मेरे प्यारे देशवासियों, मैं भारत का लोकतंत्र हूँ; आपने मेरी मौत की खबरें अखबारों और TV पर समय समय पर पढ़ी-देखी होंगी। वैसे तो मेरी हत्या करना का प्रयास कोई नया नहीं है, पर जब बात छेड़ी ही गई है तो विस्तार से बताऊंगा –

1. बात करते हैं 1952 के मद्रास आम चुनाव की, तत्कालीन गवर्नर ने सरकार बनाने का न्यौता कम विधायकों वाली कांग्रेस पार्टी को दिया था जिसके नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी थे जो उस समय विधायक भी नहीं थे। जबकि सँयुक्त मोर्चे में कांग्रेस से ज्यादा विधायक थे इसके बावजूद राज्यपाल ने उनको सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया था। आप सोच सकते हैं, उस समय भारत का लोकतंत्र एक बच्चे जैसा ही था; मौकापरस्तों ने बाल-हत्या तक करने की कोशिश की थी।

2. केरल 1959 जब पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी को केरल में जीत प्राप्त हुई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस केंद्र सरकार ये बर्दास्त न कर सकी। पूर्ण असंवैधानिक तरीके से जनता द्वारा चुनी गई सरकार को बर्खास्त कर दिया था। उस समय मैं भारत का लोकतंत्र मानो मार ही दिया गया था।

3. बोम्मई केस, 1988 कर्नाटक में SR बोम्मई की सरकार केंद्र सरकार द्वारा बर्खास्त करवा दी गई। ठीक ऐसा ही, बाबरी विध्वंस के समय हुआ, उत्तर प्रदेश की इस घटना में बीजेपी शासित तमाम राज्यो की सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया था और राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। तब मैं, भारत का लोकतंत्र मानो अपने अंत की प्रतीक्षा कर रहा था।

4. हरियाणा 1979 – देवीलाल के नेतृत्व में लोकदल की सरकार बनी। इसके महज एक दो साल बाद भजनलाल ने लोकदल के विधायकों को अपने पक्ष में कर लिया। तत्कालीन राज्यपाल JD तवासे ने भजनलाल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। मरणासन्न हालात में भारत के लोकतंत्र में एक और खंजर घुसा दिया गया।

5. 1984 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल बी.के. नेहरू ने केंद्र के दबाव के बावजूद फारूख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के खिलाफ रिपोर्ट भेजने से इनकार कर दिया। अंततः केंद्र की सरकार ने उनका तबादला गुजरात कर दिया और दूसरा राज्यपाल भेजकर मनमाफिक रिपोर्ट मंगवाई गई. राज्य सरकार को बर्खास्त किया गया। लोकतंत्र तब सांस भी बड़ी मुश्किल से ले पा रहा था।

6. आंध्र प्रदेश, 1984: आंध्र प्रदेश में पहली बार 1983 में एन.टी. रामाराव के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार बनी। इसके बाद 1984 में तेलुगू देशम पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव को हाॅर्ट सर्जरी के लिए अचानक विदेश जाना पड़ा। इंदिरा गांधी ने इस मौके का फायदा उठाते हुए राष्ट्रपति के द्वारा सरकार को बर्खास्त करवा दिया। यहां तोलोकतंत्र की हड्डी पसली एक कर दी गई।

7. कर्नाटक, 1989: कर्नाटक में 1983 में पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनी थी। रामकृष्ण हेगड़े जनता पार्टी की सरकार में पहले सीएम थे। इसके बाद अगस्त, 1988 में एसआर बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। राज्य के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने 21 अप्रैल, 1989 को बोम्मई सरकार को बर्खास्त कर दिया। सुबैया ने कहा कि बोम्मई सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी है। बोम्मई ने विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए राज्यपाल से समय मांगा, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। बोम्मई ने राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। फैसला बोम्मई के पक्ष में आया और तत्कालीन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से बोम्मई सरकार फिर से बहाल हुई।

8. गुजरात, 1996: साल 1996 में गुजरात में सुरेश मेहता मुख्यमंत्री थे। बीजेपी नेता शंकर सिंह वाघेला ने दावा किया कि उनके पास 40 विधायकों का समर्थन है। तत्कालीन राज्यपाल ने मेहता से सदन में बहुमत साबित करने को कहा, लेकिन इसके पहले ही सदन में काफी हंगामा हुआ जिसके बाद तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार ने दखल देकर मेहता सरकार को बर्खास्त कर दिया। दिलचस्प यह है कि तब एचडी देवगौड़ा भारत के प्रधानमंत्री थे और वजुभाई वाला (अभी कर्नाटक के राज्यपाल) राज्य सरकार में एक मंत्री।

9. 2005: वर्ष 2005 में झारखंड में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने शिबू सोरेन को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई। हालांकि शिबू सोरेन विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने में विफल रहे और नौ दिनों के बाद ही उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद एनडीए ने राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश किया। आखिरकार 13 मार्च, 2005 को अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार सत्ता में आई।

10. बिहार, 2005: साल 2005 में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा चुनावों के बाद किसी भी दल को बहुमत न आने की अवस्था में विधानसभा भंग करने की सिफारिश की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस फैसले की आलोचना की।

11. कर्नाटक, 2009: यूपीए-1 की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हंसराज भारद्वाज को 25 जून, 2009 को कर्नाटक का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। भारद्वाज ने कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की बहुमत वाली सरकार को बर्खास्त कर दिया। राज्यपाल का कहना था कि येदियुरप्पा सरकार ने फर्जी तरीके से बहुमत हासिल किया है।

12. इमरजेंसी – कांग्रेस पार्टी ने इमरजेंसी के कानून का सबसे ज्यादा दुरूपयोग किया। आर्टिकल 356 को संशोधित करवाकर इमरजेंसी का अधिकतम समय 1 साल करवा दिया गया जिसे बाद में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने वापस संशोधित करवाकर 6 महीने किया। इमरजेंसी के दौरान कई छात्र संघठनों पर लाठीचार्ज करवाये गए, जयप्रकाश नारायण भी लाठीचार्ज में घायल होकर ज़िंदगी और मौत से लड़ रहे थे, लोग जेलों में ठूसे जा रहे थे जबर्दस्ती। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की इससे बड़ी हत्या और क्या हो सकती थी?

ये आंकड़े कांग्रेस की उन करतूतों के हैं जिनको छिपाकर वो भारतीय जनता पार्टी पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाती है। जबकि इन्होंने तो हत्या तो दूर की बात लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी कभी। कांग्रेस पार्टी का विश्वास कभी लोकतंत्र में रहा ही नहीं; इनकी पार्टी का अध्यक्ष भी परिवारवाद के सिद्धांत पर चुना जाता है। देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया से नहीं बने थे; तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के सदस्यों ने वल्लभ भाई पटेल को अपना मत दिया था। पहली पसंद पटेल थे ना की नेहरू। आज तक कौन सा असंवैधानिक काम रह गया है जिसमें कांग्रेस ने अपना हाथ न आजमाया हो।

इस आर्टिकल को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिये और हर लोकतंत्र की मौत का रोना रोने वालों के मुंह पर मारिये।

[the_ad id=”1232″]