आप सभी जानते हैं कि भारत में मुगल काल की स्थापना सन् 1526 में आक्रामणकारी बाबर के आक्रमण के बाद हुआ। उसके बाद मुगलों ने भारत पर स्वतंत्रता संग्राम के पहली युध्द तक भारत पर राज किया। इनके बारे में हमें इतिहास में पढाया गया, लेकिन सिर्फ उनकी झूठी महानता, अत्याचारों के बारे में नहीं पढा़या गया।

खैर, ये सब छोड़िए। आज हम आपको बताते हैं, उस युवती के बारे में जो जन्म से और धर्म से मुस्लिम तो थी, पर ह्रदय से सच्ची श्रीकृष्ण भक्त। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारतीय इतिहास के सबसे क्रूर तानाशाह औरंगजेब की भतीजी- “ताज बेगम” के बारे में। कहा जाता है कि ताज बेगम, मीरा से भी बड़ी भक्त थीं।

 

कौन थीं ताज बेगम?

ताज़ बेगम प्रसिद्ध मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की भतीजी थीं। ताज़ बेगम ने जब क़ुरान पढा तो उन्हें लगा कि औरंगजेब प्रतिदिन यही क़ुरान पढकर हिंदूओं का कत्लेआम करता है और मंदिरों को तुड़वाता है। जिसमे स्पष्ट लिखा था कि काफिरों को मारो। इससे आहत होकर ताज़ बेगम ने ‘कृष्ण भक्ति’ की दीक्षा ले ली। वह श्रीकृष्ण के प्रेम लीन होकर बहुत ही सुंदर पद गाती थीं। ताज़ बेगम के कृष्ण-भक्ति के पदों ने तो मुस्लिम समाज को सोचने पर विवश कर दिया था, जिसके कारण मुग़लिया सल्तनत में हलचल मच गई। ताज़ बेगम जिस तरह से कृष्ण-भक्ति के पद गाती थीं, उससे कट्टर मुस्लिमों को बहुत कष्ट होता था। ताज़ बेगम की भक्ति देखकर औरंगजेब की पुत्री ने “जेबुन्निसा बेगम” ने भी ‘कृष्ण भक्ति’ की दीक्षा ले ली।

 

कैसे बनीं ताज बेगम कृष्ण भक्त?

एक दिन ताज बेगम आगरा से पालकी में आरूढ़ होकर कहीं जा रही थीं, तो उन्होंने एक जगह देखा कि एक ऊंचे चबूतरे पर आसनस्थ कोई महाशय ऐसी कथा कह रहे थे कि कहीं एक भी पत्ता तक नहीं हिल रहा था। सैकड़ों श्रोतागण कथा का रसपान करने में पूरी तरह लीन थे और स्वयं को भूल चुके थे। ये देखकर ताज़ बेगम ने सोचा कि इस कथा में ऐसी क्या खूबी है, जिसे सुनने वाले सभी भाव-विभोर हैं? तभी उनके कानों में भी ब्रज-वल्लभ कन्हैया के विषय में कोई रोचक प्रसंग आ पहुंचा। उन्होंने तुरंत अपनी पालकी रूकवाई और देर तक उस कथा का रुचिपूर्वक रसपान करती रहीं।

जब उन्हें श्रीकृष्ण लीला की कुछ ऐसी आकर्षक और चित्त हारिणी जानकारी हुई, तो उन्हें लगा, ओह! हिन्दूओं का यह कृष्ण-कन्हैया इतना अनोखा, अद्भुत, सुंदर, सौम्य, लुभावना रूप है कि सच में ब्रज की स्त्रियाँ-पुरुष रास्ता चलना भूलकर मोहन के प्रेम में लीन हो जाते होंगे। जब ताज़ बेगम कुछ देर तक वहां कन्हैया की विलक्षण-लीला की कथा सुन रही थीं, तब कथा सुनने आए हिन्दूओं ने उन्हें देखकर सोचा कि इस बादशाह की लड़की को क्या हो गया है? यह शहज़ादी पालकी रूकवाकर सुध-बुध खोकर इस तरह श्रीकृष्ण के लीला की कथा सुनने क्यों बैठी है? पर ताज बेगम तो मुरलीधर की लीलाओं में इस कदर खो चुकी थीं कि उन्हें वहां खड़े किसी की भी बात सुनाई नहीं दे रही थी। उनके मन में मुरलीवाले की ऐसी छवि आ रमी थी कि उस वक्त वह सबकुछ भूलकर सिर्फ उस बांसुरी वाले की बात सोच-सोचकर व्याकुल हुई जा रही थीं। जिसके लिए बरसाने की राधा ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। शहज़ादी के मन में ऐसी तड़प उत्पन्न हो गई कि, “काश! मुझे भी राधा की सखी-सहेली होने और उसी के रास्ते पर चलने का अवसर मिला होता, तो जीवन भर उस नंदलाला के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर देती और उसी के इशारे पर अपनी जिंदगी कुर्बान कर देती।”

