ऑनलाइन पोर्टल The Wire का पत्रकारों के लिए जॉब ओपनिंग का यह विज्ञापन देखिये। इसमे कहा गया हैं कि महिला, दलित, आदिवासी, और अल्पसंख्यको को वरीयता मिलेगी। आप समझ सकते हैं की अब खबरों का एजेंडा क्या होगा?

अब जरा इनके यहाँ काम कर रहे पत्रकारों के बारे में जानिए, HT से निकाले से जाने के बाद रोहिणी सिंह को कोई नौकरी देने को तैयार नहीं था। यूपी चुनाव के दौरान सपा खेमे में नज़र आयी लुटियन दिल्ली की इस पत्रकार को वायर का साथ मिला और फिर इन्होंने भाजपा नेताओं के खिलाफ एकतरफ़ा नकारात्मक रिपोर्टिंग का एजेंडा चलाना तेज़ कर दिया। ठीक वैसे ही ABP न्यूज़ से निकाले गए अभिसार शर्मा को भी कहीं नौकरी नहीं मिली तो वायर के यहाँ पहुँचे। हैरानी की बात ये है कि यही वायर चंदा माँगता है अपने कर्मचारियों की तनख़्वाह देने के लिए तो इन सो कॉल्ड निष्पक्ष पत्रकारों को सैलरी का मोटा हिस्सा कौन दे रहा है? पुण्य प्रसून वाजपेयी को भी इस पोर्टल में कुछ अपना सा लगा और मोदी सरकार के खिलाफ सालों से वन वे लाइन पकड़े हुए वाजपेयी ने यहाँ लिखना शुरू कर दिया।

यहाँ आपको  ‘वायर’ के मालिको के बारे में थोड़ी जानकारी होना आवश्यक हैं। इसके मालिक है एमके वेणु, ये साहब राज्य सभा टीवी में काम करते थे और पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के नज़दीकी रहे हैं। दुसरे  मालिक है सिद्धार्थ वर्धराजन ये भारत की नागरिकता त्याग कर अब अमेरिकी नागरिक बन गए और एंटी नेशनल का समर्थन करने के लिए जाने जाते, इनकी वामपंथी पत्नी नंदिनी सुंदर पर कोर्ट में एक आदिवासी की हत्या का केस भी चल रहा हैं। आपकी ज्यादा जानकारी के लिये हम बताते चलें कि ये सिद्धार्थ वही साहब है जिन्होंने भारतीय सेनाध्यक्ष की तुलना जनरल डायर से की थी जो की जलियावाला बाग़ नरसंहार को अंजाम देने वाला व्यक्ति था।

बहरहाल यह हैरान होने की बात नहीं है, Wire वाले तो खुलेआम इसे स्वीकार कर रहे हैं की उनका एजेंडा क्या हैं। परन्तु यहाँ ऐसे बहुत से न्यूज़ पोर्टल हैं जो ख़ास मानसिकता के लोगों को भर्ती कर अपना एजेंडे (दलित, मुस्लिम) में ऊपर रहना चाहते हैं। बेहद बेशर्मी से ख़बरों का धंधा किया जाता है उसके बाद पत्रकारिता जैसी कोई चीज़ बचती नहीं है। यह तो एक उदाहरण मात्र है।

यह बात और है कि Wire ने इसको सार्वजनिक कर दिया है जबकि कुछ News Portal इसे अघोषित रूप से चला रहे हैं और खुलकर अपनी नफ़रत ख़बरों के ज़रिए निकाल रहे हैं। एक तरफ़ा ख़ुलासे, एकतरफ़ा OPINION, ख़बरों की जगह अपनी राय, अपनी भड़ास, सिलेक्टिव ख़बरें, इंटरनेशनल रिपोर्टिंग सब कुछ है ऐसे पॉर्टल्स पर। ऐसे लोग दूसरों की बातें कहने से पहले ही ‘जज’ कर लेते हैं, ख़ुद ही सरकारें बनायी जाती हैं, बिगाड़ी जाती हैं, किसी के पक्ष में किसी के विपक्ष में माहौल बनाया जाता है।

हिंसा-अहिंसा, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय सबकुछ मिलेगा ऐसे पोर्टल्स पर बस नहीं मिलेगी तो एक अदद ‘ख़बर’, क्योंकि ये एजेंडे के आगे अंधे हो चुके हैं, दूसरों से पश्चाताप, माफ़ी की उम्मीद करते हैं लेकिन अपना ज़मीर बेचकर ये अपने काम पर निकलते हैं। इनका ज़मीर रोज़ नयी बोली के साथ बिकता है, बिल्क़ुल पेट्रोल-डीज़ल के भाव की तरह ‘थोड़ा-थोड़ा, लेकिन हर रोज़।’

(बहरहाल अब इस विज्ञापन के बारे में ये ना कहिएगा कि ये सशक्तिकरण के लिए किया जाता है)