एक तरफ जहां केरल की वामपंथी सरकार सबरीमाला मंदिर विवाद में प्रगतिशील बनने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ कन्नूर जिले के एक मंदिर में 400 दलित परिवारों को पूजा से रोक दिया गया है। बताया जा रहा है कि मंदिर के प्रबंधन की व्यवस्था सीपीएम समर्थित विचारधारा से जुड़े लोग संभालते हैं और इसमे दलितों के प्रवेश पर पाबंदी है।

इस वक्त केरल में अझिकल पंपाडी उत्सव चल रहा है और कन्नूर के मशहूर आलिनकीझिल मंदिर में दलितों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस उत्सव में परंपरा के तौर पर देवी के तलवार को घर लेकर जाते हैं। माना जाता है कि इससे सभी तामसिक शक्तियों का संहार किया जा सकता है। हालांकि, इस क्षेत्र में पड़ने वाले 400 इच्छुक परिवारों को दलित होने की वजह से इसमे प्रवेश नहीं मिलता है।

केरल स्टेट पट्टिका समाजम (केपीजेएस) ने बताया, “प्रदेश में भेदभाव का यह कोई अकेला मामला नहीं है। ऐसा और भी कई हिस्सों में होता है।” विडंबना देखिए कि राज्य की सीपीएम सरकार सबरीमाला मंदिर में 10-50 वर्ष तक की महिलाओं को प्रवेश दिलाने के लिए मंदिर के खुलने के नियम को तोड़ रही है, लेकिन सीपीएम के ही विचारधारा से संबंध रखने वाला वर्ग दलितों को मंदिर में प्रवेश करने से रोक रहा है।

मंदिर के मैनेजिंग कमिटी के सचिव पीपी गंगाधरन का कहना है, “यह जाति के आधार पर भेदभाव का मामला नहीं है। सबको समझना चाहिए कि दशकों से चली आ रही मंदिर की परंपरा को रातों-रात नहीं बदली जा सकती।”

यहां आप वामपंथी विचारधारा का पाखंड देखिए। जब सबरीमाला मंदिर में पुलिस बल का प्रयोग कर बुर्के में दो महिलाओं को प्रवेश कराया गया, तो मंदिर की 800 साल पुरानी परंपरा का ख्याल तक नहीं रहा और अब जब खुद पर आया तो परंपरा की याद आ रही है। खैर, इसमे कुछ हद तक मीडिया का भी हाथ है। दिसंबर 2018 में एक मीडिया हाउस ने स्टिंग ऑपरेशन कर देश के चार मंदिरों के बारे में झूठा दावा किया था कि वहां दलितों को प्रवेश नहीं मिलता। क्या अब इस मंदिर का स्टिंग ऑपरेशन किया जाएगा? हालांकि, हमने उस मीडिया हाउस के स्टिंग ऑपरेशन का झूठ टीवी पर प्रसारित होने से पहले ही उजागर कर दिया था।

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