रामजन्मभूमि मामले में एक नयी बहस छिड़ गयी है। रिपब्लिक टीवी द्वारा किए गये स्टिंग ऑपरेशन में यह बात पूख्ता तौर पर सामने आई है कि वर्ष 1990 में तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार के आदेश पर पुलिस ने चुन चुनकर कारसेवकों को गोली मारी थी। इतना ही नहीं, मृत कारसेवकों का अंतिम संस्कार सनातन संस्कृति के उचित नियमानुसार ना करके दफनाया दिया गया।

रिपब्लिक टीवी के रिपोर्टर पीयूष मिश्रा ने जब रामजन्मभूमि थाना के तत्कालीन उपनिरिक्षक वीर बहादुर सिंह से इस बारे में बात की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय जो हुआ, वो हिंदूओं का नरसंहार था। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने मारे गए हिंदूओं का अंतिम संस्कार के लिए बजट नहीं दिया था। रिपोर्टर ने पूछा कि क्या सिर्फ 16 लोग ही मारे गए थे, जैसा कि सरकार कहती थी? वीबी सिंह ने कहा, “देखिए उस समय जब विदेशी पत्रकार आए, तो डीएम और एसएसपी ने कहा कि जाइए एसओ से बात करिए। उन पत्रकारों के कैमरे में स्टेटमेंट बना कि सिर्फ 8 लोग पुलिस की गोली से मारे गये हैं, जबकि 42 घायल हैं, जो कि सही नहीं है। इसके बाद जब मैं श्मशान घाट गया और वहां लोगों से पूछा कि कितनी लाशें जलाई और कितनी दफनाई जाती हैं? तो उनका जवाब था कि 15-20 लाशें दफनाई जाती हैं, बाकी जलाई जाती हैं। तो हमने इस आधार पर सरकार से कहा कि कम लोग ही मरे हैं। लेकिन वास्तव में जो लाशें दफनाई जाती थीं, वो सभी कारसेवकों की थीं।”

आगे रिपोर्टर ने पूछा कि इस घटना के बाद बहुत लोग अपनों को खोजते आए होंगे, तो उन्हें क्या बताया गया? इस पर सिंह ने कहा, “वो आते रहे तो उसको दिखाया गया कि ये लाशें उनकी नहीं हैं ये दफनाई हुई लाशें हैं।”

मालूम हो कि 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को हुई वीभत्स घटना में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 16 निहत्थे कारसेवकों की जानें चली गयी थीं। खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने मीडिया के सामने यह बात स्वीकार की थी कि उन्होंने ही कारसेवकों पर गोलियां चलवाईं थीं, जिनमे 16 कारसेवकों की मृत्यु हुई। लेकिन रिपब्लिक टीवी का यह स्टिंग ऑपरेशन यह साबित करता है कि सरकार के आंकड़े पूरी तरह झूठे थे। सरकार को पूरी जानकारी थी, फिर भी जानबूझकर यह सच दबाया गया।

साभार: पत्रिका

2016 में मुलायम सिंह एलानिया तौर पर कहा था, “मुझे अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने के आदेश देने का अफसोस बिल्कुल नहीं है। कारसेवकों पर गोलीबारी का आदेश देने का मेरा निर्णय मुस्लिमों को बचाने के लिए था। इस देश में मुसलमानों के विश्वास को बनाए रखने के लिए इस निर्णय की आवश्यकता थी।” जबकि सत्य यह है कि रामजन्मभूमि आंदोलन में अयोध्या की किसी भी मस्जिद को रामभक्तों ने नुकसान नहीं पहुंचाया था।

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश की मीडिया द्वारा निर्दोष हिंदूओं के साथ हुए अत्याचारों को दबा दिया गया। निहत्थे रामभक्तों पर गोलियां चलवाने वाले आज सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष होने और संविधान बचाने की बात करते हैं। इससे बड़ा हास्यास्पद क्या होगा?