आज के समय में आप सोशल मीडिया पर या नकली फ़ेमिनिस्टों के द्वारा यह देखते सुनते होंगे कि सनातन हिन्दू धर्म में महिलाओं पर सदियों से अत्याचार होता आया है। वामपंथी इतिहासकार बताते हैं कि सनातन धर्म में स्त्रियां बहुत अन्याय झेली हैं, उनपर अत्याचार हुआ है। पुरुषवादी सोच की शिकार हुई हैं। अगर हम आपसे कहें कि सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है, जहां नारियों को वो सम्मान मिला, जो और किसी धर्म में नहीं मिला, तो निश्चित ही आपको थोड़ा अटपटा लगेगा। लेकिन सत्य यही है। अगर आप इसकी सच्चाई जानना चाहते हैं, तो आपको पिछले 1 हजार साल का नहीं, बल्कि 5 हजार साल पुरानी भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन करना होगा। प्राचीन भारत में महिलाओं को वो स्वतंत्रता प्राप्त थी कि वो अपनी विद्वत्ता से बड़े बड़े पुरुष धुरंधरों को परास्त कर देती थीं। इतना ही नहीं, उन्हें पैतृक संपत्ति में भी बराबर का हिस्सेदार माना जाता था।

खैर आगे बढ़ते हैं। इतिहास में आपको ऐसा एक नहीं, कई हिंदू स्त्रियों का उदाहरण मिल जाएगा। आज हम आपको ऐसी ही एक वीर हिंदू नारी के बारे में बताएंगे, जिनका नाम सुनते ही मुगल को स्वप्न में भी भयभीत हो जाते थे। जो अत्यंत सुंदर तो थीं ही, इसके साथ साथ उनके अंदर युद्ध कौशल व राजकाज की अपूर्व समझ थी। उनका नाम है- “रानी दुर्गावती”

 

कौन हैं रानी दुर्गावती?

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को महोबा के नृपपति राजा कीर्ति सिंह के यहां हुआ था। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण इनका नाम दुर्गावती रखा गया। महोबा चंदेलों की राजधानी थी और इनका राज्य बुंदेलखंड तक फैला हुआ था। दुर्गावती अत्यंत सुंदर और गुणवती थीं। कीर्ति सिंह उन्हें पढाना लिखाना चाहते थे, लेकिन दुर्गावती की पढने में कोई रुचि नहीं थी। जब पंडित उनके घर पढाई लिखाई के लिए आते थे, तो वह उनसे कहती थीं, “मुझे क ख ग ना पढाइए, मुझे महाभारत और रामायण के लंका कांड की कहानियां बताइए।” यह देखकर गुरुजी भी आश्चर्य भरी निगाहों से उनकी ओर देखने लगते थे। गुरुजी के ऐसा ना करने पर वह वहां से उठकर धनुष- बाण, तलवार, घुड़सवारी, आदि का अभ्यास करने चली जाती थीं।

 

रानी दुर्गावती के विवाह की कहानी

धीरे धीरे रानी बड़ी होती गयीं। एक साधारण पिता की भांति राजा कीर्ति सिंह को भी अपने बेटी के विवाह का विचार मन में आने लगा। राजा राजपूत थे, तो उन्होंने अपना वर भी राजपूत ढूंढने का निश्चय किया। चूंकि, दुर्गा रूपवती होने के साथ साथ रणभूमि के क्षेत्र में भी निपुण थीं। तो राजा ने घोषणा की कि जो भी राजपूत राजकुमार अपनी शौर्यता का परिचय देगा, उसके साथ वो अपनी बेटी का विवाह कर देंगे। राजा की यह घोषणा गोंड राजासंग्राम शाह मडावी के पुत्र दलपतशाह की कानों में पड़ी। वह रानी की सुंदरता से भी भली-भांति परिचित थे। इसलिए उन्होंने रानी से विवाह करने का निश्चय कर अपना संदेश कीर्ति सिंह को भिजवाया। कीर्ति सिंह ने पत्र का जवाब देते हुए कहा कि वो गोंड़ जाति के हैं, इसलिए वो उनके साथ रानी का विवाह नहीं करेंगे।उन्होंने अपने पत्र में यह भी कहा कि यदि तुम दुर्गावती के साथ विवाह करना चाहते हो तो तुम्हें महोबा की सेना के साथ युद्ध करना होगा। यदि तुम युद्ध में महोबा की सेना को पराजित कर दोगे तो, तुम्हारा विवाह दुर्गावती के साथ हो सकता है। पत्र पाकर दलपतशाह युध्द की तैयारियां करने लगे। कीर्ति सिंह जानते थे कि दलपतशाह वीर तो है, लेकिन महोबा की सेना बहुत बड़ी है और वह परास्त नहीं कर पाएगा। इसके बाद कीर्ति सिंह ने शीघ्रता से अपनी बेटी के विवाह की तैयारियां शुरू कर दीं। जब रानी को अपना विवाह दलपतशाह से ना होने की खबर हुई तो उन्होंने दलपतशाह को पत्र भेजकर कहा, “मैं आपसे विवाह करना चाहती हूं और मेरे पिताजी ने मेरा विवाह कहीं और तय कर दिया है। अब मेरे विवाह की तैयारियां भी की जा रही हैं।”

