शनिवार को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के नये निदेशक के नाम की घोषणा हुई। मध्यप्रदेश के पूर्व डीजीपी ऋषि कुमार शुक्ला को सीबीआई का नया निदेशक नियुक्त किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई और लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की तीन सदस्यीय समिति ने 2-1 की बहुमत से यह फैसला लिया। मल्लिकार्जुन खड़गे शुक्ला को निदेशक बनाने के खिलाफ थे।

नये सीबीआई निदेशक के नाम की घोषणा होते ही देश में जाति धर्म की राजनीति शुरू हो गई है। एक तरफ कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष शुक्ला की काबिलियत पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है, तो दूसरी तरफ तथाकथित बुध्दिजीवी वर्ग ने उन पर ब्राह्मण और हिंदू होने का ठप्पा लगा दिया। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी जावीद अहमद ने भी मुस्लिम कार्ड खेल दिया है। बता दें कि सीबीआई निदेशक बनने की दौड़ में जो नाम शामिल थे, उनमे यूपी के पूर्व डीजीपी का नाम भी शामिल था। शनिवार को नाम की घोषणा होने के बाद जैसे ही यह खबर मीडिया में आई, जावीद अहमद ने शुक्ला की नियुक्ति को लेकर मजहब कार्ड खेल दिया।

यह बात एक व्हाट्सएप चैट में पता चली। दरअसल, आईपीएस ऑफिसर नाम से उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारियों का एक व्हाट्सएप ग्रुप है। जब शुक्ला की नियुक्ति की खबर व्हाट्सएप ग्रुप में किसी ने शेयर की, तो जावीद अहमद ने लिखा, “अल्लाह की मर्जी। बुरा लगता है, पर ‘एम’ होना गुनाह है।”

बता दें कि शुक्ला 1983 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं, जबकि अहमद 1985 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। इस तरह शुक्ला, अहमद से दो बैच सीनियर हुए। इसलिए केंद्र सरकार ने आरके शुक्ला को निदेशक की कुर्सी सौंपी।

13 आइपीएस अफसरों को सुपरसीड कर बने यूपी के डीजीपी, तब मुसलमान होना नही आया याद

मालूम हो कि जावीद जब डीजीपी बने, तब यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। समाजवादी सरकार पर हमेशा से मुस्लिम तुष्टिकरण करती रही है। मुस्लिम होने की वजह से ही जावीद अहमद को डीजीपी बनाया गया। जावीद ने 13 वरिष्ठ अधिकारियों को सुपरसीड किया था। जिनमे रंजन द्विवेदी, आरआर भटनागर, वीके गुप्ता, रजनीकांत मिश्रा, आदि के नाम शामिल थे। ये सभी अधिकारी जावीद अहमद से वरिष्ठ थे।

अब आप खुद तय करिए क्या किसी प्रदेश के पुलिस प्रमुख के पद पर रह चुके व्यक्ति को ऐसी बातें करना शोभा देता है? अपने जीवन का अधिकतर समय प्राइम पोस्टिंग में गुजारने के बाद आखिर क्यों जावीद ने मुस्लिम या माइनोरिटी कार्ड खेला? क्या जावीद की इस शर्मनाक हरकत के लिए उनपर All India service conduct rules 1968 के तहत कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? यदि पुलिस मुखिया भी ऐसी बातें करने लगे तो फिर नेता और पुलिस में क्या अंतर रह जाएगा? अहमद की इस ओछी हरकत से कनिष्ठ पुलिस अधिकारियों में क्या संदेश जाएगा? केंद्र सरकार को निश्चित ही इस अधिकारी के खिलफ जांच कराकर कठोर कारवाई करनी चाहिए।