Sabrimala मन्दिर के पट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए 17 अक्टूबर से खुल रहे हैं। जिसके बाद इस मंदिर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक महिलाये भी प्रवेश कर सकेंगी। केरल समेत पूरे देश के हिन्दू सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अपनी धार्मिक रीतिरिवाजों में हस्तक्षेप के तौर पर मानकर पूरे देश में उग्र विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। यहाँ तक की कुछ संगठनों ने धमकी दी हैं अगर महिलाओ का प्रवेश रोका नही गया तो आंदोलन हिंसक हो सकता हैं। शिवसेना ने कहा हैं कि उनके संगठन की महिलाये और पुरुष पम्पा नदी के किनारे आत्महत्या करेंगे।

उधर मंदिर प्रशासन भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए थोड़ा समय देने की मांग कर रहा हैं, लेकिन केरल की वामपन्थी सरकार इस आंदोलन को अपनी ताकत के बल पर दबाना चाहती हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दे सबरीमाला मन्दिर में महिलाओ के प्रवेश के खिलाफ जो महिलाये आंदोलन कर रही थी उन पर भी केरल की वामपन्थी सरकार ने बलप्रयोग कर आंदोलन को दबाने की कोशिश की हैं।

केरल के वामपन्थी मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने सबरीमाला मन्दिर मामले पर साफ कहा हैं कि वह इस मामले में कोई रिव्यू पिटीशन दाखिल नही करेंगे, जबकि यह मंदिर हर साल 250 करोड़ से ज्यादा का राजस्व सरकार को देता हैं। ऐसे में यह सवाल उठता हैं कि अगर केरल में वामपन्थी सरकार ना होती तो क्या हिन्दू से जुड़े मामले इसी तरीके से सुलझाए जाते? क्या सरकार के पास इस मामले को शांति से निपटाने का कोई और तरीका नही हैं? तो इसका जवाब हैं कि ‘जी हाँ, अगर सरकार चाहे तो इस मामले को चतुराई के साथ शांति पूर्वक हल निकाल सकती हैं।

ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के बनारस शहर का हैं। एक कब्रिस्तान के लिए साल 1878 में शिया और सुन्नी समुदाय के लोगों में एक कब्रिस्तान को लेकर विवाद हो गया था। 8 प्लॉटों और 2 कब्रिस्तानों पर कब्जे को लेकर दोनों समुदाय कोर्ट और गलियों में आपस में भिड़ चुके हैं। इस मामले पर 1981 में  सुप्रीम कोर्ट ने शियाओं के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन 32 साल होने के बावजूद आज तक इस सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नही किया गया। तत्कालीन राज्य सरकार ने कहा था कि यह मामला गम्भीर और संवेदनशील हैं इसलिए फैसले पर अमल नही किया जा सकता और अब सुप्रीम कोर्ट भी चाहता है दोनों समुदायों के लोग मिल-बैठकर इस मुद्दे का हल निकालें।

अब सवाल यह उठता हैं कि क्या सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश लिए भी मन्दिर और हिन्दू संगठनो को समय नही दिया जा सकता? क्या ऐसा ही मामला किसी और धर्म/समुदाय का होता तो केरल की वामपंथी सरकार इसी हठधर्मिता से कार्य करती? क्या केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन तब भी इतने ही विश्वास के साथ यह कह पाते अगर सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश की अनुमति दे देती? बहरहाल इन सवालों के जवाब देश के हिन्दुओ को सोचना हैं की अगर केरल में कोई हिन्दू समर्थित सरकार होती तो क्या वह इन विकल्पों का इस्तेमाल नही करती?

विरोध प्रदर्शन की तस्वीरे