यह देख दलपतशाह ने कीर्ति सिंह के राज्य पर हमला बोल दिया। महोबा की सैन्य संख्या ज्यादा होने के बाद भी दलपतशाह की शूरवीरता के आगे टिक नहीं सकी। इससे मुग्ध होकर कीर्ति सिंह ने अपनी बेटी का हाथ दलपतशाह के हाथों में देकर खुशी खुशी दोनों को विदा कर दिया।

 

रानी दुर्गावती की वीरता

विवाह के एक वर्ष बाद रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम वीरनारायण रखा गया। जब वीरनारायण मात्र 4 वर्ष का था, तब राजा दलपतशाह की मृत्यु हो गई। इस कारण वह बालक अपने पिता के प्रेम से वंचित हो गया। राजा की मृत्यु के बाद रानी ने पुत्र को सिंहासन पर बिठाया और सत्ता की बागडोर अपना हाथों में ले ली। राज्य के जनता के लिए तरह तरह के उन्नत कार्य किए। गोंडवाना राज्य के वैभव को देखकर आसपास के राज्यों को घृणा होनी लगी। आसपास के राजाओं ने सोचा कि एक नारी को आसानी से परास्त किया जा सकता है। लेकिन जब उन्होंने गोंडवाना राज्य पर हमला किया, तो उन राजाओं को आश्चर्य होने लगा। रानी ने सभी को परास्त कर दिया।

 

आगरा की कहानी

गोंडवाना राज्य के वैभव की खबर जब अकबर के कानों में पड़ी, तो उसने भी राज्य को अपने अधीन करने का स्वर्णिम स्वप्न देखा। चूंकि, वह एक वहशी दरिंदा भी था। उसने रानी के सुंदरता के बारे में सुन रखी थी। वह उन्हें देखना चाहता था और उनसे मिलना चाहता था। उसने सोचा गोडंवाना राज्य पर चढाई करके रानी को विवश किया जाए। विवश होकर रानी को आगरा आना ही पडेगा। बहुत सोच विचार के बाद उसने एक उपहार भेजा। उपहार बंद पिटारी में भेजा गया था। दुर्गावती ने जब पिटारी खोलकर देखा तो उसके अंदर एक चरखा रखा हुआ था। रानी बडी बुद्धिमानी थी। उन्होने अकबर के उपहार का अर्थ लगाया– स्त्रियों को घर में बैठकर चरखा चलाना चाहिए। उन्हें राज काज के झगडे में नही पडना चाहिए।

इसके जवाब में रानी दुर्गावती ने भी अपनी ओर से एक उपहार लकड़ी के बहुत बडे संदूक में अकबर के पास भेजा। अकबर ने जब संदूक खोलकर देखा तो उसके भीतर रूई धुनने की धन्नी और धुनने के लिए मोटा डंडा पाया।

अकबर के दरबारियो ने उसका अर्थ लगाया– तुम तो जुलाहे हो। तुम्हारा काम रूई धुनना और कपडे बुनना है। तुम्हे राज काज से क्या लेना है।

