भारत जब आजाद हुआ तो इस देश का इतिहास लिखना शुरू किया गया। इतिहासकारों में बड़े बड़े बुद्धिजीवी शामिल थे। लेकिन अगर आप इन बुद्धिजीवियो द्वारा लिखित इतिहास पढेंगे, तो एक बात आपको पता चलेगी कि इन इतिहासकारों ने इस्लामी तथा विदेशी आक्रांताओं का खूब महिमामंडन किया। मुहम्मद बिना कासिम, गजनवी, लोदी, तुगलक, खिलजी, मुगल, आदि को इस तरह चित्रित किया गया, जैसे इनके आक्रमण के पहले भारत एक बंजर देश था और इन्होंने आकर हरा भरा कर दिया। एक आम भारतीय अगर 10 मुस्लिम शासकों के नाम जानता है, तो मात्र 2-3 हिन्दू शासकों के ही नाम जानता है।

यदि कक्षा 7वीं या 8वीं के किसी विद्यार्थी से आप पूछें कि औरंगजेब के पिता का क्या नाम था? वह बच्चा तुरंत औरंगजेब से लेकर बाबर तक सबका नाम बता देगा। लेकिन अगर उसी बच्चे से आप सम्राट अशोक, सम्राट हर्षवर्धन, दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान के पिता का नाम पूछिए, नहीं बता पाएगा। क्योंकि किताबों में पढाया ही नहीं गया। भारतीय इतिहास को आप यदि टटोलना शुरू करें, तो आपको उन तमाम हिन्दू राजाओं के नाम एवं उनकी महानता के बारे में मालूम पड़ेगा, जिनका नाम आपने सुना नहीं होगा और ना ही किसी स्कूली किताबों में देखा होगा।

आज हम आपको एक ऐसे ही इतिहास में दफन कर दिए गए महान हिंदू सम्राट “ललितादित्य मुक्तपीड” के बारे बताने वाले हैं।

जनिये कौन थे ललितादित्य मुक्तपीड?

ललितादित्य मुक्तपीड “कार्कोटा वंश” के कश्मीर के महान हिन्दू सम्राट थे। इनका कार्यकाल 724 ईस्वी से 760 ईस्वी तक था। कार्कोटा एक नाग का नाम है। ये नागवंशी कर्कोटक क्षत्रिय थे। इसी कुल में जन्म लेने वाले इस हिंदू सम्राट ने अपने पराक्रम से हर विदेशी आक्रांताओं को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। सत्ता संभालते ही ललितादित्य ने मुसलमान आक्रमणकारियों को पश्चिम के कैस्पियन सागर तक खदेड़ दिया था। इन आक्रांताओं के भीतर इनका भय इस कदर व्याप्त हो गया था कि इनके शासनकाल के बाद भी कई वर्षों तक किसी मुसलमान ने भारत की तरफ आंख उठाकर नहीं देखी।

ललितादित्य का विजय अभियान

ललितादित्य के काल में कश्मीर का विस्तार मध्य एशिया और बंगाल तक पहुंच गया। उन्होंने अरब के मुसलमान आक्रान्ताओं को सफलतापूर्वक दबाया तथा तिब्बती सेनाओं को भी पीछे धकेला। इन्होंने पंजाब के राजा यशोवर्मन को भी हराया जो हर्ष का एक उत्तराधिकारी था। वीरता के साथ साथ इनकी लोकप्रियता इतनी थी कि जब इन्होंने पंजाब की तरफ कूच किया, तो वहां की जनता ने इनके सम्मान में पलक पांवड़े बिछा दिए। इसके बाद इन्होंने अपने विजय अभियान को आगे बढाते हुए बिहार, बंगाल और उड़ीसा तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। पश्चिम में यह विजय अभियान राजस्थान, गुजरात, मालवा होते हुए महाराष्ट्र तक जा पहुंचा।

