कभी आपने अपने परिवार या किसी महिला मित्र के साथ रेल से यात्रा की है ? अच्छा फर्ज कीजिए कि आप अपनी किसी मित्र के साथ यात्रा कर रहे हों और उसे 5-7 हट्टे कट्टे मुस्टंडे आकर छेड़ना शुरू कर दें। कोई आपकी सहायता न कर रहा हो तो कितना अजीब और असहाय अनुभव करेंगे न? पर तब भी शायद , मार खाकर भी अपनी मित्र का सम्मान बचाने की चेष्टा जरूर करेंगे, है न ? अब सोचिए कि इस परिस्थिति में से भी आपको हटा दो, मने की आपकी मित्र या कोई भी लड़की अकेली जा रही हो और उसके साथ कुछ जलील लोग बद्तमीजी कर रहे हो तो ? कल्पना करने से भी भय होता है न कि वो लोग क्या कर सकते हैं।

ये शोहदों झुंड बना कर शिकार ढूंढते रहते हैं, अगर कोई मासूम इनके हत्थे चढ़ जाता है तो उसे निगल जाने में जरा भी कोताही नहीं बरतते। मेरी एक मित्र, जो यूपीएससी की छात्रा हैं, 12-6-18 को दिल्ली से रांची जाने वाली गाड़ी संख्या 12874 आनन्द विहार एक्सप्रेस से रवाना हुई। सब कुछ सामान्य था, फिर एक तगड़े डील डोल वाला झुंड जो अपने को आर्मी मैन कहता है, उसी गाड़ी के उसी कोच में चढ़ा जिस में मित्र भी सवार थी। कुछ को छोड़कर अधिकतर वेटिंग टिकेट्स वाले थे। 12 जून की रात और 13 जून का दिन शांति से नीचे बैठ कर गुजार दिया। कल रात को लगभग 11 बजे मेरा फोन घनघनाने लगा देखा तो इसी मित्र का कॉल था, हालांकि ये मित्र बहुत हिम्मती और बिंदास लड़की हैं, पर बातों से परेशान लग रही थी। पूछने पर कुछ देर तक ‘अरे कुछ नहीं छोड़ो’ का राग अलापने के बाद उसने बताया कि वो मुस्टंडे शराब पीकर ट्रेन में उत्पात मचाए हुए थे। कॉल पर भी उनका शोरगुल साफ सुनाई देता था। सच कहूं तो, जब मित्र ने ये कहा कि ‘आई एम फीलिंग इनशिक्योर अरुण, डर लग रहा है’, तो पुराना बहुत कुछ याद आने लगा, अज्ञात अनिष्ट की आशंका से मेरी रूह कांपने लगी। पर फिर भी संयत रहकर मित्र को ढांढस बंधाया और कहा कि कुछ करता हूँ।

रात को मैंने और मेरे मित्र अनूप राय ने ट्वीटर पर रेलवे मंत्रालय और रेलवे मंत्रियो को टैग करके कुछ ट्वीट्स किए पर कुछ न हुआ। एक एक पल जैसे बहुत भारी लग रहा था। फिर आरपीएफ और जीआरपी को टैग करके एक और ट्वीट किया कि कोई लड़की बहुत मुश्किल में है उसकी सहायता कीजिए, आरपीएफ तुरन्त हरकत में आई, ट्रेन को ट्रैक कर विभिन्न चैनल्स से गुजरते हुए मुझसे मित्र का नम्बर लेकर उससे सम्पर्क किया गया।

रॉबर्ट्सगंज के बाद कुछ हेड कांस्टेबल ट्रेन में आए और वस्तुस्थिति से आरपीएफ को अवगत कराते रहे। चोपन स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही जाब्ता तैयार था, मेरी मित्र की शिकायत लिखित रूप में लेकर कार्यवाही का आश्वासन दिया गया।

साथ ही झुंड का कोई अन्य सदस्य मित्र को किसी तरह का कोई नुकसान न पहुँचा दे इसलिए एहतियातन उसकी सीट भी बदल दी गई। मित्र अभी भी उसी ट्रेन में ही है, और आज यानी 14 जून की सुबह लगभग 10 बजे तक अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंच जाएगी। बोलिए साचे दरबार की जय।

मोरल ऑफ द स्टोरी ये है कि अब कोई मौन रहने वाली सरकार नहीं है, अब एक संजीदा, सचेत सरकार हमारे हित मे 24×7 लगातार जग कर काम कर रही है, जिसके लिए हम कीड़े मकोड़े नहीं हैं।

चाहिए होंगे किसी को मुफ्त के 15 लाख, हमें नहीं चाहिए, मेरे लिए तो यही हैं अच्छे दिन।

अरुण राजपुरोहित की फेसबुक वॉल से