देश के संवेदनशील मामलों में से एक यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code) सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी के बाद एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार इस बारे में कहा गया लेकिन अभी तक इसको लेकर गंभीर प्रयास नहीं किए गए। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गोवा का उदाहरण भी दिया। जहाँ पर कुछ  सीमित अधिकारों को संरक्षण देते हुए समान नागरिक संहिता लागू है।

समानता के सिद्धांत का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत में यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात की गई है और संविधान निर्माताओं ने उम्मीद जताई थी कि  पूरे भारत में नागरिकों के लिए इसे लागू करने का प्रयास किया जाएगा पर आज तक इस संबंध में कोई ऐक्शन नहीं लिया।

हालांकि संविधान में समान नागरिक संहिता लागू करने की स्पष्ट मंशा और उद्देश्य के बावजूद राजनैतिक रूप से संवेदनशील इस मुद्दे पर पिछले 68 वर्षो से सरकारें सीधे तौर पर कोई कदम उठाने से बचती रही हैं। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी के बाद अब उम्मीद है कि चार नवंबर को दिल्ली हाई कोर्ट में सरकार की ओर से स्थिति साफ की जाएगी।

क्यों जरूरत है समान नागरिक संहिता की

अभी देश में सभी धर्मों के विवाह और तलाक के कानून अलग-अलग हैं साथ ही संपत्ति और पैतृकता के कानून भी अलग-अलग हैं। समान नागरिक संहिता का मतलब है कि देश के सभी नागरिकों के लिए शादी, संपत्ति और उत्तराधिकार के समान कानून लागू होना। सुप्रीम कोर्ट कई बार विभिन्न धर्मों के शादी, तलाक या गुजारा भत्ता के मुकदमों में समान नागरिक संहिता की वकालत कर चुका है।

वर्तमान स्थिति को समझने के लिए वह एक उदाहरण भी देते हैं। किसी व्यक्ति की चार बेटियां हों तो शादी से पहले चारों के समान अधिकार होते हैं। वहीं, अगर एक बेटी हिंदू, दूसरी मुस्लिम, तीसरी पारसी और चौथी ईसाई से विवाह करती है तो चारों के अधिकार अलग-अलग हो जाएंगे। यह कानून की विषमता है और संविधान में दिए गए धर्मनिरपेक्षता और समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।

एक ही देश मे अलग-अलग धर्मो की महिलाओ में कैसे होता है भेदभाव

मुस्लिम पर्सनल लॉ में प्रक्रिया में तीन बार तलाक कहने से तलाक दिया जा सकता है। नियम के तहत निकाह के वक्त मेहर की रकम तय की जाती है। तलाक के बाद मुस्लिम पुरुष तुरंत शादी कर सकता है लेकिन महिला को 4 महीने 10 दिन तक यानी इद्दत पीरियड तक इंतजार करना होता है।

वहीं हिंदू मैरिज एक्ट के तहत हिंदू कपल शादी के 12 महीने बाद तलाक की अर्जी आपसी सहमति से डाल सकते हैं। अगर पति को असाध्य रोग जैसे एड्स आदि हो या वह संबंध बनाने में अक्षम हो तो शादी के तुरंत बाद तलाक की अर्जी दाखिल की जा सकती है।

इसके अलावा क्रिश्चियन कपल शादी के 2 साल बाद तलाक की अर्जी दाखिल कर सकते हैं, उससे पहले नहीं। यानी हिंदू, मुस्लिम और ईसाई के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ है।

सिर्फ यही नही, अलग अलग धर्मों में महिलाओ को पति से प्राप्त होने वाली सम्पत्तियो में भी बहुत भेदभाव है। हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्म में पति की संपत्ति में मिलने वाले हिस्से को लेकर अलग-अलग कानून देश में है। समान नागरिक संहिता लागू होने से भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार आएगा क्योंकेि अभी कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं।

पढ़े: हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्म में पति की संपत्ति में कितना होता है महिलाओं का हिस्सा, जानिए

क्या है समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। यूनियन सिविल कोड का अर्थ एक निष्पक्ष कानून है, जिसका किसी धर्म से कोई ताल्लुक नहीं है।

समान नागरिक संहिता एक पंथनिरपेक्ष कानून होता है जो सभी धर्मों के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से हर मजहब के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा। यानी मुस्लिमों को भी तीन शादियां करने और पत्नी को महज तीन बार तलाक बोले देने से रिश्ता खत्म कर देने वाली परंपरा खत्म हो जाएगी।

वर्तमान में देश हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के अधीन करते हैं। फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। वैसे संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करना अनुच्‍छेद 44 के तहत राज्‍य की जिम्‍मेदारी बताया गया है, लेकिन ये आज तक देश में लागू नहीं हो पाया। इसे लेकर एक बड़ी बहस चलती रही है।

समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग

दिल्ली हाई कोर्ट में भाजपा प्रवक्ता और वकील अश्वनी उपाध्याय ने याचिका दाखिल कर समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग की है। इस याचिका पर हाई कोर्ट ने गत 31 मई को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा था। आठ जुलाई को मामला सुनवाई पर लगा था, लेकिन सरकार ने जवाब के लिए कोर्ट से समय मांग लिया था। इसके बाद 27 अगस्त को केस लगा और दूसरी बार भी सरकार ने समय मांग लिया। अब चार नवंबर को यह मामला फिर सुनवाई पर लगा है।

इन देशों में लागू है कॉमन सिविल कोड

एक तरफ भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर बड़ी बहस होती रही है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे कई देश इस कानून को अपने यहां लागू कर चुके हैं।

देश में तमाम मामलों में यूनिफॉर्म कानून है, लेकिन शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर अभी पर्सनल लॉ के हिसाब से फैसला होता है जिसे उचित नहीं कहा जा सकता और इसीलिए इन मुद्दों में भी  यूनिफॉर्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता जैसा कानून लागू किए जाने की जरूरत है

सुप्रीम कोर्ट ने की समान नागरिक संहिता की तरफदारी

सबसे पहले 1985 में शाहबानों केस में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी बात की थी। इसके बाद 1995 में सरला मुद्गल के मामले में और फिर 2003 में जान वेल्लामेटम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता की तरफदारी की।

बहरहाल, बदली परिस्थितियों में माना जा रहा है कि सरकार इस बार कोर्ट में अपना रुख साफ कर देगी। अश्वनी उपाध्याय की याचिका पर नोटिस के बाद अभिनव बेरी की ओर से भी एक नई याचिका इसी मुद्दे पर दाखिल की गई है। वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उपाध्याय की याचिका का विरोध करते हुए कोर्ट से उसे भी मामले में पक्षकार बनाए जाने की मांग की है।