बात सन 1946 की है, जब द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् ये तय हो चूका था कि अब हिंदुस्तान को आजादी मिलने वाली है, अंग्रेज अब वापस जाना चाहते हैं…सत्ता के हस्तांतरण की बात शुरू हो चुकी थी, और सियासी पारा स्वतंत्र हिंदुस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री की खोज में चढ़ चूका था |

19 सितम्बर 1945 को ही वाइसराय वैवेल ने हिंदुस्तान में आम चुनाव की घोषणा की थी, तो ये लगभग तय भी हो चूका था की इन आम चुनावों में जीतने वाली या सबसे बड़ी पार्टी ही आजाद हिंदुस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री का नाम तय करेगी | 1946 के आम चुनावों में इंडियन नेशनल कांग्रेस(INC) सबसे बड़ी पार्टी बन के उभरी, 1585 सीटों में 923 सीट इंडियन नेशनल कांग्रेस की झोली में गिरे थे, इस समय मौलाना आजाद INC के अध्यक्ष थे जो की 1940 से 1946 तक अध्यक्ष रहे, 425 मुस्लिम बहुल सीटों पर जीत के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम लीग जिन्ना को नेता मान चुके थे, यही पाकिस्तान बनने की बात को भी बल मिल चूका था, ज्यादातर सभाओं में पाकिस्तान का जिक्र होने के साथ ही उसके नक़्शे और नेता का भी जिक्र होने लगा था | तय था की हिंदुस्तान का धर्म के आधार पर बंटवारा कर दिया जायेगा | लेकिन जो बात महत्वपूर्ण थी, वो थी की आजाद हिंदुस्तान का प्रथम प्रधानमंत्री कौन होगा, क्योंकि वो सदैव के लिए इतिहास रचेगा !!!

चूँकि INC आम चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बन के उभरी थी, तो इसके अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए माहौल तल्ख़ हो चूका था, क्योंकि वो व्यक्ति ही आजाद हिन्दुतान का प्रथम प्रधानमंत्री होता | INC के अध्यक्ष का चुनाव हिंदुस्तान के आम चुनावों से भी ज्यादा महत्ववपूर्ण हो गया था, कांग्रेस अध्यक्ष के चुनावों की घोषणा हुई, मौलाना आजाद ने फिर से चुनाव में परचा दाखिल करने की इच्छा जाहिर की, ये बात मोहनदास गाँधी को नागवार गुजरी और उन्होंने मौलाना आजाद से अपना नाम वापस लेने को कहा, हालाँकि मौलाना आजाद तब खुद अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर चुके थे और उन्होंने ये कई जगह अपनी आत्मकथा में लिखी भी है, लेकिन गाँधी की इज्जत करते हुए थोड़ा सीधे ढंग से इसका वर्णन नहीं किया:

“The question normally arose that there should be fresh Congress elections and a new President chosen. As soon as this was mooted in the Press, a general demand arose that I should be selected President for another term…. There was a general feeling in Congress that since I had conducted the negotiations till now, I should be charged with the task of bringing them to a successful close and implementing them.”1

मौलाना आजाद जी के अध्यक्ष बनने की इच्छा से उनके ही करीबी मित्र जवाहर लाल नेहरू दुखी हो गए, जिनकी इच्छा थी खुद अध्यक्ष बनने की, वही मोहनदास गाँधी भी अपनी 20 अप्रैल 1946 को एक सभा में ये बता चुके थे की उनकी प्राथमिकता जवाहर लाल नेहरू हैं, जबकि उस समय की पूरी कांग्रेस की पसंद नेहरू नहीं थे, कांग्रेस में ज्यादातर की पसंद सरदार वल्लभभाई पटेल थे | पूरी कांग्रेस पटेल साहब, मौलाना आजाद या किसी तीसरे को अध्यक्ष बनाना चाहती थी लेकिन नेहरू को कोई भी नहीं चाहता था सिवाय मोहनदास गाँधी के |

अंतत 20 अप्रैल 1946 को मोहनदास गाँधी ने मौलाना आजाद को पात्र लिख कर कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव के पीछे हटने को कहा :

“Please go through the enclosed cuttings.… I have not spoken to anyone of my opinion. When one or two Working Committee members asked me, I said that it would not be right for the same President to continue…. If you are of the same opinion, it may be proper for you to issue a statement about the cuttings [the news item Gandhiji had sent him] and say that you have no intention to become the President again…. In today’s circumstances I would, if asked, prefer Jawaharlal. I have many reasons for this. Why go into them?”2

कांग्रेस के ज्यादातर बड़े से छोटे नेता, प्रांतीय प्रमुख और दल उस समय सरादर वल्लभभाई पटेल को कद्दावर, दक्ष नेता होने के साथ ही जमीन से जुड़ा हुआ मानते थे, उनके मुताबिक अध्यक्ष पद के साथ ही प्रथम प्रधानमंत्री पटेल जी को ही बनना चाहिए | उनके मुताबिक हिंदुस्तान को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जरुरत है |

