भाग-3

जिस समय अयोध्या में मस्जिद निर्माण का कार्य चल रहा था उसी समय अयोध्या से 6 मील की दूरी पर सनेथू नाम के एक गाँव के पंडित देवीदीन पाण्डेय ने वहां के आसपास के गांवों सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय क्षत्रियों को युद्ध के लिए एकत्रित करना शुरू किया। देवीदीन पाण्डेय ने सूर्यवंशीय क्षत्रियों से कहा “भाइयों आप लोग मुझे अपना राजपुरोहित मानते हैं, आप के पूर्वज श्री राम थे और हमारे पूर्वज महर्षि भारद्वाज जी। आज मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि को मुसलमान आक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं और खोद रहे हैं इस परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने की बजाय जन्मभूमि की रक्षार्थ युद्ध करते करते वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा।” उनके इन जोशीले भाषणों का राजपूतो पर गहरा प्रभाव पड़ा और देखते ही देखते देवीदीन पाण्डेय के नेतृत्व में दो दिन के भीतर 90 हजार क्षत्रिय इकट्ठा हो गए। दूर दूर के गांवों से लोग समूहों में इकट्ठा हो कर देवीदीन पाण्डेय के नेतृत्व में जन्मभूमि पर जबरदस्त धावा बोल दिया। शाही सेना से लगातार 5 दिनों तक युद्ध हुआ। छठे दिन मीरबाकी का सामना देवीदीन पाण्डेय से हुआ उसी समय धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक लखौरी ईंट से पाण्डेय जी के सर पर वार कर दिया। देवीदीन पाण्डेय का सर बुरी तरह फट गया मगर उस वीर ने अपने पगड़ी से खोपड़ी को बाँधा और तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया। इसी बीच मीरबाकी ने छिपकर गोली चलायी जो पहले ही से घायल देवीदीन पाण्डेय जी को लगी और वो जन्मभूमि की रक्षा में वीर गति को प्राप्त हुए। जन्मभूमि फिर से 90 हजार हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। देवीदीन पाण्डेय के वंशज सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का पुरवा नामक जगह पर अब भी मौजूद हैं।

देवीदीन पाण्डेय की मृत्यु के 15 दिन बाद हंसवर के महाराज रणविजय सिंह ने सिर्फ 25 हजार सैनिकों के साथ मीरबाकी की विशाल और शस्त्रों से सुसज्जित सेना से रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया। 10 दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए। जन्मभूमि में 25 हजार हिन्दुओं का रक्त फिर बहा। रानी जयराज कुमारी हंसवर के स्वर्गीय महाराज रणविजय सिंह की पत्नी थीं। जन्मभूमि की रक्षा में महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद महारानी ने उनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और तीन हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया और हुंमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध जारी रखा। रानी के गुरु स्वामी महेश्वरानंद जी ने रामभक्तों को इकट्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराज कुमारी की सहायता की। साथ ही स्वामी महेश्वरानंद जी ने संन्यासियों की सेना बनायी इसमें उन्होंने 25 हजार संन्यासियों को इकट्ठा किया और रानी जयराज कुमारी के साथ, हुंमायूं के समय में कुल 10 हमले जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये। 10वें हमले में शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और जन्मभूमि पर रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया।

लगभग एक महीने बाद हुंमायूं ने पूरी ताकत से शाही सेना फिर भेजी, इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद और रानी कुमारी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया। श्रीराम जन्मभूमि एक बार फिर कुल 24 हजार संन्यासियों और 3 हजार वीर नारियों के रक्त से लाल हो गयी। रानी जयराज कुमारी और स्वामी महेश्वरानंद जी के बाद युद्ध का नेतृत्व स्वामी बलरामचारी जी ने अपने हाथ में ले लिया। स्वामी बलरामचारी जी ने गांव गांव में घूम कर रामभक्त हिन्दू युवकों और संन्यासियों की एक मजबूत सेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि के उद्धारार्थ 20 बार आक्रमण किये। इन 20 हमलों में काम से काम 15 बार स्वामी बलरामचारी ने जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के लिए रहता था थोड़े दिन बाद बड़ी शाही फ़ौज आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के अधीन हो जाती थी।जन्मभूमि में लाखों हिन्दू बलिदान होते रहे। उस समय का मुग़ल शासक अकबर था।

उधर शाही सेना हर दिन के इन युद्धों से कमजोर हो रही थी, अतः अकबर ने बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस की टाट से उस चबूतरे पर 3 फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया। लगातार युद्ध करते रहने के कारण स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य गिरता चला गया था और प्रयाग कुम्भ के अवसर पर त्रिवेणी तट पर स्वामी बलरामचारी की मृत्यु हो गयी।

इस प्रकार बार-बार के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के रोष एवं भारत पर मुगलों की ढीली होती पकड़ से बचने के लिए अकबर की इस कूटनीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में रक्त नहीं बहा। यही क्रम शाहजहाँ के समय भी चलता रहा। फिर औरंगजेब के हाथ सत्ता आई, वो कट्टर मुसलमान था और उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ डाला। औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु श्री रामदास जी महाराज जी के शिष्य श्री वैष्णवदास जी ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये। इन आक्रमणों में अयोध्या के आसपास के गांवों के सूर्यवंशीय क्षत्रियों ने पूर्ण सहयोग दिया जिनमें सराय के ठाकुर सरदार गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे। ये सारे वीर ये जानते हुए भी कि उनकी सेना और हथियार बादशाही सेना के सामने कुछ भी नहीं हैं अपने जीवन के आखिरी समय तक शाही सेना से लोहा लेते रहे। लम्बे समय तक चले इन युद्धों में रामलला को मुक्त कराने के लिए हजारों हिन्दू वीरों ने अपना बलिदान दिया और अयोध्या की धरती पर उनका रक्त बहता रहा। ठाकुर गजराज सिंह और उनके साथी क्षत्रियों के वंशज आज भी सराय में मौजूद हैं।

