‘तन समर्पित, मन समर्पित
और यह जीवन समर्पित;
चाहता हूँ मेरे देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।’
– कवि रामावतार त्यागी द्वारा रचित ये पंक्तियां महज स्याही से कागज पर उकेरी गई कल्पनाएं नहीं हैं; ये भावनाएं हर उस देशभक्त की हैं जो देश की धरती के लिए अपना सर्वस्व समर्पण करना चाहता है।

ये देशभक्त वो जवान भी हैं जो अपनी जान की बाजी लगाकर सीमा पर खड़े हैं, ये देशभक्त वो चुनिंदा राजनेता और सरकारी अधिकारी भी हैं जो देश की सुरक्षा और गौरव के लिए अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते हैं और ये देशभक्त वो नागरिक भी हैं जो किसी न किसी तरीके से देश के विकास में योगदान दे रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था में सहयोग करके, देश की सुरक्षा में सहयोग करके, देश को स्वच्छ रखकर या देशवासियों की सेवा करके; ये सब देशसेवा का ही एक भाग हैं।

आज से 4 साल पहले के भारत पर नजर डालें तो अलग अलग घोटालों से चरमराती अर्थव्यवस्था, आन्तरिक सुरक्षा से जूझती सुरक्षा एजेंसियां और फंड की कमी से जूझती सेनाएं; 4 साल पुराने समाचारपत्रों को दोबारा पढ़ने से ही आपके स्मृतिपटल पर चलचित्रों की भांति सब अंकित हो जाएगा। ऐसी स्थिति में जब देश सशक्त हाथों में पहुंचा तो सैनिकों के तन पर स्वदेशी बुलेटप्रूफ जैकेट भी पहुंची, S-400 और बराक-8 जैसी तकनीकें भी पहुंची; सेना ने डोकलाम जैसे मुद्दे पर सीना तानकर ताकतवर दुश्मन का सामना भी करना शुरू किया और सर्जिकल स्ट्राइक करके उड़ी अटैक का बदला भी लिया।

ये दौर वो दौर नहीं है जब देश के प्रधानमंत्री को एक दुश्मन देश का प्रधानमंत्री ‘देहाती औरत’ कहकर संबोधित करे और सत्तासीन पार्टी देश के अपमान को व्यक्तिगत टिप्पणी समझकर भुला दे। ये वो दौर है जब आतंक का जन्मदाता पाकिस्तान कूटनीतिक तौर पर भारत की वजह से अछूत हो चुका है एक तरफ BIMSTEC के आगे SAARC नगण्य हो चुका है वहीं अमेरिका जैसे देशों ने भी पाकिस्तान को आर्थिक मदद देना बंद कर दिया है। बांग्लादेश का चीन निर्मित बंदरगाह अब भारत के संरक्षण में है, श्रीलंका का चीन निर्मित हम्बनटोटा बंदरगाह असफल प्रोजेक्ट रहा और भारत ने उसके पास स्थित माटाला एयरपोर्ट का संरक्षण प्राप्त कर लिया है। मालद्वीप, श्रीलंका, बांग्लादेश और भूटान में चुनाव के बाद स्थिति भारत के पक्ष में है, ईरान और जापान भारत से व्यापार रुपये में कर रहे हैं। अमेरिकी प्रतिबन्धों को ताक पर रखकर भारत ने S-400 डील रूस के साथ की और ईरान के साथ तेल भी खरीदना जारी रखा। कूटनीति में इस समय भारत अपने विशिष्ट दौर में है, रक्षानीति का अंदाजा आप आंकड़े देखकर लगाइए कि विश्व में किस देश ने सबसे ज्यादा रक्षा सम्बन्धी उपकरण खरीदे? बराक-8 जैसी एन्टी-मिसाइल तकनीकी देश की कम्पनियां इजरायल की कम्पनियों के साथ मिलकर विकसित कर रही हैं। 26 जनवरी के दिन हम एक लेख और प्रकाशित करेंगे जिसमें पूरे वर्ष 2018 में कितने देशों के साथ हमने युद्धाभ्यास किया और उसके पीछे क्या कूटनीति रही, इसका पूरा लेखा जोखा होगा।

