भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 2014 में वाराणसी में गंगा को निर्मल एवं अविरल बनाने हेतु अभियान शुरू करने का वादा किया था, तब इसे चुनाव पूर्व एक ऐसी रणनीति के रूप में देखा गया, जिसे शायद कभी भी पूरा नहीं किया जा सके। 2015 के बजट में जब “नमामि गंगे” अभियान के लिए 20,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया तो सरकार ने यह साबित कर दिया कि वह इस अभियान के लिए गंभीर है। इसकी कमान उमा भारती को सौंपी गयी। गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1985 में गंगा एक्शन प्लान शुरू किया गया था, लेकिन इसके तहत कोई खास प्रगति नहीं हो पाई थी। जबकि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू किए गए “नमामि गंगे” को “पब्लिक वाटर एजेंसी ऑफ ईयर” पुरस्कार मिला। ग्लोबल वॉटर समिट के दौरान यह पुरस्कार दिया जाता है। यह कार्यक्रम जल क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े बिजनेस कॉन्फ्रेंस में से एक है। यह पुरस्कार पूरे अंतर्राष्ट्रीय जल उद्योग में उत्कृष्टता को पहचानकर दिया जाता है। यह सरकार के सफल प्रयासों का ही परिणाम है।

गंगा को साफ़ और निर्मल बनाने की सबसे बड़ी समस्या जो थी, वो ये कि इसमें लगातार सीवेज का आकर गिरना। उत्तर प्रदेश जल निगम के नोडल विभाग के अनुसार वाराणसी में प्रत्येक दिन 309 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। कुछ डाटा के अनुसार 2035 तक यह आकंडा 400 लीटर तक पहुंचने की संभावना है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) सहित कई अन्य लोगों का कहना है कि कि अभी भी प्रतिदिन 410 मिलियन लीटर सीवेज  उत्पन्न हो रहा है। इस सीवेज को खत्म करने के लिए जो तीन संयंत्र लगाए गए थे, वह पर्याप्त नहीं थे। पहला संयंत्र 1986 में दीनापुर में बनाया गया, दूसरा भगवानपुर में 1988 में और तीसरा डीजल लोकोमोटिव वर्क्स मलजल उपचार संयंत्र को 1989 में बनाया गया। 1990 से लेकर 2014 तक दो दशकों में इसमें कोई खास वृद्धि नहीं हुई, जिसकी वजह से वाराणसी की उपचार क्षमता 102 मिलियन लीटर प्रतिदिन ही रही। जो कि गंगा को साफ़ रखने के लिए अपर्याप्त है। इसकी क्षमता में वृद्धि के बिना गंगा निर्मल नहीं हो सकती।

“नमामि गंगे” परियोजना के अंतर्गत 2014 से वाराणसी के तीनों सीवेज प्लांट पर काम शुरू किया गया। इसमें से दीनापुर में बना 140 मिलियन लीटर के सीवेज प्लांट का काम नवंबर 2018 में ख़त्म हो गया था। दीनापुर सीवेज उपचार संयंत्र पर काम जापान के सहयोग से एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी की देख-रेख में किया गया है। मोदी ने इस संयंत्र का उद्घाटन पिछले वर्ष नवंबर में किया था।

दूसरा संयंत्र गोइठा में है, जिसकी सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता 120 मिलियन लीटर प्रतिदिन की है। इस पर काम शुरू हो गया है और विशेषज्ञों का मानना है कि 2019 नवंबर तक यह पूर्ण रूप से बनकर तैयार हो जायेगा। तीसरा और आखिरी संयंत्र अस्सी जिले में है, जो कि रमना शहर के एक इलाके में बनाया जा रहा है और यह मार्च के अंत तक बनकर तैयार हो जाएगा।

50 मिलियन लीटर प्रतिदिन की क्षमता वाला संयंत्र हाइब्रिड वार्षिक मॉडल के अंतर्गत बनाया जा रहा है। यह रमना शहर में हैं। इसमें 40 प्रतिशत पूंजी निवेश सरकार द्वारा किया जायेगा। इसके अलावा इस मॉडल पर आधारित बाकी के संयंत्र का काम मथुरा, हरिद्वार, कानपुर, उन्नाव, फर्रुखाबाद और प्रयागराज में चल रहा है।

दीनापुर में बन रहे 140 मिलियन लीटर वाले सीवेज संयंत्र की वजह से पूरे वाराणसी के सीवेज ट्रीटमंट की क्षमता 242 मिलियन लीटर प्रतिदिन हो गई है। गोइठा में 120 मिलियन लीटर वाले संयंत्र और रमना के 50 मिलियन लीटर वाले संयंत्र के बनकर तैयार होने के बाद वाराणसी की यह क्षमता बढ़कर 412 मिलियन लीटर हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि 2014 से लेकर अब तक वाराणसी के सीवेज के उपचार की क्षमता काफी बढ़ गई है।

लेकिन समस्या सिर्फ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने से सुधरेगी। नालों का गन्दे पानी को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचने हेतु समुचित व्यवस्था के साथ साथ पाइपों का नेटवर्क होना ज़रूरी हैं। अगर गंदगी ट्रीटमेंट प्लांट तक नहीं पहुंचेगी, तो साफ़ कैसे होगी? “नमामि गंगे” के तहत नालों का गन्दा पानी सीवेज तक पहुंचाने के लिए पाइपों को बिछाया गया हैं। इस समस्या से निजात पाने के लिए सरकर ने 28 किलोमीटर लंबा सीवेज नेटवर्क बनाने का फैसला किया है, जिसकी वजह से शहर का सारा गंदा पानी एक साथ संयंत्र तक पहुँच सके।

इन सबके अलावा एक इंटरसेप्टर सीवर वरुणा नदी के किनारे बिछाया गया है। साथ ही चौकाघाट, फुलवरिया और सरिया में तीन पंपिंग स्टेशन बनाए गए हैं। वाराणसी के तीनो संयंत्रों के लिए एक एक इंटरसेप्टर सीवर ट्रंक उपलब्ध है।

इस प्रकार गंगा एक्शन प्लान की कमियों को “नमामि गंगे” ने पूरा किया है। वाराणसी से पीएम मोदी एक बार फिर चुनावों में खड़े हैं और अपने चुनाव क्षेत्र में गंगा को साफ और निर्मल बनाने का 2014 में किया गया उनका वादा लगभग पूरा होने के कगार पर है।