इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान आतंकवाद का तो स्वर्ग है ही साथ ही साथ वह अल्पसंख्यकों के लिए नर्क से भी बदतर है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति जगजाहिर है, वहाँ पर मानवाधिकार नाम कोई संस्था भी नहीं है। अगर है भी तो नाममात्र की, जिनका ना तो कोई आधार है और ना ही औचित्य। हाल ही में मुद्दा गरमाया है कि दो हिन्दू नाबालिग लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन करके उनसे बहुत ज्यादा उम्र के लड़कों के साथ निकाह कर दिया गया, लेकिन आपको बता दें कि पाकिस्तान में इस तरह की घटनाएँ होना आम बात है।ऐसा पाकिस्तान के ही एक बहुत प्रसिद्ध अख़बार ने लिखा है।

पाकिस्तानी अख़बार द बलोचिस्तान पोस्ट ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि “यहाँ प्रतिवर्ष 1000 से भी अधिक अल्पसंख्यक लड़कियों का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करके उन्हें मुसलमान बना दिया जाता है और फिर उनका निकाह मुस्लिम पुरुष के साथ कर दिया जाता है। जिसमें सरकारी नुमाइंदों का भी सहयोग रहता है।” गौरतलब है यहाँ सरकारी अधिकारी हिन्दुओ को मुसलमान बनाने को पुण्य और अल्लाह का काम समझते है।

पाकिस्तान में अल्पसंख्कों की संख्या और स्थिति: गौरतलब है कि विभाजन के बाद जब पाकिस्तान अलग हुआ था तो कुल आबादी का 23 प्रतिशत हिस्सा गैर मुस्लिम यानि अल्पसंख्यकों का था लेकिन यह आंकड़ा धीरे-धीरे घटता गया। कुछ अल्पसंख्यकों ने वहां हो रहे अत्याचारों और साम्प्रदायिक दंगों से परेशान होकर पाकिस्तान छोड़ दिया तो कुछ ने मजबूरन मुस्लिम धर्म अपना लिया या फिर जबरदस्ती उनको मुस्लिम बना दिया गया। आज इन्ही अल्पसंख्यकों की संख्या घटकर हिन्दुओं की संख्या 2 प्रतिशत से भी कम मात्र 1.85 प्रतिशत रह गई है और सभी अल्पसंख्यको को मिलाकर मात्र 4 प्रतिशत रह गये है।

एक संस्था मूवमेंट फॉर सॉलिडेरिटी एंड पीस इन पाकिस्तान की रिपोर्ट के अनुसार यहाँ पर जबरदस्ती धर्म परिवर्तन की घटनाएँ आम बात है। गैर मुस्लिम लड़कियों को अगवा करके उनको धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया जाता है फिर उनसे निकाह कर लिया जाता है। हिन्दू लड़कियों को अगवा करने इतनी यातनाएं दी जाती है कि उनको मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

एक निश्चित प्रक्रिया के तहत जबरदस्ती मुस्लिम बनाया जाता है: पाकिस्तानी अख़बार आगे लिखता है कि “एक सोची समझी प्रक्रिया के तहत पाकिस्तान में अल्पसंख्यक लड़कियों का धर्म परिवर्तन किया जाता है। पहले हिन्दू, सिख या इसाई (गैर मुस्लिम ) लड़कियों को अगवा कर लिया जाता है फिर उनको बहुत ज्यादा यातनाएं दी जाती है जिससे वो लड़कियां उनकी हर बात मानने को तैयार हो जाती है।

अपहरण होने के बाद जब पीड़ित लड़की के परिजन पुलिस में शिकायत दर्ज कराते है तो अपहरणकर्ता (जो पीड़ित लड़की से पहले ही शादी कर चुका है) उसी लड़की से अपने परिजनों के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट करवाता है कि मैंने अपनी मर्जी से मुस्लिम धर्म अपनाया है और अपनी मर्जी से मुस्लिम पुरुष से शादी की है, और मेरे परिजन मुझे जान से मारना चाहते है और जबरदस्ती वापिस हिन्दू धर्म अपनाने का दबाव डाल रहे है। इस प्रकार ऐसे केस को न्यायलय में जाते ही अस्वीकार कर दिया जाता है।

ऐसे में पाकिस्तान जैसे मुल्क में अल्पसंख्यकों के लिए न्याय की उम्मीद करना अपने आप में बेवकूफी ही है।

बलूचिस्तान पर पाकिस्तानी अत्याचार: आपको बता दें कि पाकिस्तान केवल अल्पसंख्यकों के साथ ही अत्याचार नहीं होते बल्कि बलूचिस्तान में रह रहे बलोच मुसलमानों के साथ भी बहुत ज्यादा अत्याचार होते आ रहे है। दरअसल 1947 में विभाजन के बाद से पाकिस्तान में बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल कर लिया गया। 1970 के बाद बलूचिस्तान के गवर्नर नवाब अकबर बुगती के समय बलूचिस्तान के लोगों ने पाकिस्तान से अलग होकर अलग देश बनाने के लिए विद्रोह कर दिया। पाकिस्तानी सेना ने नवाब अकबर बुगती की हत्या कर दी। उसके बाद पाकिस्तानी सेना के अत्याचार ने बलोच लोगों को हमेशा डर के साये में रखा है।

मूलतः बलोच शिया मुस्लिम है और पाकिस्तान में सुन्नी मुस्लिमों की संख्या बहुत ज्यादा है और ये सुन्नी मुस्लिम शियाओं को राफजी (अस्वीकृत ) मुस्लिम मानते है जिनके चलते उन पर बर्बरता करते आये है।

परिणामस्वरूप बलोचों ने विद्रोह का मार्ग अपना रखा है लेकिन पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी लोगों द्वारा अत्याचार की घटनाएँ हमेशा होना वहां आम बात है। पाकिस्तान का सबसे खुबसूरत क्षेत्र बलूचिस्तान आज वहां के लोगों के लिए नर्क से भी बदतर हो गया है। हमेशा बलोच नौजवानों की हत्याएं हो रही है, महिलाओं का अपहरण, बलात्कार जैसी घटनाएँ वहां आम हो गई है। पाकितान के प्रधानमंत्री की पूर्व पत्नी रेहम खान और वींगस सहित कुछ लोग लगातार पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों और बलूचिस्तान के लिए आवाज उठा रहे है लेकिन अन्याय के बोलबाले में उनकी आवाज भी दबकर रह जाती है।