बरेली से बीजेपी विधायक राजेश मिश्रा की बेटी साक्षी मिश्रा और अजितेश कुमार की लव मैरिज में फिर एक नया एंगल निकल कर सामने आया है। इस लव मैरिज के बारे में जब अजितेश के पड़ोसियों से बात की गई तो उन्होंने अजितेश के बारे में हैरतअंगेज जानकारी दी, जिसके बाद यह पूरा मामला ही अलग रूप ले लिया है।

अजितेश के पड़ोसियो के मुताबिक, अजितेश दलित नही बल्कि ख़ुद को ठाकुर बताता था और इस लव मैरिज के बाद वह अचानक खुद को दलित बताने लगा। पड़ोसियों ने अजितेश के बारे में बताया कि वह हर तरीक़े का नशा करता है। स्वभाव से आपराधिक प्रवृत्ति का है यहाँ के थाने में अजितेश के खिलाफ कई मामले दर्ज है। यहाँ तक कि उसकी फेसबुक प्रोफाइल में भी ठाकुर लिखा हुआ है।

गौरतलब है, मीडिया में सबसे ज्यादा यही मुद्दा उछाला जा रहा है कि ब्राह्मण विधायक की बेटी ने अनुसूचित जाति के लड़के से शादी की इसलिए वह नाराज है। अब पड़ोसियो के बयान के बाद अजितेश के दलित होने के दावे पर ही सन्देह खड़े हो गए है। ऐसे में अब यह सवाल उठकर खड़ा हो गया है कि क्या अजितेश के दलित होने का दावा जनता की सहानभूति पाने के लिए और उसके ऊपर जो केस चल रहे है उससे ध्यान भटकाने के लिए तो नही किया गया था।

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उधर विधायक राजेश मिश्रा ने अपने ऊपर लगाए जा रहे सभी आरोप का खंडन किया है। साक्षी के आरोप कि अजितेश अनुसूचित जाति के हैं, इसलिए पिता शादी का विरोध कर रहे। जान से मारने की धमकी दी जा रही। बिथरी विधायक राजेश मिश्र उर्फ पप्पू भरतौल ने ऐसे हर सवाल का जवाब अलग-अलग टीवी चैनलों पर देते हुए जाति के अंतर वाली बात को सिरे से नकारा। उन्होंने कहा कि अजितेश तो उनके घर खाना तक खाता था।

विधायक राजेश मिश्रा की बात की पुष्टि अजितेश के पिता हरीश कुमार ने भी की और कहा कि “विधायक के घर उनका बीस साल से आना-जाना और खाना पीना है।” उन्होंने आगे कहा कि “तीन जुलाई को अजितेश ने उनसे कहा था कि वह साक्षी से शादी करना चाहता है और साथ जा रहा है। यह सुनकर वह हैरान रह गये। उन्होंने अजितेश को समझाया था कि विधायक से उनकी पुरानी पहचान है वह हमेशा हमारी मदद करते है। उनके परिवार के साथ विश्वासघात करना सही नहीं है। लेकिन बच्चों के सामने क्या मजबूरी होगी, इसका उन्हें पता नहीं। हमें पहले बताते तो शायद हम विधायकजी से बात करते।”

बहरहाल विधायक राजेश मिश्र ने कहा कि मामला खत्म करिए, हम अपना पक्ष रख चुके हैं। साक्षी बालिग है, अपने निर्णय ले सकती है। उन्होंने दोहराया कि धमकी तो दूर, हमने तो उन्हें तलाशने का प्रयास तक नहीं किया। इस आशय का उन्होंने एक लेटर भी जारी किया है।

उधर कल तक सहानभूति का पात्र बनी साक्षी के ऊपर भी सोशल मीडिया में भी सवाल खड़े होने लगे है, लोगो का कहना है कि साक्षी को अपनी मर्जी का साथी चुनने का हक था, परिवार से बगावत करके भी चुना तो सही किया। अगर उसकी जान को खतरा था तो उसने मीडिया से गुहार लगाई, ये भी सही था लेकिन अब जिस तरह से वो अपनी मां और पिता को अपनी ज़िंदगी का विलेन साबित करने के लिए किस्सागोई कर रही है, क्या इसकी ज़रूरत है?

वो लगातार बचपन से लेकर अब तक कहानी सुनाकर मां-बाप को जमाने की नज़र में नफरत का किरदार बनाने में जुटी है, क्या अब इसकी ज़रूरत है? बाप ने कह दिया कि आप अपनी दुनिया में मस्त रहो, कोई मतलब नहीं रखो। मत रखो, लेकिन लगातार अपनी माँ को, पिता को इतना जलील करने की ज़रूरत है क्या?