेसर गोस्वामी ने यह भी कहा कि इस चित्रकला के वर्तमान ठिकाने अज्ञात हैं और यदि स्थित हैं, तो इसमें भागवत पुराण से समान शैली की अन्य पहाड़ी चित्रों की तरह एक फोलियो शामिल होना चाहिए।

सांप्रदायिक सद्भावना की इच्छा में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन तथ्यों और झूठ का मुलम्मा चढ़ाए प्रोपोगंडा के बीच स्पष्ट सीमा होनी चाहिए। यह पहाड़ी कलाकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग हैं जिसमे भगवान कृष्ण की भक्ति भगवत पुराण की कहानियों को दर्शाया गया हैं। इसको जानबूझकर या अनजाने में गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा हैं, और ऐसा करने वाले यह बात खूब समझते हैं।

हमारे बुद्धिजीवियो ने भारतीय इतिहास को इस प्रकार ढ़ाल दिया गया है की इसके प्रत्येक पहलू में ‘धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी’ मानकों को फिट किया जा सके। लेकिन उन मानकों को प्रसारित करने के लिए हिंदू देवताओं को दिखाते हुए हिंदू चित्रों को गलत तरीके से प्रस्तुत करना बहुुुत दुर्भाग्यपूर्ण है।

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