पिछले दिनों जब पाकिस्तान से हमारे विंग कमांडर अभिनंदन अटारी बार्डर के रास्ते भारत आये तबसे अटारी-बाघा बार्डर गूगल पर सबसे ज़्यादा सर्च की जानी वाली जगह बनी हुई हैं। भारत पाकिस्तान के बीच 1947 मे जब विभाजन हुआ तो अटारी और बाघा इन दोनों गांवों के बीच सीमा बनी, बाघा गांव पाकिस्तान की साइड चला गया और अटारी हमारी तरफ रह गया। आज आपको हम इस अटारी बॉर्डर से जुड़ी ऐसी कहानी बतायेंगे जिसे पढ़कर आप गर्व से भर उठेंगे। अफसोस की हमारे इतिहासकार बलात्कारी और क्रूर विदेशी आक्रमणकारियों का ही महिमा मंडन करते रहे हैं, उन्होंने हमेशा भारतीयों के अंदर उत्साह जगाने वाले महापुरुषों की अनदेखी की।

ऐसे ही एक महान पुरुष थे जनरल सरदार श्याम सिंह अटारीवाला, भारत के गौरवशाली इतिहास का ऐसा चमकता हीरा जिसकी कहनिया नसों में बिजली भर देती हैं। 1790 में इनका जन्म अटारी गांव में हुआ था और ये महाराज रणजीत सिंह की सेना में 5 हजार घुड़सवार सेना के जनरल थे। युद्धों में इनकी बहादुरी से खुश होकर महाराज रणजीत सिंह ने इन्हें कश्मीर का गवर्नर भी बनाया था। यह वही दौर था जब अंग्रेजी हुकूमत भारत मे अपने पैर पसारने में लगी हुई थी। जब तक महाराज रणजीत सिंह जिंदा थे तब तक पंजाब के राज्य की तरफ कभी अंग्रेजो ने आंख नही उठायी लेकिन उनके मरने के बाद अंग्रेजो ने अपनी कुटिल चाले पंजाब में खेलनी शुरू कर दी। 13 दिसम्बर 1845 को लार्ड हार्डिंग ने अंग्रेज फ़ौज को पंजाब पर आक्रमण का आदेश दिया। अंग्रेज अपने छल और सिक्ख सेना अपने गद्दार सेनापतियों की वजह से सिक्ख सेना की अलीवल युद्ध मे निराश कर देने वाली पराजय हुई।

9 फरवरी 1846 को सतलुज नदी के किनारे सभरावा में अंग्रेजो के विरुद्ध 60 साल के बुढ़े शेर शाम सिंह ने हुंकार भरी और 15 हजार सैनिकों के साथ अंग्रेजो की विशाल सेना के सामने डट गए। लेकिन अंग्रेजो ने यहां भी छल किया, उन्होंने रात में ही सेना पर हमला बोल दिया। जिसका सिक्ख सैनिकों ने जबरदस्त जवाब दिया। इतिहास गवाह हैं कि यह युद्ध अंग्रेज बुरी तरह से हारते लेकिन सिख सेना के कुछ सेनानायकों ने बीच युद्ध मे ही धोखा दे दिया। सिक्ख सेनानायक तेजसिंह सिक्ख सेना के गोला बारूद में आग लगाकर अपनी टुकड़ी के साथ पीछे हट गया। गोला-बारूद के बिना तोप-बन्दूकें बेकार साबित हो रहीं थीं। अब सिखों ने अपनी चिर-संचिनी तलवार को सम्भाला और अटारी के भीम-विक्रमी बूढ़े सरदार श्यामसिंह की उत्तेजना से, मदमत्त हस्तियों की भांति, अंग्रेजी सेना पर आक्रमण किया।सरदार श्यामसिंह सेना के प्रत्येक भाग में आक्रमण करके अपने साथियों का उत्साह बढ़ाने लगे।

भीषण रक्तपात हुआ। सरदार शाम सिंह की तलवार बिजली की भांति चलती थी। 10 फरवरी को युद्धभूमि में सरदार शाम सिंह ने 50 वीरो के साथ अंग्रेज सेना पर टूट पड़े और उच्चकोटि की वीरता का प्रदर्शन करते हुए अपने प्राण उत्सर्ग कर दिए।

पैतृक गांव अटारी में उनका अंतिम संस्कार हुआ, और वही स्मारक बना। आज भी उनके बलिदान दिवस पर पंजाब सरकार बहुत से कार्यक्रम आयोजित करती हैं। भारत सरकार को 60 साल बाद ध्यान आया कि दरअसल वाघा नाम का गांव तो पाकिस्तान के हिस्से में आता है जबकि इस सीमा क्षेत्र के भारत की ओर वाले हिस्से को अटारी कहा जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए अब यह निर्णय लिया गया है कि भारत में स्थित सीमा क्षेत्र को अटारी बॉर्डर कहा जाएगा। अटारी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर श्याम सिंह रेलवे स्टेशन कर दिया है। इसलिए बाघा बार्डर नही उसे अटारी बार्डर कहिये, और यह गौरवशाली इतिहास याद रखिये।

Source :

जाट इतिहास ठाकुर देशवाल पेज 334-338, सिक्ख इतिहास,

http://en.wikipedia.org/wiki/Sham_Singh_Attariwala Page at Wikipedia]

[http://www.sikh-history.com/sikhhist/warriors/attari.html “Sikh History” website]

[http://www.sikhphilosophy.net/history-of-sikhism/5465-sham-singh-atariwala-one-heroes-khalsa.html Sikh Philosophy Network]

[http://en.wikipedia.org/wiki/Battle_of_Sobraon Battle of Sobraon]