ये सब देखकर वहां खड़े लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली। पर ताज़ बेगम को तो उस वक्त ये भी ध्यान ना रहा कि वह तो पक्की मुसलमान है, कलमा-नमाज़ की पाबंद है, रोज़ेदार है और सबसे बड़ी बात यह कि एक कट्टर मुसलमान और धर्मांध शासक की पुत्री हैं। जब कथा का समापन हुआ और व्यास जी उठकर चले गए और सभी लोग चले गए, तो उन्होंने अपनी पालकी आगे बढाने को कहा। लेकिन वह दिन, वह क्षण, ये सब उनके लिए अमिट हो गया। वह दिन-रात नंदलाला के प्रेम में खोई रहने लगीं। उनका यह रूप देखकर मुगलिया सल्तनत में हलचल मच गई। औरंगजेब ने उन्हें ये सब करने से रोकने के लिए कई योजनाएं बनाईं, यहां तक कि मारने की कोशिश भी की। लेकिन कहते हैं कि जिसकी रक्षा ईश्वर करते हैं, उसका दुनिया की कोई शक्ति कुछ बिगाड़ नहीं सकती। मीरा की तरह वह भी बचती गयीं।

अब नंदलाला के प्रत्यक्ष दर्शनों की कामना उनके रोम-रोम को बेचैन कर रही थी कि, “हे सांवले, सलोने, नंदकुमार! मैं कब तुम्हारा दर्शन कर पाऊंगी? वह सुनहरा दिन कब आएगा?” फिर ताज़ बेगम ने अपने प्राणों कि पीर इन शब्दों में व्यक्त किया-

 

छैल जो छबीला, सब रंग में रंगीला

बड़ा चित्त का अड़ीला, कहूं देवतों से न्यारा है।।

माल गले सोहै, नाक-मोती सेत जो है कान,

कुण्डल मन मोहै, लाल मुकुट सिर धारा है।।

दुष्टजन मारे, सब संत जो उबारे ताज,

चित्त में निहारे प्रन, प्रीति करन वारा है।।

नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा,

वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है।।

सुनो दिल जानी, मेरे दिल की कहानी तुम,

दस्त ही बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं।।

देवपूजा ठानी मैं, नमाज हूं भुलानी,

तजे कलमा-क़ुरान साड़े गुननि गहूंगी मैं।।

नन्द के कुमार, कुरबान तेरी सुरत पै,

हूं तो मुगलानी, हिंदुआनी बन रहूंगी मैं।।

 

मुल्लाओं ने जब शरिया की दुहाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया

अब शरअ नहीं मेरे कुछ काम की, श्याम मेरे हैं, मैं मेरे श्याम की,

बृज में अब धूनी रमा ली जायेगी, जब लगन हरि से लगा ली जायेगी।।

 

और आगे वह कहती हैं –

अल्ला बिस्मिल्ला रहमान औ रहीमी छोड़,

पुर वो शहीदों की चर्चा चलाऊँगी।।

सूथना उतार, पहन घाघरा घुमावदार,

फ़रिया को फार शीश चुनरी चढ़ाऊंगी।।

कहत है ताज कृष्ण सों पैजकर,

वृन्दावन छोड़ अब कितहूँ न जाउंगी।।

बांदी बनूंगी महारानी राधा जू की,

तुर्कनी बहाय नाम गोपिका कहाउंगी।।

 

ऐसी विलक्षण दीवानी, श्रीकृष्ण के प्रेम में पगी राधिका बनने को व्याकुल थीं ताज़ बेगम कि उन्हें मुस्लिम समाज द्वारा अपनी बदनामी होने का भी बिल्कुल डर नहीं था।

 

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