असम और बिहार में आई बाढ़ से जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है। यह वर्ष 2019 की पहली बाढ़ है, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो लोगों को बाढ से इतनी जल्दी राहत नहीं मिलने वाली। उनके अनुसार, अभी बाढ़ की और भयावह स्थिति देखने को मिलेगी। इस बाढ़ से हुई अभी तक के नुकसान की बात करें तो दोनों राज्यों को मिलाकर कुल 156 लोगों की मौत हो चुकी है। असम के अब तक बुरी तरह प्रभावित 33 जिलों में से 27 जिलों के तकरीबन 56 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं और सैंकड़ों जानवरों सहित 59 लोगों की जान चली गई है। वहीं बिहार की लगभग 66 लाख से ज्यादा की आबादी प्रभावित हो चुकी है और मौत का आंकड़ा 97 पर पहुंच गया है। सिर्फ पिछले 24 घंटों में ही बिहार में 12 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।

बिहार और असम में आई बाढ़ की चर्चा देश में कहीं नहीं हो रही है। ये बाढ़ अभी हाल ही में नहीं, बल्कि 11-12 जून से ही आई है, लेकिन भारत की मुख्यधारा की मीडिया फालतू में कुछ 3-4 दिन बरेली के विधायक की बेटी वाले मुद्दे को हवा देती रही। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पीड़ित परिवारों के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम लागू किया था, जिसके तहत 3.02 लाख पीड़ित परिवारों को 6-6 हजार रुपए दिए जा चुके हैं। वहीं असम की बात करें तो स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (ASDMA) के आंकड़ों के मुताबिक सूबे में बाढ़ से 3,705 गांवों की 48,87,443 आबादी प्रभावित है। यहां की 1.79 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हो चुकी है। राज्य में पिछले 6 दिनों में सेना ने 488 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है।

बाढ़ की इस भयावह स्थिति को देखते हुए आम आदमी के मन में कुछ सवाल उठते हैं- पहला, ये कि सरकार ने बाढ़ से निपटने के लिए क्या किया?

1. 1982 में, ब्रह्मपुत्र बोर्ड ने सुझाव दिया था कि बाढ़ को रोकने या कम करने के लिए बांधों और जलाशयों का निर्माण किया जाए। स्थानीय लोगों और तथाकथित पर्यावरणविदों द्वारा भारी विरोध के कारण योजना को स्थगित करना पड़ा।

2. ब्रह्मपुत्र बोर्ड ने वर्तमान गेरुमुख साइट में एक बहुउद्देशीय बांध का प्रस्ताव रखा जहां NHPC (नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन) सुबानसिरी लोअर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट का निर्माण कर रहा है। लेकिन अरुणाचल सरकार की असहमति के कारण प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था।

3. वर्तमान में राज्य सरकार बाढ़ को रोकने के लिए सिर्फ नदी पर तटबंधों का ही निर्माण कर रही है। लेकिन ये तटबंध अल्पकालिक समय के लिए ही प्रस्तावित थे। उनमे से भी अधिकांश तटबंध 1980 के दशक में निर्मित हैं, जो मजबूत नहीं हैं।

दूसरा सवाल, ये कि आखिर इस बाढ की विभिषिका की चर्चा देश में राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं हो रही है? सिर्फ इसलिए क्योंकि बाढ़ की कहर के प्रकोप का शिकार सिर्फ एक धर्म के लोग नहीं हैं। देखा जाए तो नेशनल टीवी पर प्रतिदिन शाम को 4 बजे से रात 9 बजे तक फालतू के मुद्दों पर बहस होती है, लेकिन इस समय जो सबसे जरूरी है, उस पर कोई बहस नहीं होती। स्वयं को सेक्युलर का तमगा देने वाली पार्टियां एवं सामाजिक संगठन भी इस प्राकृतिक आपदा पर मौन व्रत हैं।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि अब तक कुछ भी प्रांसगिक नहीं किया गया है। लेकिन इसके लिए हम सिर्फ सरकार को ही दोष नहीं दे सकते, क्योंकि जब भी सरकार जनता के भले के लिए कुछ सकारात्मक कदम उठाती है, तो सामाजिक न्याय और सुरक्षा के नाम पर दुकान चलाने वाले तथाकथित समाजसेवी व पर्यावरणविद गला फाड़ना शुरू कर देते हैं। अगर बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटना है, तो सरकार को बिना किसी के दबाव में आए, हर संभव एवं कड़े कदम उठाने होंगे, जिससे लोगों को अपनी जान न गंवानी पड़े और ना ही बेघर होना पड़े। इसके साथ ही आम जनता को भी छद्म पर्यावरणविदों को पहचानना होगा, तभी इस भयंकर आपदा से उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है।