222,236 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाला भारत का इकलौता मुस्लिम बहुत प्रदेश जम्मू एवं कश्मीर अनुच्छेद 370 और 35A के हटते ही दो केंद्रशासित प्रदेशों में बंट गया है। स्वघोषित बुद्धिजीवियों ने अपना रोना शुरू कर दिया है, कल तक जो लोग आतंकवाद पर ये कहकर सरकार को कोसते थे कि गरीबी के कारण युवा बंदूक उठा लेते हैं।

आज वे लोग जम्मू कश्मीर को दस दस साल पुराने आंकड़ों से बीजेपी शासित बाकी राज्यों से ज्यादा सम्पन्न बता रहे हैं। आइये आंकड़ों पर नजर डालते हैं :

1. राष्ट्रीय औसत से नीचे लिंगानुपात

2011 की जनसंख्या के अनुसार 12.54 मिलियन की आबादी वाले जम्मू – कश्मीर में 73% जनसंख्या ग्रामीण है और कुल आबादी में मात्र 37% महिलाएं हैं। 22 जिलों के इस राज्य में लिंगानुपात मात्र 889 था जबकि भारत में ये 943 है। महिलाओं की दशा कितनी चिंताजनक है।

2. निम्न साक्षरता दर

साक्षरता की बात करें तो ये इस राज्य में 2011 में मात्र 67.2% थी जबकि भारत में ये 73% है।

3. उच्च जनसंख्या वृद्धि दर

प्रशांत भूषण कश्मीर का फर्टिलिटी रेट 1.7 बता रहे हैं, वैसे पूरे जम्मू-कश्मीर का फर्टीलिटी रेट 2012 में 2.0 था। अगर लद्दाख और जम्मू क्षेत्र को निकालें तो कश्मीर का फर्टिलिटी रेट ज्यादा ही आएगा कम नहीं। वैसे परिसीमन आयोग का विरोध भी प्रशान्त भूषण कर रहे थे जबकि परिसीमन आयोग की यही तो शर्त की कि जनसंख्या बढ़ने की दर स्थायी हो जाये और इसे 2.0 के औसत से नीचे लाना था। यदि हम प्रशान्त भूषण के आंकड़े सही मान भी लें तो महोदय परिसीमन आयोग का विरोध किस मुंह से कर रहे थे?

4. उच्च बेरोजगारी दर

2012 में बेरोजगारी की दर ग्रामीण पुरुषों में 1.7% थी जबकि जम्मू कश्मीर में 2.2%, वही ग्रामीण महिलाओं में भारत की यह 1.7% थी और जम्मू-कश्मीर में 3% थी। आज ग्रामीण भारत में बेरोजगारी की दर 5.3% बढ़ चुकी है आप अंदाज लगाइए कि जम्मू-कश्मीर में क्या हाल हुआ होगा।

शहरी क्षेत्र की बात करें तो 2012 में पुरुषों में बेरोजगारी 3% थी जबकि जम्मू-कश्मीर में 4.1% वहीं भारत की महिलाओं में 5.2% लेकिन जम्मू-कश्मीर में ये 19% थी। अभी शहरी क्षेत्र में भारत की बेरोजगारी बढ़कर 7.8% पहुंच चुकी है, जम्मू कश्मीर में क्या हुआ होगा? सोचिये।

5. ST/SC आरक्षण और कम वेतन

इस राज्य में 2011 की जनगणना तक 11.9% अनुसूचित जनजाति और 7.4% अनुसूचित जाति के लोग थे। ये वो लोग हैं जिनके हित के लिए भारतीय संविधान का कानून भी लागू नहीं होता था। इनमें से अधिकतर लोग मात्र 500₹ की सैलरी पर काम करते थे, राज्य सरकार इनमें से बहुत लोगों को मतदान के अधिकार से भी वंचित रखती थी। दलितों के लिए आवाज़ उठाने वाले बुद्धिजीवी जम्मू-कश्मीर के दलितों के अधिकारों के लिए आज तक आवाज़ उठाते नहीं देखे गए।

6. पाकिस्तानी गैर मुस्लिम शरणरार्थियो को वोटिंग अधिकार नही

जो लोग पाकिस्तान से आकर जम्मू-कश्मीर में बस गए थे उन्हें न तो मतदान का अधिकार दिया गया न ही उनके लिए कोई नागरिकता का प्रावधान बना। सरकारी सुविधाओं का लाभ भी उन्हें कभी नहीं मिला। मानवता के अधिकार के किये लड़ने वाले फर्जी समूह आजतक इनके किये आवाज़ उठाते नहीं दिखे।