देश की सुरक्षा की बात की जाए, तो कश्मीर और इसके सीमावर्ती क्षेत्रों के अलावा देश के किसी और भाग में कहीं कोई आतंकवादी घटना नहीं हुई। केवल कश्मीर में अलगाववादियों की वजह से घटनाएं हो रही है, उन पर भी हमारे जवानों को खुली छूट है कि जेहादियों पर किसी प्रकार का कोई रहम न दिखाया जाए। 2014 में सरकार बनते ही कश्मीर में हलचल देखी जा सकती थी। विमुद्रिकरण के पहले तक स्थानीय नेताओं को पाकिस्तान से पत्थरबाजों के लिये फंड मिलता था, स्थानीय नागरिक पत्थरबाजी करके मुठभेड़ के दौरान जवानों का ध्यान आतंकियों से भटकाते थे। वहीं विमुद्रिकरण के बाद ये बन्द ही हो गया था लेकिन जैसे ही बैंकों में पैसा आना शुरू हुआ जेहादियों ने बैंक लूटना शुरू कर दिया, पुलिसवालों से बंदूकें छीननी शुरू कर दी। कश्मीर में हमारे जवानों को अलग अलग मोर्चों पर जूझना पड़ता है :

पहला मोर्चा है, पाकिस्तानी सेना जो आये दिन, घुसपैठियों को कवर देने के लिए फायरिंग करती रहती है। मौजूदा सरकार के दौरान भारतीय सेना भी मुंहतोड़ जबाब दे रही है। सेना को सरकार की तरफ से फ्री हैंड दिया गया है।

दूसरा मोर्चा है, पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम (BAT) ये कायर गश्त कर रहे BSF के जवानों को चुपके से मार देते हैं और अमानवीय कृत्य करते हैं। कांग्रेस सरकार के दौरान हमारे दो जवानों के सर काटकर ले जाने वाले कायर BAT ही थे। तत्कालीन UPA सरकार ने सेना के हाथ बांध रखे थे इसलिए सेना को बदला लेने के लिए ‘ऑपरेशन जिंजर’ गुप्त रूप से चलाना पड़ा था। इस शनिवार हम इसपर एक लेख प्रकाशित कर रहे हैं।

तीसरा मोर्चा है अलगाववादी स्थानीय लोग, इन्हें पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर में अव्यवस्था फैलाने के लिए भारी भरकम पैसा मिलता है। ये स्थानीय पुलिस से हथियारों एवं स्थानीय बैंक से पैसों की लूट अप्रत्यक्ष रूप से करवाते हैं।

चौथा मोर्चा है पत्थरबाज। जब सेना कश्मीर में ऑपरेशन ऑलआउट चलाकर जेहादियों का एनकाउंटर करती है तो वारदात स्थल पर सैकड़ो की संख्या में स्थानीय पत्थरबाज आ जाते हैं। अलगाववादी इन्हें पैसा देते हैं और कट्टरपंथी इनका ब्रेनवाश करते हैं।

पांचवां और सबसे खतरनाक मोर्चा है कथित बुद्धिजीवियों का झुंड जिसने हर मीडिया हाउस, लेखक मंडली और कॉन्फ्रेंस क्लब में अपने पैर पसार रखे हैं। ये लोग विभन्न देशों से आये पैसों का इस्तेमाल अलग अलग देश में कांफ्रेंस आयोजित करते हैं और उसमें बताया जाता है कि भारतीय सेना कश्मीरियों पर अत्याचार कर रही है। हमने ऐसे ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़े हुए ISI एजेंट पर स्टोरी कवर कर रखी है; छद्म वुद्धिजीवियों के बारे में जानने के लिए जरूर पढियेगा। ये कथित बुद्धिजीवी जर्नलिस्ट बनकर सेनाविरोधी आर्टिकल लिखते हैं, एंकर बनकर TV पर शो चलाते हैं और कुछ एक्टिविस्ट बनकर लोगों का ब्रेनवाश करते हैं। कुछ वकील बनकर पकड़े गए आतंकियों की फांसी की सजा भी रुकवाते हैं तो कुछ छद्म छात्रनेता देश के विश्विद्यालय में देश के टुकड़े करने के नारे लगाते हैं।

इन मोर्चो पर केवल देश की सेना ही नहीं जूझ रही है, आखिरी मोर्चे पर तो हर वो इंसान जो देश की अखंडता और सेना में यकीन रखता है; वो इन छद्म बुद्धिजीवियों की नजरों में खटकता है। केवल कश्मीर में आतंकी वारदातों में हमने 2018 के दौरान अपने 95 जवान खो दिए

 