यह देखकर अकबर आगबबूला हो गया और उसने अब युध्द छेड़ने की बात सोची। अपने सेनापति आसफ खां को उसने तुरंत एक बड़ी सेना के साथ गोंडवाना राज्य पर आक्रमण कर रानी को बंधक बनाने का आदेश दे दिया। आसफ खां ने मोर्चेबंदी शुरू कर दी। युद्ध से पहले उसने सोचा कि रानी एक स्त्री हैं, इसलिए उसने समझाना उचित समझा। लेकिन एक वीर हिंदू नारी कहां उसकी बातों में आने वाली थी। उसने रानी को संदेश भेजा- ‘तुम बादशाह की अधीनता स्वीकार कर लो और आगरा चलो। तुम्हारा राज्य तुम्हारे ही पास रहेगा। बादशाह तुम्हें बहुत सी जागीरें प्रदान करेगें। आगरा में बडी धूम धाम से तुम्हारा स्वागत होगा।’ इस पर रानी ने उत्तर दिया- ‘मेरे देश की धरती को कोई भी दासता की बेडियों में नही बांध सकता। मैं अपने देश की स्वतंत्रा के लिए अंतिम सांस तक युद्ध करूंगी। तुम तो गुलाम हो। तुम अकबर की नौकरी छोड़कर मेरी सेना में आ जाओ। मैं तुम्हे अच्छा वेतन दूंगी।’

रानी का यह संदेश पाकर आसफ खां ने गढ़ामंडला पर चढ़ाई करनी शुरू कर दी। रानी भी घोड़े पर सवार होकर गढ़ामंडला की तरफ चल पड़ीं। दोनों सेनाओं में भयंकर युध्द होने लगा। लेकिन अचानक नदी में बाढ़ आ गई। इससे रानी दुर्गावती के अधिकतर सिपाही फंस गए। इसका लाभ उठाकर आसफ खां ने विरोधी सैनिकों को मारना शुरू कर दिया। रानी के बहुत सारे सैनिक मारे गये। खुद उनके 18 वर्षीय पुत्र वीरनारायण भी घायल हो गए। रानी ने अपने पुत्र को विश्वासपात्र सैनिकों के साथ चौरागढ़ के किले में भेज दिया। अब रानी के पास सिर्फ 300 सैनिक ही बच गए थे।

अपने 300 सैनिकों के साथ रानी, आसफ खां पर बिजली की तरह टूट पड़ीं। रण चण्डी की यह रूप दोनों हाथों में तलवार लिए मुगलों का संहार करती चली गयी। लेकिन तभी अचानक एक सनसनाता हुआ बाण रानी की आंख में आ लगा। उन्होंने बाण निकालकर बाहर फेंक दिया, लेकिन उसकी नोंक टूट कर आंख में ही रह गई। थोड़ी देर बाद एक दूसरा बाण उनकी दूसरी आंख में भी लग गया। अब रानी की दोनों आंखें फूट चुकी थीं। लेकिन ये हिंदू नारी की वीरता थी, जो कभी हार नहीं मानती। इसके बाद रानी घोड़े की लगाम अपने दांतों में दबा दोनों हाथों में तलवार ले मुस्लिम आक्रामणकारियों को मौत के घाट उतारतीं रहीं। उनका यह रूप देखकर आसफ खां पूरी तरह भयभीत हो गया।

आखिरी में एक बाण रानी की गर्दन में आकर लग गया और वह घोड़े से नीचे गिर पड़ीं। लेकिन रानी ने प्रण कर लिया था कि उनके जीते जी दुश्मन उनके शरीर को हाथ न लगा सकें और उन्होंने अपने प्रधानमंत्री आधार सिंह से कहा कि वो तलवार से उनकी गर्दन काट दे, लेकिन प्रधानमंत्री ने असमर्थता जता दी। इसके बाद रानी ने खुद अपनी कटार निकाली और उससे अपने जीवन का अंत कर लिया। स्वतंत्रा और अपनी मिट्टी की रक्षा के लिए लड़ते लड़ते दुर्गावती शहीद हो गयीं। उनके शौर्य और बलिदान ने उन्हें अमर बना दिया। आज ही के दिन यानी 24 जून, 1564 को रानी दुर्गावती का निधन हुआ था।

उनके शौर्य और उनके साहस को देखकर मुगल सम्राट अकबर का सेनापति आसफ खां भी विस्मित हो उठा था। उसने दांतों तले उंगली दबाते हुए विस्मय भरे स्वर में कहा था।– “कोई नारी भी इतनी शूरवीरा हो सकती है, मैने तो सोचा तक नही था।”

 

उनकी याद में आज भी बरेना में गीत गाए जाते हैं-

जब दुर्गावती रण को निकली,

हाथो में थी तलवारें दो,

गुस्से से चेहरा तांबा था,

आंखो से शरारें उडते थे,

घोड़े की वल्गा दांतों में,

हाथो में थी तलवारें दो…!

 

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