सादिया अनस पासपोर्ट मामले में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज से सोशल मीडिया पर कड़े और तार्किक सवाल पूछे गए, कई नियमो को ताक पर रखकर जल्दबाजी में बगैर जांच के मात्र एक घण्टे में पासपोर्ट जारी करने की वजह से पासपोर्ट विभाग की कार्यशैली पर भी लोगो ने गम्भीर प्रश्नचिन्ह खड़े किए। सवाल पुछने वालो में टीवी पत्रकारिता जगत के पत्रकारो समेत सोशल मीडिया के कुछ बड़े नाम भी शामिल रहे।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इन गम्भीर सवालों के बीच खुद को घिरा पाकर इनसे बच निकलने का सबसे आसान तरीका निकाला जैसा अक्सर सेक्युलर लिबरल वामपंथी सालों से निकालते आ रहे है। विदेश मंत्री ने खुद को ऑनलाइन ट्रोलिंग का विक्टिम बनाकर पेश किया, गम्भीर सवालों के जवाब देने की जगह उन्होंने कुछ Abusive Tweets आरटी की और कुछ व्यंगात्मक ट्वीट लाइक करके छोड़ दिया।

दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगो के खिलाफ लुटियन्स मीडिया ने इसे मौके की तरह लिया और पूरी ताकत से दक्षिणपंथी विचारधारा के खिलाफ अपना दुष्प्रचार शुरू कर दिया, “सोशल मीडिया पर कानूनी नियंत्रण होना चाहिए” जैसे नारे तक देखते ही देखते गूँजने लगे। यहाँ यह गौरतलब रहेगा की सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी लोगो की बहुलता हैं और पिछले कुछ वर्षों में लुटियन्स मीडिया के एक तबके जिसमे बरखा दत्त, सागरिका घोष, राजदीप और रवीश कुमार जैसे पत्रकार शामिल हैं उनके हर झूठ और प्रोपोगंडा को बेनकाब करके रख दिया हैं, स्थिति यह हैं कि अब इन जैसे खुद को बुद्धिजीवी कहने वालों लोगो के सामने खुद का अस्तित्व, प्रासंगिकता बचाने का गम्भीर संकट आ खड़ा हुआ हैं। ऐसे में आप इन पत्रकारों की दक्षिणपंथी लोगो से खुन्नस समझ सकते हैं और जैसे ही इन्हें मौका मिला इन लोगो ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की आड़ लेकर दक्षिणपंथी लोगो पर हमला बोल दिया। यहाँ तक कि बरखा दत्त ने “आस्तीन का सांप” तक दक्षिणपंथी लोगो को बता दिया, हिंदुस्तान टाइम्स ने एक कदम और आगे बढ़कर बाकायदा एक लिस्ट जारी की ये लोग ट्रोल्स हैं और इन्हें बीजेपी के इतने सांसद मंत्री फॉलो करते हैं। मतलब सवाल पूछना ट्रोलिंग करना है? व्यंग करना ट्रोलिंग हैं? अगर हाँ तो हरिशंकर परसाई जैसे व्यंग के महान लेखक भी मामूली ट्रोल कहलायेंगे।

हैरानी वाली बात यह थी कि इस लिस्ट में पत्रकार मानक गुप्ता का भी नाम शामिल था, जो एक बेहद ईमानदार और सभ्य पत्रकार माने जाते हैं।

खैर, अब जब बात ट्रोल पर निकल पड़ी हैं तो हम आपके सामने उन्ही लुटियन्स मीडिया के कुछ पत्रकारों की ट्वीट ला रहे हैं जिनमे उन्होंने नैतिकता, सामान्य शिष्टाचार तक की बलि चढ़ा दी है और आज ये लोग विदेश मंत्री के साथ महात्मा बन कर खड़े हैं।

ये सुनेत्रा चौधरी हैं, NDTV में सम्पादक हैं, इनकी भाषा पढ़िये।

ये सुप्रतीक चटर्जी हैं, सुप्रतीक कई पत्रिकाओं-अखबारों में लिखता इसने पीएम मोदी के जन्मदिन के एक दिन बाद यानी 18 सितंबर को दो ट्वीट किए, पहले ट्वीट में सुप्रतीक ने लिखा कि ये अच्छी बात है कि “मोदी के रिटायरमेंट या मौत एक साल और करीब आ गयी”, दूसरे में लिखा “मौत ही मोदी को रोक सकती है. जन्मदिन पर मुझे मोदी की मौत की ख्वाहिश जताने में कोई अफसोस नहीं”