खैर कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव की अपने पसंद के नाम के साथ परचा दाखिल करने की अंतिम तारीख 29 अप्रैल 1946 निर्धारित थी, तब तक मोहनदास गाँधी ने सभी प्रांतों को अपनी पसंद के तौर पर जवाहर लाल नेहरू का नाम बता दिया था | ;लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस की 15 प्रदेश कमेटियों के 15 वोट में से 12 वोट सरदार वल्लभ भाई पटेल को गए, 2 वोट आचार्य कृपलानी को और एक वोट गया था पट्टाभि सीतारमैया | मोहनदास गाँधी और जवाहर लाल नेहरू हैरान थे, की उनको जीरो वोट मिले थे | लेकिन इतना होने के पश्चात् भी मोहनदास नेहरू को ही प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, मोहनदास ने सब वोट नेहरू के नाम करने के काम पर कृपलानी जी को लगाया और कहा की नेहरू ही प्रधानमंत्री बनाना चाहिए, कृपलानी ने प्रदेश कांग्रेस कमिटियों को 29 अप्रैल 1946 की मीटिंग में नेहरू के पक्ष के लिए मनाना शुरू किया,  सभी प्रदेश कमिटियों ने नेहरू के पक्ष में वोट देने से मन कर दिया, हालाँकि कृपलानी कुछ एक छोटे नेताओं को नेहरू के नाम के लिए मना चुके थे, लेकिन कोई भी बड़ा नेता इसके लिए तैयार नहीं हुआ | अंततः जब वोट की समय सीमा निकल गयी और नेहरू के पक्ष में जीरो वोट पड़े तो मोहनदास गाँधी ने कृपलानी को अपने वोट नेहरू को हस्तांतरित करने को कहा , चूँकि कृपलानी मोहनदास के करीबी थे तो उन्होंने ऐसा ही किया | इसके बाद कृपलानी और मोहनदास ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को अपने वोट भी नेहरू को देने के लिए कहा, पटेल साहब ने मोहनदास का मन रखते हुए अपने वोट नेहरू को दे दिए |

1946 के कांग्रेस के 54वे मेरठ अधिवेशन में, सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मोहनदास के इस कदम से अपनी नाखुशी जाहिर की, लेकिन ये नेहरू को पसंद नहीं आया और नेहरू ने सरदार पटेल के खिलाफ माहौल बनाना शुरू कर दिया | 54वें मेरठ अधिवेशन में सरदार पटेल ने अपने पब्लिक भाषण में कहा था कि अहिंसा ठीक है, लेकिन अगर जरुरत पड़े तो तलवार उठाने से मत हिचकना | अगर बात जान और सम्मान की हो तो तलवार उठाइये | नेहरू ने इसी भाषण का सरदार पटेल के खिलाफ इस्तेमाल किया और कहा की सरदार पटेल हिंसा का समर्थन कर रहे हैं | सभी जानते थे, की समाज में और कांग्रेस में सरदार पटेल का ओहदा नेहरू से कहीं बड़ा था, लेकिन नेहरू ने इस भाषण को पटेल के खिलाफ इस्तेमाल कर के उनकी गलत छवि प्रचारित करनी शुरू कर दी और साथ ही मोहनदास गाँधी के मन में पटेल जी के खिलाफ जहर भरना शुरू कर दिया था | अगले ही महीने दिसंबर 1946 में नेहरू ने पटेल जी को पत्र लिख कर कहा की आप हिंसा का समर्थन कर रहे हैं , जिसके जवाब में पटेल जी ने मोहनदास गाँधी को पत्र लिख कर साफ़ कहा है, कि मोहनदास गाँधी जी मुझे पता है, कि आपके मन में मेरे प्रति जहर कौन भर रहा है, क्या आप नेहरू और मृदुला सारा भाई का साथ छोड़ देंगे, उन्होंने मेरे भाषण को गलत तरह से प्रचारित किया है…क्या आप अपने विवेक से फैसले लेना शुरू करेंगे ?

उस समय के एक बाद पत्रकार जो बाद में काफी विवादित भी रहे दुर्गा दास जी ने मोहनदास गाँधी से ये प्रश्न किया था की गाँधी जी १२ प्रांतीय अध्यक्षों के खिलाफ रहते हुए भी आपने नेहरू को प्रधानमंत्री के लिए क्यों चुना ? जब राजेंद्र प्रसाद जी जैसे बड़े नेता भी सरदार पटेल को प्रथम प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं तो फिर भी आपने सबकी इच्छा के खिलाफ जाकर नेहरू को प्रधानमंत्री बनवाने की इतनी प्रबल इच्छा क्यों, ये तो जनभावना के खिलाफ है, क्या आप लोकतंत्र के साथ नहीं खड़े होना चाहते ? क्या जीरो वोट से आये नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना सही होगा ? ऐसी क्या वजह है की आप जवाहर लाल नेहरू के पक्ष में हैं ? मोहनदास गाँधी का जवाब था की जवाहर लाल नेहरू अंग्रेजी अच्छी बोलते हैं !!!

  1. Maulan Abul Kalam Azad, 1957 India Win Freedom,p. 161.
  2. Rajmohan Gandhi, 1991, Patel: A Life, Ahmedabad, p. 369.