डीटीसी ने 2010 के बाद नही खरीदी एक भी नई बस, केजरीवाल सरकार की फ्री बस सर्विस से होगा और बुरा हाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2020 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए दिल्ली में मेट्रो और डीटीसी की बसों में महिलाओं के फ्री सर्विस की घोषणा की है। दिल्ली सरकार का यह फैसला अगले कुछ महीनों में लागू होगा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि “महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार ने फैसला लिया है।” उन्होंने आगे कहा, “पब्लिक ट्रांस्पोर्ट को सुरक्षा के लिहाज से सेफ माना गया है। इसीलिए हम ऐसा कर रहे हैं क्योंकि पहले महिलाएं किराए की वजह से इनमें सफर नहीं कर पाती थीं। इसका पूरा खर्चा दिल्ली सरकार उठाएगी, केंद्र सरकार की इसमें कोई दखल नहीं होगा।”

केजरीवाल ने तो चुनाव जीतने के लिए महिलाओं को एक झुनझुना थमा दिया और ये भी कह दिया कि इसका पूरा खर्च दिल्ली सरकार उठाएगी, लेकिन मुख्यमंत्री महोदय ने यह नहीं बताया कि इसका खर्च दिल्ली सरकार लाएगी कहां से। चूंकि, दिल्ली सरकार के अधीन डीटीसी आती है, तो हम बात करेंगे यहां डीटीसी के वर्तमान हालत की। डीटीसी की वर्तमान हालत से दिल्ली सरकार पूरी तरह परिचित है, लेकिन इसे नजरअंदाज करते हुए केजरीवाल ने चुनावी चाल चल दिया है। भले ही इससे दिल्ली की पूरी अर्थव्यवस्था बर्बाद ही क्यों ना हो जाए।

आइए जानते हैं डीटीसी की वर्तमान हालत

दिन प्रतिदिन डीटीसी की हालत बिगड़ती जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 के बाद से अभी तक एक भी नई बस नहीं खरीदी गई है। आखिरी बार 2009-10 में डीटीसी ने 2500 नॉन एसी और 1275 एसी बसें खरीदी थीं। इस समय डीटीसी की 3882 बसें एनसीआर के 18 मार्गों सहित 557 रूट्स पर चल रही हैं। इनमें हर रोज 32 लाख लोग सफर करते हैं। वहीं क्लस्टर स्कीम में 1789 बसें चल रही हैं, जिनमें 12 लाख से ज्यादा लोग सफर करते हैं। इस संख्या को ध्यान में रखते हुए बसों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, लेकिन इसके उलट हो रहा है।

10 मार्च 2019 को परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने बताया कि दिल्ली सरकार ने 1 हजार डीटीसी की बसें सहित 4 हजार नई बसें खरीदने का फैसला किया है। उनका कहना था कि अचार संहिता की वजह से कैबिनेट में इसके लिए प्रस्ताव नहीं लाया जा सका और चुनाव खत्म होते ही कैबिनेट में प्रस्ताव लाया जाएगा। आपको बता दें कि चुनाव अचार संहिता 15 मार्च को लागू हुआ और कैलाश गहलोत ने यह बयान 10 मार्च को दिया था। केजरीवाल सरकार चाहती तो इन 5 दिनों में कैबिनेट में प्रस्ताव पारित करा सकती थी, लेकिन नहीं किया। लोकसभा चुनाव खत्म हुए भी 11-12 दिन बीत गए, लेकिन अभी तक कैबिनेट में इस संबंध में कोई प्रस्ताव लाए जाने की चर्चा तक नहीं है। उल्टे केजरीवाल सरकार ने अब 2020 के विधानसभा चुनावों पर अपना फोकस कर लिया है।

31 मार्च 2017 की जनसत्ता की रिपोर्ट के अनुसार, डीटीसी के बेड़े में नई बसें शामिल करने के लिए कई बार बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन हर बार नतीजा निकला- निल बटे सन्नाटा। हर बार पेंच इसी सवाल पर फंसा कि नई बसें किस तरह की आएंगी। परिवहन सूत्रों की मानें तो हर बार बैठक में नई बसों को लेकर तकनीकी तर्क प्रस्तुत किया जाता रहा है, जिसके कारण अब तक डीटीसी के लिए एक भी बस नहीं खरीदी गई। एक तरफ जहां सरकार कहती है कि बीते वर्षों में डीटीसी की हालत खराब नहीं हुई है, तो वहीं दूसरी तरफ सरकार अपने इसी दावे का खुद पोल खोलते हुए यह भी कहती है कि डीटीसी का घाटा दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। डीटीसी अधिकारियों के अनुसार, 2014-15 में यह घाटा करीब 2900 करोड़ रुपए का था, जो 2017-18 में बढ़ कर 3700 करोड़ रुपए के पार जा पहुंचा है।

जुलाई 2018 में 1000 इलेक्ट्रिक बसें हायर करने के लिए दिल्ली सरकार ने प्रपोजल दिया था। 3 महीने के भीतर इस विषय पर रिपोर्ट जमा करनी थी, लेकिन इस विषय पर कोई जानकारी नहीं थी, न ही बसों की खरीददारी हुई थी। बसों की कमी की भयंकर संकट झेल रही डीटीसी को तत्काल 15 हजार बसों की आवश्यकता है। 2020 तक यह आंकड़ा बढ़कर 18 हजार हो जाएगा।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर डीटीसी के बेड़े में अतिशीघ्र नई बसें नहीं शामिल की गई, तो 2025 तक निगम की एक भी बस कामकाजी नहीं रहेगी। निगम ने बताया कि बसों की खराब हालत के कारण पिछले 5 सालों में लगभग 17 लाख से ज्यादा यात्रियों को नुकसान हो चुका है। सीएसई की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डीटीसी मार्गों में से 1 प्रतिशत से कम की पीक आवर्स के दौरान हर पांच मिनट में एक बस की आवृत्ति होती है। 25 प्रतिशत से कम डीटीसी मार्गों में हर 15 मिनट में एक बस की आवृत्ति होती है। बाकी मार्गों में प्रतीक्षा समय बहुत अधिक होता है। सेंटर की कार्यकारी निदेशक अनामिता रॉयचौधरी ने बताया कि ऐसे समय में जब यात्रा की मांग चरम पर है और शहर में प्रदूषण की समस्याएं उच्चतम स्तर पर हैं, अगर अतिशीघ्र इसका समाधान नहीं ढूंढा गया तो आने वाले समय में यह समस्या भीषण रूप ले सकती है।

ये है डीटीसी की दयनीय स्थिति। मुख्यमंत्री महोदय इस पर ध्यान देने की बजाए, इस बात पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं कि कैसे वोट के लिए जनता को लालच दिया जाए। बीते लोकसभा चुनावों में ‘आप’ की जो हालत हुई, उससे केजरीवाल ने सोचा कि अब कैसे करके जनता को बहकाया जाए। 2015 में जब केजरीवाल चुनाव लड़ रहे थे, तो उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के लिए पूरे दिल्ली और डीटीसी की हर बसों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का वायदा किया था, लेकिन वो वायदा तो पूरा होने से रहा। अरविंद केजरीवाल को अगर जनता के समस्याओं की इतनी सी भी चिंता है, तो अभी भी समय है, उन्हें डीटीसी की हालत सुधारने की कोशिश करनी चाहिए और उसे डुबने से बचाना चाहिए।

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