जबकि 2018 में 2014 के मुकाबले हमने अपने दोगुने जवान खोए हैं। इसका मतलब है जब से सेना ने ‘ऑपरेशन ऑलआउट‘ चलाकर छिपे हुए जेहादियों को चुन चुन के मारना शुरू किया है; सीमापार से घुसपैठ की वारदातें और स्थानीय आतंकियों की भर्ती बढ़ गई है लेकिन सेना भी उतनी ही तेजी से इन्हें गाजर मूली की तरह काटती जा रही है। 2018 के दौरान तकरीबन 270 आतंकियों को भारतीय सेना द्वारा मौत के घाट उतार जा चुका है। वहीं अगर 2014 से तुलना की जाए तो ये दोगुने से भी काफी ज्यादा है।

इसके अलावा छत्तीसगढ़ में भी कई इलाके ऐसे थे जहां सड़क आदि न होने से वहां नक्सलियों का एक छत्र राज था। अब अर्द्धसैनिक बल हर नक्सली इलाके तक अपनी पहुंच बढाने के लिए पहले रोड बना रहे हैं और फिर उस इलाके से नक्सलियों का सफाया करते जा रहे हैं। चूंकि नक्सलियों का ब्रेनवाश करके उन्हें हथियार थमाने वाले बड़े बड़े विश्विद्यालय में प्रोफेसर बनकर बैठे हैं तो किसी समाचार पत्रों में लेख लिख रहे हैं; ऐसे छद्म उदारवादियों यानि शहरी नक्सलियों पर भी सरकार ने कड़ा कदम उठाया है। पुणे पुलिस ने हाल ही में कई अर्बन नक्सलियों को गिरफ्तार किया है और उनकी गिरफ्तारी रोकने के लिए रातों में कोर्ट खुलवाने वाले देशद्रोही छद्म उदारवादी भी इस बार कोर्ट के फैसले से उदास नजर आए।

चूंकि ये लड़ाई अब केवल भारत-पाकिस्तान, या सुरक्षा एजेंसियां-आतंकी के बीच नहीं है; अर्बन नक्सल या फिर छद्म बुद्धिजीवियों के आने से अब ये विचारधारा की लड़ाई बन चुकी है। यही कारण है सेना का पूरी तरह साथ देने वाली सरकार पर देश के टुकड़े देखने वाले उदारवादी भी हमला करते हैं, छद्म लेखक पुरुस्कार लौटने वाले और छद्म एक्टिविस्ट रात में कोर्ट खुलवाकर आतंकियों की फांसी रुकवाने वाले भी हमला करते हैं। बिना किसी विचारधारा का रीढ़हीन विपक्ष तो मुद्दों पर किसी मवेशी जैसा बुद्धिहीन होकर विचरण करता दिखाई देता है। ये लड़ाई हर उस इंसान की है जो अपने देश का ध्वज कभी झुके हुए नहीं देखना चाहता, ये लड़ाई हर उस इंसान की है जिसे हर हाल में अपने देश की प्रगति देखना है, ये लड़ाई उस मां की भी है जो अपने बेटों की शहादत पर भी आंसू पी जाती है, ये लड़ाई उस बहन की भी है जो तिरंगे में लिपटी हुई अपने भाई की लाश को देखकर अपने आंसू पोंछकर अपने भाई की तरह ही भारत माता की सेवा करना चाहती है, ये लड़ाई हर उस औरत की है जो तिरंगे में लिपटे हुए अपने पति की लाश देखकर इसलिए आंसू नहीं बहा सकती कि कहीं दूसरी औरतें अपने पतियों को सीमा पर जाने से रोक न लें। ये लड़ाई हम आप सबकी है जो टैक्स देकर अपनी देश की अर्थव्यवस्था में मदद कर रहे हैं, अपनी सेना की मजबूती पर गर्व करते हैं और तिरंगे को हमेशा खुले गगन में लहराते देखने का सपना संजोए रहते है।

मेरे देश के जवानों! इस लड़ाई में आप अकेले नहीं हैं, आप बाहरी दुश्मनों से निपटिये हम छद्म वुद्धिजीवियों की आड़ में छिपे नक्सलियों और आतंकियों के समर्थकों से निपटेंगे। ये देश न कभी झुका था और न ही कभी झुकेगा; इसका वैभव अमर था और अमर रहेगा। भारत माता के चरणों में अपने प्राणों की आहूति देने वालों की कमी न कभी थी और न कभी होगी; आज हम हैं कल कोई और होगा, जो इस देश की अखंडता के लिए प्रतिबद्ध होगा। वंदे मातरम!! जय हिंद ????

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