सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को खारिज़ करने के संकेत दिए है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के धारा 377 को खत्म करने को लेकर संकेत देने के बाद समलैंगिक समाज मे खुशी का माहौल है। वहीं दूसरी ओर ईसाई और मुस्लिम संगठनों से जुड़े लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया है। इन संगठनों ने 2009 में भी समलैंगिकों के समर्थन में आये दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले का विरोध किया था।

बाइबिल समलैंगिता को घृणा की दृष्टि से देखता है

अपोलोस्टिक चर्च के वकील मनोज वी जॉर्ज ने बताया कि ईसाई दर्शन, संस्कृति और धर्म समलैंगिक संबंध स्थापित करने को पाप मानता है।

वहीं मुस्लिमो की संस्था आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य सईद काशिम रसूल ने कहा कि हम इस मामले के खिलाफ कोर्ट में जाएंगे। समलैंगिकता अनैतिक है और यह सभी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है। अगर इसको कानूनी तौर पर सही ठहरा दिया जायेगा तो इसके समाज मे परेशानी खड़ी हो जाएगी।

इमाम काउंसिल के अध्यक्ष मकसूद उल हसन कासमी ने AIMPLB की बात का समर्थन किया है। उनका कहना है कि कुछ सालों बाद लोग जानवरो के साथ संभोग को भी सही ठहराने लगेंगे। उनका सवाल किया कि अगर कुछ लोगो को कोई बात सही लगे तो क्या उसको लीगल कर देना सही है ?

वहीं 2013 में इस मामले में कोर्ट ने समर्थन में फैसला लेने के पीछे मौलिक अधिकारों का हवाला दिया था।वहीं दूसरी तरफ भारत सरकार ने मुद्दे पर फैसला कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया है। सरकार का कहना है कि वो इस मामले का विरोध नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम सर्वमान्य होगा।

मुस्लिम और ईसाई धार्मिक संगठनों से अलग हिन्दू संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस मामले में LGBT के समर्थन में व्यक्तव्य दिया है। संघ का कहना है कि वो दिल्ली कोर्ट के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के मत से सहमत है कि कानून की धारा 377 को समाप्त कर देना चाहिए। मज़े की बात ये है कि सेक्युलर बुद्धिजीवी सनातन धर्मलामभियो को रूढ़िवादी कहते आये है, पर इस मुद्दे पर कई पश्चिमी ईसाई देशों की मान्यताओं से ज्यादा मॉडर्न सोच दिखाते हुए समलैंगिकों के हितों की रक्षा के समर्थन में अपना मत दिया है।