प्राचीनकाल से हिन्दू समाज शैव (शिव जी), शाक्त (शक्ति), वैष्णव (विष्णु), सौर (सूर्य) और गणपत्य सम्प्रदाय में विभाजित रहा है। श्रीगणेश के उपासक गणपत्य कहलाते हैं। गणपत्य संप्रदाय का प्रारंभ प्राचीन भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान तंत्र पूजा के रूप में हुआ था।

गणपत्य सम्प्रदाय के अधिकतर लोग महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक क्षेत्र में स्थित हैं। गणपत्य अनुयायी मानते हैं कि श्रीगणेश ही सर्वोच्च शक्ति हैं। इस मान्यता के आधार में एक पौराणिक सन्दर्भ है। उल्लेख है कि जब शिवपुत्र कार्तिकेय ने दानव तारकासुर का वध किया तब उसके तीनों पुत्रों तारकाक्ष, कामाक्ष और विद्युन्माली ने देवताओं से प्रतिशोध का प्रण किया। तीनों ने ब्रह्मा जी की गहन आराधना की। ब्रह्मा जी ने उनके लिए तीन पुरियों की रचना की जिसके कारण उन्हें त्रिपुरासुर कहा जाने लगा।गणपत्यों की मान्यता है कि त्रिपुरासुर-वध से पूर्व स्वयं शिव जी ने अपने पुत्र श्रीगणेश की आराधना की थी और इसलिए गणपति ही परमेश्वर है।

अष्टविनायक दर्शन
गणपत्य संप्रदाय की बुनियादी धारणाये गणपति उपनिषद में पढ़ी जा सकती है। इस ग्रन्थ में भगवान श्रीगणेश को निर्माता, संरक्षक, विनाशकारी और ब्रह्म के रूप में दर्शाया गया है। माना जाता है की श्रीगणेश का ताल्लुक शक्ति से भी है और इसलिए उन्हें शक्ति गणपति भी कहा जाता है। गणपत्य संप्रदाय के अनुयायी श्रीगणेश की प्रमुख शक्तियों पर आधारित पांच गूढ़ रूप का पूजन करते है जिस में अभ्यर्थी गणपति, महा गणपति, उर्ध्व गणपति, पिंगला गणपति और लक्ष्मी गणपति मुख्य हैं।

गणपत्य संप्रदाय का इतिहास एक हजार से अधिक वर्षों का है और इनके द्वारा लिखे हुए साहित्य हमें संप्रदाय की बुनियादी मान्यता,परंपरा और धारणाओं से अवगत कराते हैं। गणपत्य संप्रदाय के भीतर श्रीगणेश के अवतार की पूजन विधि को लेकर मतमतांतर थे। इसके परिणाम स्वरूप कई उप-संप्रदायों का निर्माण हुआ। आनन्दगिरि के संकरादिगविजय ने गणपति संप्रदाय के भीतर छह अलग उप समूहों का उल्लेख किया है। इन समूहों ने गणेश को ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया लेकिन उनके विवरण में फिर भी मतभेद रहे। पहले समूह ने महा गणपति को अंतिम वास्तविकता के रूप में पूजा की, सभी देवताओं के निर्माता और सर्वोच्च स्व, जो दस भुजाधारी और लाल रंग से सुशोभित थे। दूसरा समूह हरिद्र गणपति की पूजा करता था जो पीले रंग से सुशोभित थे। यह समूह की कल्पना के अनुसार श्रीगणेश चतुर्भुज, त्रिनेत्री है और सभी देवताओं के नेता है। तीसरे समूह ने श्रीगणेश को चार भुजा धारी अभ्यर्थी गणपति के रूप में पूजा। चौथे समूह ने सौम्य प्रकृति युक्त नवनिता गणपति की पूजा की। पांचवे समूह ने स्वर्ण गणपति और छठे समूह न शांत स्वरुप वाले शांता गणपति की आराधना की।

महाराष्ट्र में स्थित पुणे शहर से 50 किमी के अंतर पर बसे हुए मोरगांव की गणना प्राचीनकाल से ही गणपत्य सम्प्रदाय के प्रमुख स्थानों में होती आ रही है। कर्णाटक से मोरगाव आ कर बसने वाले वामनभट और पार्वतीबाई परम्परा से गणपत्य सम्प्रदाय के अनुयायी थे। इनके सुपुत्र मोरया गोसावी 14 वीं शताब्दी के महान गणेश भक्त थे। पुणे के समीप चिंचवड़ में इन्होंने कठोर गणेशसाधना की। कहा जाता है कि मोरया गोसावी ने यहां जीवित समाधि ली थी। तभी से यहां का गणेश मन्दिर देश भर में विख्यात हुआ और गणेश भक्तों ने गणपति के नाम के साथ मोरया के नाम का जयघोष भी शुरू कर दिया। गणेश चतुर्थी पर “गणपति बप्पा मोरिया” का नारा आपने लगाया होगा, यह नारा “गणपत्य समुदाय” का हैं जो मोरया गोसावी के नाम से बना।

संत मोरया गोसावी
लगभग 10 वीं शताबदी में गणपत्य संप्रदाय अपने चरम पर था। इन्होने सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों और धार्मिक अनुष्ठानों के प्रारंभ में संतुष्ट किए जाने वाले महत्त्वपूर्ण देवता के रूप में श्रीगणेश की स्थापना की। गणपत्या संप्रदाय के अनुयायियो ने श्रीगणेश को समर्पित कई मंदिर बनवाए। इनमे से सबसे प्रमुख उच्चि-पिल्लैयार कोविल मंदिर है जो तिरुचिरापल्ली (तमिलनाडु) में स्थित है। इस मंदिर को चट्टानों को काटकर बनाया गया है।

गणपत्य संप्रदाय के अनुयायी श्रीगणेश की पूजा उनकी मूर्ति के समक्ष फल-फूल अर्पित कर, ध्यान के द्वारा या बिना ध्यान किए करते है। गणपत्य संप्रदाय के सदस्य माथे पर गोल लाल टीका लगाते हैं और कंधों पर हाथी के सिर और दांत का चिह्न अंकित करवाते हैं। गणेश पुराण,
गणेश गीता और मुद्गल पुराण गणपत्य संप्रदाय के मुख्य धर्म-पुस्तक है। वर्तमान समय में काफी कम लोग गणपत्य संप्रदाय में विषय में जानकारी रखते हैं। हालाकि, हिंदू धर्म के सभी प्रमुख मंदिरों में प्रथम पूज्य गणेश जी की प्रतिमा पायी जाती है।

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