1640 ईस्वीं में औरंगजेब ने एक बार फिर अयोध्या के मन्दिरो को ध्वस्त करने के लिए जाबांज खान के नेतृत्व में एक सेना भेजी। बाबा वैष्णव दास के साथ साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या में निपुण थी इसे चिमटाधारी साधुओं की सेना भी कहते थे। जब अयोध्या पर जाबांज खान ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के साथ चिमटाधारी साधुओं की सेना मिल गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर जाबांज खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध किया। चिमटाधारी साधुओं के चिमटे की मार से मुगलों की सेना भाग खड़ी हुई। इस प्रकार चबूतरे पर स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी।

जाबांज खान की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ और उसने जाबांज खान को हटाकर एक अन्य सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ अयोध्या की ओर भेजा और साथ में ये आदेश दिया कि अबकी बार जन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है, यह समय सन् 1680 का था। बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के गुरु गुरु गोविंद सिंह से युद्ध में सहयोग के लिए पत्र के माध्यम संदेश भेजा। पत्र पाकर गुरु गोविंद सिंह सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रह्मकुंड पर अपना डेरा डाला। ब्रह्मकुंड वही जगह जहां आजकल गुरु गोविंद सिंह की स्मृति में सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खों के गुरु गोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु एक साथ रणभूमि में कूद पड़े। इन वीरों के सुनियोजित हमलों से मुगलों की सेना के पाँव उखड़ गये और सैय्यद हसन अली भी युद्ध में मारा गया। औरंगजेब हिंदुओं की इस प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद 4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने की हिम्मत नहीं की। औरंगजेब ने सन् 1664 में एक बार फिर श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया। इस भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग 10 हजार से ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर दी, नागरिकों तक को नहीं छोड़ा। जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प कूप नाम का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं की लाशें मुगलों ने उसमें फेंककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर उसे घेर दिया। आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के नाम से प्रसिद्ध है और जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है। शाही सेना ने जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला। बहुत दिनों तक वह चबूतरा गड्ढे के रूप में वहाँ स्थित था। औरंगजेब के क्रूर अत्याचारों की मारी हिन्दू जनता अब उस गड्ढे पर ही श्री रामनवमी के दिन भक्तिभाव से अक्षत, पुष्प और जल चढ़ाती रहती थी।

नवाब सहादत अली के समय 1763 ईस्वीं में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह और पिपरपुर के राजकुमार सिंह के नेतृत्व में बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं की लाशें अयोध्या में गिरती रहीं। लखनऊ गजेटियर में कर्नल हंट लिखता है- लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नवाब ने हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने की इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमान होने के नाते उसने काफिरों को जमीन नहीं सौंपी। “लखनऊ गजेटियर पृष्ठ 62” नासिरुद्दीन हैदर के समय में मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप में लाने के लिए हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर नवाबी सेना का सामना हुआ। 8वें दिन हिंदुओं की शक्ति क्षीण होने लगी, जन्मभूमि के मैदान में हिन्दुओं और मुसलमानों की लाशों का ढेर लग गया। इस संग्राम में भीती, हंसवर, मकर ही, खजुरहट, दीयरा अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। हारती हुई हिन्दू सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं की सेना आ मिली और इस युद्ध में शाही सेना के चिथड़े उड़ गये और उसे रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। मगर हर बार की तरह कुछ दिनों के बाद विशाल शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर लिया और हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया। जन्मभूमि में हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा। नवाब वाजिदअली शाह के समय के समय में पुनः हिंदुओं ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया।

फैजाबाद गजेटियर में कनिंघम ने लिखा “इस संग्राम में बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ। दो दिन और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं के मारे जाने के बावजूद हिन्दुओं ने राम जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ ने कब्रें तोड़ फोड़ कर बर्बाद कर डालीं, मस्जिदों को मिसमार करने लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार कर अयोध्या से खदेड़ना शुरू किया। मगर हिन्दू भीड़ ने मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई हानि नहीं पहुचाई। अयोध्या में प्रलय मचा हुआ था।

इतिहासकार कनिंघम लिखते हैं कि ये अयोध्या का सबसे बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था। हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस बनाया। चबूतरे पर तीन फीट ऊँची खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया जिसमें पुनः रामलला की स्थापना की गयी। हालांकि यह ज्यादा समय तक हिन्दुओ के कब्जे में नही रही और कालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकल गयी। सन 1857 की क्रांति में बहादुर शाह जफर के समय में बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिर अली के साथ जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन 1858 को कुबेर टीला स्थित एक इमली के पेड़ में दोनों को एक साथ अंग्रेज़ों ने फांसी पर लटका दिया। जब अंग्रेज़ों ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवं रामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप में विकसित हो रहा है तब उन्होंने इस पेड़ को कटवा कर इस आखिरी निशानी को भी मिटा दिया। इस प्रकार अंग्रेज़ों की कुटिल नीति के कारण रामजन्मभूमि के उद्धार का यह एकमात्र प्रयास विफल हो गया।

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अयोध्या का विवाद : रामजन्मभूमि और उससे जुड़ा इतिहास भाग 1

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