और वहीं जब ‘द क्विंट’ वेबसाइट ने सुप्रतीक से रिश्ता तोड़ लिया तो इन तथाकथित लेफ्ट लिबरल लोगों ने द क्विंट की पत्रकारिता की आजादी पर सवाल उठाए जो आज सुषमा स्वराज कर साथ खड़े होने का दिखावा कर रहे हैं इन लोगो ने आरोप लगाया कि सुप्रतीक के लेख हटाकर द क्विंट ने गलत मिसाल कायम की है।

यह विद्युत नाम की महिला हैं इनकी भाषा देखिये बीजेपी समर्थक महिलाओ के लिये।

ये बरखा दत्त का डबल स्टैंडर्ड देखिये सेना के साथ इनकाउंटर में मारा गया बुरहान बानी “सोशल मीडिया ऐक्टिवेस्ट” था, लेकिन सोशल मीडिया पर सवाल पूछने वाले दक्षिणपंथी आस्तीन के साँप, ताली बजाओ मित्रो!!

कांग्रेस भी सुषमा स्वराज के ट्रोल होने पर चिंतित हैं, अब जरा इनके नेता दिग्विजय सिंह जो मुख्यमंत्री तक रह चुके हैं उनकी भाषा देखिये।

आम आदमी पार्टी भी सुषमा जी के ट्रोल होने पर चिंतित हैं और ये दिल्ली के मुख्यमंत्री की भाषा हैं।

ये खुद को पत्रकार कहने वाली मंजुला नारायण की भाषा देखिये

अब ये कांग्रेस प्रवक्ता संजय निरुपम की भाषा देखिये, यह इंसान एक बार लाइव टीवी पर स्मृति ईरानी को “नाचने वाली” बोल चुका हैं, सुषमा स्वराज को भीगी बिल्ली, ड्रामा क्वीन बता रहा हैं, हैरानी की बात यह हैं कि सुषमा स्वराज से सही सवाल पूछने की वजह से यह भी दुखी हैं।

ये देखिये मृणाल पांडे वरिष्ठ पत्रकार हैं, प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर उन्हें गधा बोल रही हैं।

ये शेहला राशिद हैं JNU की छात्र नेता उपाध्यक्ष रह चुकी हैं, प्रधानमंत्री के लिए इनकी भाषा देखिये।

ये प्रियंका जो खुद को फेमनिस्ट बताती हैं, ट्विटर ने ब्ल्यू टिक दिया हुआ हैं इनकी भाषा पर गौर करिये।

ये प्रेरणा बक्शी पत्रकार हैं the quint, वायर जैसी वेबसाइट के लिए लेख लिखती हैं, थर्ड क्लास भाषा मे प्रधानमंत्री को ट्रोल कर रही हैं।

हैरानी की बात यह हैं की इन पर कभी कोई आर्टिकल नही लिखा जाता यह सब संत हैं, ट्रोल वह लोग हैं जो इनके नरेटिव प्रोपोगंडा को एक्सपोज कर दे, उल्टा कठिन सवाल इनसे पूछ लें। दरअसल पत्रकारों की यह जमात जो अभिव्यक्ति की आजादी को अपने बनाए एक खास चश्मे से ही देखना चाहती है। उनके लिए लिखने और बोलने की आजादी वो है, जैसा वो बोलना या लिखना चाहते हैं। जब लोग उनके मन-मुताबिक बातें नहीं करते, तो ये जमात फौरन ही अपने खिलाफ बोलने को नफरत की बोली करार दे देती है, उन्हें ट्रोल साबित करने में लग जाती हैं। यही लेफ्ट लिबरल जमात का दोहरा व्यवहार है, जब कोई दूसरा करे तो वो नफरत की बोली है, फासीवाद है लेकिन जब कोई अपना करे तो तुम हमारे दोस्त हो तो तुम्हें हर हक हासिल है और अगर तुम हमारे खेमे के नहीं हो, तो तुम्हें कोई अधिकार नहीं।