7. मौलिक अधिकारों का हनन

पूरे देश में भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार लागू थे लेकिन जम्मू कश्मीर में मौलिक अधिकार ही लागू नहीं थे। मौलिक अधिकारों को संविधान की आत्मा और नागरिकों के हितों का रक्षक कहा गया लेकिन इतने बड़े षड्यंत्र पर भी हमारे स्वघोषित बुद्धिजीवी शांत रहते हैं न तो इन्हें कभी संविधान खतरे में दिखा न ही मानवता।

8. शिक्षा का अधिकार

शिक्षा का अधिकार जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं था। प्रदेश सरकार को कोई फिक्र नहीं थी कि बच्चे पढ़ रहे हैं या पत्थरबाजी कर रहे हैं।

9. योग्य प्रोफेसर की कमी

जम्मू कश्मीर में दूसरे राज्यों से प्रोफेसर्स भी नहीं पढ़ाने आ सकते थे, जिसकी वजह से राज्य में योग्य प्रोफेसर्स की थी भारी कमी, ऐसे में क्या तरक्की करते युवा? कोई उदारवादी इस पर कभी बात नहीं करेगा।

10. आयुष्मान भारत नही थी लागू

आयुष्मान भारत जैसी कल्याणकारी योजना भी इस राज्य में लागू नहीं थी। किसी मानवतावादी संगठन ने इसके लिए राज्य सरकार की कभी नहीं कोसा।

11. आतंकवाद फैलाने में शामिल राजनेता

आतंकवाद तो इस राज्य की कश्मीर घाटी में रचा बसा है। इधर गरीबी का मुख्य कारण रोजगार के साधन न होना ही है। अलगाववादी 20-20 रुपये घण्टे के हिसाब से पैसे देकर पत्थरबाजों से पत्थर फिंकवाते आये हैं जबकि अलगाववादियों के स्वयं के बच्चे विदेशों में पढ़ते रहे हैं।

12. देश के सबसे भष्ट्र कश्मीरी राजनेता

5 अगस्त, 2019 को ग्रेटर कश्मीर में प्रकाशित रिपोर्ट की मानें तो जम्मू-कश्मीर राज्य भारत के सबसे भष्ट्र राज्यों में से एक है। अब्दुल्ला परिवार हो या मुफ़्ती, गिलानी हों या भटकल, सिर्फ इन्ही परिवारों की ही सम्पत्ति में इजाफा देखा गया है।

13. नही हो सकती थी भष्ट्राचार की जांच 

अनुच्छेद 370 की वजह से देश की कोई भी भष्ट्राचार निरोधक एजेंसी इस राज्य में नहीं आ सकती थी। भष्ट्र राजनेताओं के लिए अनुच्छेद 370 सबसे बड़ी ढाल थी आखिर इन्हें दुःख क्यों नहीं होगा?

14. नही था सूचना का अधिकार

जम्मू कश्मीर में सूचना का अधिकार भी लागू नहीं था। कितना भी भृष्टाचार होता रहे, नागरिक सरकार से कोई सूचना नहीं मांग सकते थे। आखिर स्थानीय नेताओं को अनुच्छेद 370 हटने से दुःख क्यों नहीं होगा।

15. जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय औसत से प्रति व्यक्ति विकास में 3.5 गुना खर्च 

2017-18 में जम्मू कश्मीर के हर व्यक्ति पर भारत सरकार ने ₹27,258 खर्च किया था जबकि शेष भारत में प्रति व्यक्ति खर्च मात्र ₹8227 था। जबकि जम्मू-कश्मीर से सरकार को राजस्व न के बराबर ही प्राप्त होता है। अनुच्छेद 35A की वजह से हर वस्तु को सस्ते में खरीदने वाले कश्मीरी, सरकार से घर बैठे पैसा खाने वाले कश्मीरी, न के बराबर टैक्स देने वाले कश्मीरी भारत विरोधी नारे लगाते आये हैं। सेना पर पत्थर बरसाते आये हैं। पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों को पालते आये हैं। अब ऐसे घर बैठे किसी को भी पैसे मिलने लगे तो वो तो सम्पन्न हो ही जायेगा।