इतिहासकार आरसी मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘एंशियंट इंडिया’ में लिखा है कि दक्षिण और पश्चिम की इन महत्वपूर्ण विजयों के बाद ललितादित्य ने कश्मीर की उत्तरी सीमाओं पर स्थित क्षेत्रों पर ध्यान दिया। आठवीं सदी के शुरू होते ही अरबी मुसलमानों का आक्रमण काबुल घाटी को चुनौती दे रहा था। इसी दौरान सिंध के रास्ते से मुस्लिम शक्ति उत्तर की ओर बढ़ने का प्रयास कर रही थी। लेकिन ललितादित्य ने कश्मीरियों और बौध्द भिक्षुओं की मदद से उन सभी आक्रामणकारियों सिर्फ रोके नहीं रखा, अपितु पश्चिम के कैस्पियन सागर के पार पहुंचा दिया।

इतिहासकार गोपीनाथ श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक “कश्मीर” में लिखा है कि ललितादित्य के शासनकाल में समाज बहुत सुखी एवं सम्पन्न था। एशिया के प्राय: सभी देशों के साथ खुली व्यापार व्यवस्था थी। खेती के लिए अनेक सुविधाएं थीं और अनेक नवीन खोजें की गईं। जलसंचार योजना को महत्व दिया गया। ललितादित्य ने विदेशों में अपने विजय स्मृति स्थल बनवाए।

कला संस्कृति के भी थे शौकीन

ललितादित्य को केवल विजय पताका फहराने में ही रुचि नहीं थी, बल्कि उन्हें कला-संस्कृति से भी अत्यंत लगाव था। कश्मीर में भगवान सूर्य को समर्पित मार्तण्ड मंदिर इसका जीता जागता उदाहरण है। इस मंदिर को कश्मीर के सबसे शक्तिशाली और सुंदर मंदिर परिसर के रूप में माना जाता है। हिंदू होने के बावज़ूद ललितादित्य ने कई बुध्द विहारों की स्थापना की।

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क्यों नहीं जानता इनके बारे में एक आम भारतीय?

हैरानी की बात है कि अनेकों उपलब्धियों के बाद भी ललितादित्य को आम भारतीय नहीं जानता है। एक ओर जहाँ मुगलों पर अनगिनत फिल्में और धारावाहिक बन चुके हैं, वहीं इस महान हिंदू सम्राट का महिमामंडन किसी स्कूल के किताब में नहीं किया गया। क्या यह महज संयोग की बात है या ऐसा जान बुझ कर किया गया है? यदि कश्मीर के एक हिंदू राजा की विश्व विजय गाथा प्रसिद्ध हो गई तो क्या इसका असर आज की कश्मीर समस्या के परिपेक्ष्य में भारत के पक्ष में न हो जाए, ऐसा सोच कर इस विजय गाथा को दबाया तो नहीं गया? खैर, कारण चाहे कुछ भी हों, लेकिन आज के इंटरनेट के जामने में कुछ भी असंभव नहीं है। आज की युवा पीढी से ये चीजें छुपाई नहीं जा सकतीं। पिछले कुछ वर्ष में भारत में जिस तरह परिवर्तन हो रहा है, उससे स्पष्ट है कि जल्द ही ललितादित्य पर फिल्म और किताब भी अवश्य आएगी।

इस महान हिंदू सम्राट के साथ कश्मीर में हिन्दू स्वाभिमान का स्वर्ण युग प्रारंभ हुआ। हिन्दू धर्म की विशालता, सहिष्णुता का प्रतीक बन गया था सम्राट ललितादित्य। इस आभा को बाद के मुस्लिम आक्रांताओं ने बर्बाद कर दिया।

आज मुस्लिम देशों के इशारे एवं मदद से जो कश्मीरी युवक आतंकी जिहाद का झंडा उठाकर अपने ही पूर्वजों की सर्वश्रेष्ठ धरोहर से मुंह मोड़कर इस नंदनवन को मजहबी आग में जला रहे हैं, वे भारतीय संस्कृति, हिन्दुत्व, मानवीय, कश्मीरियत को दफन कर रहे हैं।

 

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  1. लोग तो सारागढ़ी के युद्ध के बारे में भी नहीं जानते जहाँ सिर्फ 21 सिक्खों ने 10000 से ज्यादा अफ़ग़ानों का मुकाबला किया था, और जिस युद्ध को यूनेस्को ने 5 बेस्ट एंडेड बेटल्स में शामिल किया है