केरल में सदी की सबसे भयंकर बाढ़ आई हैं, ऐसे में विदेशों से भी आर्थिक सहायता की पेशकश आयी हैं।जिस पर राजनीति गरमाई हुई हैं। सबसे पहले आपकी जानकारी के लिए बता दें कि, उत्तराखंड में आयी प्रलयंकारी बाढ़ जिसने उत्तराखंड के अधिकतर हिस्सो को तहस नहस कर दिया था उसके बाद 2013 में भारत को जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) द्वारा भारत की आर्थिक सहायता की पेशकश की गई थी। लेकिन भारत ने इस आर्थिक मदद को लेने से इनकार कर दिया था। विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने कहा था, “एक जनरल पालिसी के तौर पर हम राहत और बचाव कार्यो में सक्षम है और हमारे पास इमरजेंसी की स्थिति से पार पाने के लिए पर्याप्त व्यवस्था है”।

उस समय ऐसा पहली बार नही हुआ था, ऐसा 2004 की सुनामी के बाद भी भारत ने किया था, उस समय की मनमोहन सिंह सरकार ने भी अमेरिकी सहायता की पेशकश को खारिज कर दिया था, जबकि विनाशकारी सुनामी में भारत का पूर्वी तट लगभग पूरी तरह से बर्बाद हो गया था। उस समय विदेशी सहायता को अस्वीकार करने के निर्णय को भारत की आर्थिक शक्ति के तौर पर पेश करने के एक कदम के रूप में देखा गया था, न कि एक ऐसे गरीब राष्ट्र के जिसे आपातकाल के दौरान विदेशी देशों के भरोसे रहना पड़े।

केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन के मुताबिक केरल में आई बाढ़ की वजह से लगभग 400 लोग मारे गए हैं, और 19,5512 करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान का अनुमान है। जिसे देखते हुए कुछ देशों ने भारत को आर्थिक सहायता की पेशकश की हैं, अब इसे स्वीकार करना हैं या नही इसका सवाल भारत के सामने एक बार फिर से खड़ा हैं।

केरल के साथ अपने घनिष्ठ संबंध को ध्यान में रखते हुए, संयुक्त अरब अमीरात (संयुक्त अरब अमीरात) ने आपदा के बाद राज्य के स्थिति सुधारने के लिए 700 करोड़ रुपये की सहायता की पेशकश की हैं। सीएम विजयन और प्रधान मंत्री दोनों ने संयुक्त अरब अमीरात को इसके लिए UAE को धन्यवाद दिया हैं।

 

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक भारत इस आर्थिक सहायता की पेशकश को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा निर्धारित मापदण्ड को मानते हुए खारिज कर सकता हैं। अगर हम भारत के आर्थिक स्तर पर बढ़ता हुआ दिखाना चाहते हैं तो हमे ये जरूर करना चाहिए, भारत वर्तमान में दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और आबादी के मामले में दूसरा सबसे बड़ा देश है। ऐसे में किसी प्राकृतिक आपदा  के समय विदेशी सहायता हम स्वीकार करते हैं तो यह भारत की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करेगा। हमें यह साबित करना होगा कि केरल में आयी हालिया बाढ़ जैसी चुनौतियों को पार करने के लिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन और शक्ति हैं। प्राकृतिक आपदा के बाद प्रबंधन करने के लिए अगर हम विदेशी सहायता को स्वीकार करेंगे तो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था की क्षमता पर सवाल उठाया जाएगा।

विदेशी सहायता हालांकि लगभग हमेशा अच्छे इरादे से पेश नही की जाती है, विदेशी आर्थिक मदद प्राप्त करने वाले देशों को इसका भुगतान किसी ना किसी रूप में करना ही पड़ता हैं। अपने स्वार्थ-साधन के लिए ही एक देश दूसरे देश को आर्थिक सहायता प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी विदेशी ताक़त भारत को आर्थिक सहायता देती है तो वह भारत पर कोई उपकार नहीं करती बल्कि उस आर्थिक सहायता की कीमत भी वसूलती हैं और वह कीमत किसी भी रूप में हो सकती हैं।

ऐसे में अगर भारत किसी भी देश से आपदा के समय आर्थिक सहायता स्वीकार कर रहा था, तो वह अपनी विदेश नीति को मुक्त रखने की अपनी कोशिस में बाधा डालेगा।

22 मार्च 2017 को विदेश मामलों के राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह द्वारा संसद में दिए एक जवाब के मुताबिक, भारत एक ऐसा राष्ट्र बन गया हैं जिसने पिछले तीन वर्षों में कई विदेशी देशों को आर्थिक सहायता प्रदान की है। चूंकि देश का कद उसकी आर्थिक ताकत से बढ़ता है, इसलिए हमे अपनी घरेलू जरूरतों के लिए कोई विदेशी सहायता लेने से बचना चाहिए।

केरल की प्राकृतिक आपदा से निबटने के लिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारों ने अब तक बहुत अच्छा काम किया है। राहत और बचाव कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है, 3,000 से अधिक बचाव शिविरों में अब तक दस लाख से अधिक लोगों को आश्रय दिया जा चुका हैं, केंद्र ने भी 600 करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा कर चुका है, इसके साथ प्राकृतिक आपदा में जान गंवाने और घायल होने वालों के लिए अलग से मुआवजा की भी घोषणा हो चुकी हैं। जो मकान बाढ़ की वजह से गिर गए हैं उन्हें भी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाने की घोषणा हो चुकी हैं।

एक साक्षात्कार में केरल के मुख्यमंत्री ने केंद्र से त्वरित प्रतिक्रिया और राहत बचाव में मदद के लिए उनका आभार जताया है।

“”I need to make it clear in no uncertain terms that the Government of India was forthcoming and responded positively. Prime Minister Narendra Modi and home minister Rajnath Singh visited the flood-hit areas and have been understanding the situation fully.

Kerala Chief Minister Pinarayi Vijayan””

अब ऐसे में जब कुछ हम सही प्रकार से प्रबन्धन कर रहे हैं तो विदेशी देशों से आर्थिक मदद लेकर उसकी कीमत देश की अखंडता और स्वतंत्रता के साथ समझौता करके चुकाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

अगर मीडिया रिपोर्टों के अनुसार केरल के लिए विदेशी सहायता को खारिज कर देता है, तो यह इसकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रोफ़ाइल, आर्थिक चोरी और इसके समग्र राष्ट्रीय हित के साथ समन्वयित होगा।

भारत में राजनीतिक दलों को केरल के संबंध में विदेशी सहायता के मामले पर द्विपक्षीय समझौते के लिए आना चाहिए और इस मुद्दे पर अनावश्यक लड़ाई से बचना चाहिए ।