16. जेहादी आतंकवाद

आतंकवाद तो कश्मीर घाटी की मुख्य विशेषता है। वर्ष 2019 में जनवरी से लेकर जून तक जितने आतंकी मारे गए उनमें से 83% स्थानीय कश्मीरी थे। CRPF के जवानों की बसों को जिस आतंकी ने कार से उड़ाया था वो भी कश्मीरी ही था। अगर इतिहास पर नजर डालें तो कश्मीर घाटी का इतिहास आतंकवाद की नई दास्तान बयान करता है।

17. 1% जनसंख्या पर पूरे देश का 10% राजस्व का खर्च

सन 2000-2016 तक जम्मू कश्मीर ने केंद्र सरकार के कुल राजस्व का 10% हिस्सा लिया जबकि इसकी जनसंख्या भारत की जनसंख्या का 1% है। विशेष राज्य की आड़ में यहां देश के नौजवानों की गाढ़ी कमाई के टैक्स पर आतंकी और देशद्रोही पल रहे थे। यदि अनुच्छेद 370 और 35A नहीं हटाया जाता तो हमारा पैसा हमारे हिस्से में कभी नहीं आता।

18. 41 हजार से ज्यादा लोग मारे गए

1988 से लेकर अब तक करीब 41000 से ज्यादा लोगों को इस राज्य की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ी है। 2014 में 60, 2015 में 55, 2016 में 110, 2017 में 165 और 2018 में 200 से ज्यादा मिलिटेंट हमले कश्मीर घाटी में हुए हैं। ये आंकड़े अपने आप में स्वयं इतने भयावह हैं कि कोई भी समझदार आदमी कश्मीर को स्वर्ग कहने से पहले सौ बार सोचेगा।

19. कश्मीर की जमीन चाहिए यह आरोप लगाने वाले कश्मीरी पंडितों की जमीन क्यों भूल जाते है

कुछ लोग सरकार पर ये आरोप मढ रहे हैं कि सरकार को बस जमीन चाहिए कश्मीरी नहीं। उनकी जानकारी के लिए बता दूं, जनवरी 1990 में इन्हीं लोगों ने लाउडस्पीकर पर कश्मीरी पंडितों को जान से मारने की धमकियां दी थी, अगली सुबह उन्हें जान से मारा, उनकी महिलाओं को बेआबरू किया और उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया। किसी भी कोर्ट में इन्हें इनके अपराधों की सजा नहीं सुनाई गई।

जनसांख्यिकी बदलने का इससे बड़ा षड्यंत्र तो दुनिया ने आजतक न देखा होगा और ये स्वघोषित बुद्धजीवी मुंह में दही जमाये कश्मीरी पंडितों पर होते अत्याचार देखते रहे तब न तो इनसे मानवता के लिए आवाज़ उठाई गई न ये कहा गया कि जनसांख्यिकी बदलने का षड्यंत्र रचा गया है।

20. जम्मू लद्दाख से भेदभाव

केंद्र सरकार से आया पूरा का पूरा धन केवल कश्मीर घाटी तक पहुंचता था जबकि जम्मू और लद्दाख राज्य के राजस्व में योगदान देते थे। इससे बड़ी विडंबना तो हो ही नहीं सकती कि आपको अपना दिया हुआ टैक्स ही वापस न मिले।

21. नागरिकता के अजीब नियम

कश्मीरी लड़की पाकिस्तानी से तो शादी करके अपनी नागरिकता बचा सकती थी लेकिन यदि वो किसी भारतीय से शादी करती तो अपना सम्पत्ति का अधिकार खो देती। महिलाओं पर भेदभाव करता इससे घिनौना कानून शायद ही किसी विकसित देश में हो।

22. सुरक्षा व्यवस्था का उच्च खर्च

कश्मीर घाटी की वजह से भारत को न चाहते हुए भी सुरक्षा व्यवस्था में काफी धन खर्च करना पड़ता था। अनुच्छेद 370 के हटते ही इस धन में भी काफी कमी आ जायेगी।

जो स्वघोषित बुद्धिजीवी भारत में रहकर झूठे आंकड़े पेश करके कश्मीर को जन्नत बताने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें आईना दिखाइए क्योंकि इन लोगों की वजह से विश्व पटल पर भारत की छवि खराब होती है। ये लोग इस देश में रहकर परोक्ष रूप से पाकिस्तान को फायदा पहुंचाने के लिए काम करते हैं, न तो ये मानवता के लिए काम करते हैं न ही देश के लिए। इन्हें अनुच्छेद 370 हटने का दुःख इसीलिए है क्योंकि इनको मिलने वाले विदेशी चंदे बन्द हो जाएंगे। उम्मीद है, आपको ये जानकारी पसन्द आई होगी।