विश्व का सबसे प्राचीनतम सनातन धर्म और इसी धर्म के महान महर्षि कश्यप की भूमि कश्मीरश्रीनगर नाम ही बताने के लिए पर्याप्त है कि ये भूमि किस धर्म की रही होगी। सिंधु नदी की सैन्धव सभ्यता और सैन्धव सभ्यता में मिली पशुपतिनाथ की मूर्ति हो या मातृदेवी की; ये बताने के लिए पर्याप्त है कि ये भूमि किस धर्म के मानने वालों की रही है। ‘वितस्ता’ को ‘झेलम’ कहने से इतिहास बदल नहीं जाता है; मार्तंड मंदिर के भग्न अविशेष हों या तक्षशिला के खंडहर ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि किन लोगों ने धर्म के साथ साथ प्रगति पर भी चोट की है। कल्हण की राजतरंगिणी हो या फिर बौद्ध संगीति सनातन धर्म और कश्मीर का रिश्ता बताती है। अमरनाथ की गुफा हो या वैष्णों देवी की गुफा इस धरती से रिश्ता सनातन धर्म का ही रहा है।

हमारी सभ्यता और संस्कृति पर चोट करके, हमारे मंदिरों और विश्वविद्यालयों को भग्न अवशेषों में बदलकर जो लोग “कश्मीरियत” का राग अलापते हैं; उन्हें उनकी कश्मीरियत के दर्शन करवाते हैं। सदियों के सनातन धर्म की भूमि रहे कश्मीर पर कई देशों धर्मों के लोग आए और आत्मसात होते गए। सिकन्दर पुरु के पौरुष को नहीं डिगा सका तो कनिष्क जैसे राजाओं ने स्वयं को भारतीय संस्कृति में आत्मसात कर लिया। लेकिन कुछ राक्षसी पृवत्ति के लोग आए उन्होंने विश्वविद्यालय नष्ट किये, मंदिर नष्ट किये और भारत की आजादी होते होते हिन्दू बहुल इलाके को मात्र 15% हिन्दू बचे। राजा हरि सिंह की अदूरदर्शिता कहिये कि कश्मीर को भारत में तब मिलाया जब तक आधा पाकिस्तान ने कब्जा नहीं लिया।

आज यानि 19 जनवरी वो दिन है, जब कश्मीर के इन 15% हिंदुओं को सिर्फ 4% पर समेट दिया गया और इस बार न किसी युद्ध की वजह से हुआ न ही किसी औरंगजेब के शाही फरमान पर, इस बार लाउडस्पीकर से खुलेआम हिंदुओं की मौत और महिलाओं के बलात्कार की धमकियों के एलान किये गए।

मुसलमान बन जाओ या तो कश्मीर छोड़ दो

रातों रात करीब 3 लाख कश्मीरी पंडित अपने घरबार छोड़ने को मजबूर हो गए, जो नहीं छोड़ पाए उन्हें जान से मार दिया गया, उनकी महिलाओं के साथ महीनों तब तक बलात्कार किया गया जब तक वे मर नहीं गई। हर कश्मीरी पंडित के घर के बाहर नोटिस लगा था, “या तो मुस्लिम बन जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ…या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ“। उर्दू अखबार हिज्ब उल मुजाहिदीन ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसमें लिखा था कि ‘सभी हिंदू अपना सामान बांधें और कश्मीर छोड़ कर चले जाएं‘। इसी को स्थानीय अखबार अल सफा ने दोहराया।

215 घटनाओं में करीब 700 लोगों के मारे गए

करीब 215 घटनाओं में करीब 700 लोगों के मारे जाने के रिकॉर्ड सरकार के पास हैं; सुप्रीम कोर्ट की बेंच जस्टिस खेहर और जस्टिश चंद्रचूड़ ये कहकर इनकी जांच से इनकार कर देती है कि घटना को 27 साल हो गए हैं अब सबूत कहाँ से लाएंगे। कश्मीरी पंडितों के लिए जो आवाज़ उठाता है उसे साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता है।

बाद में भी हुए कश्मीर में बड़े नरसंहार

ऐसा नहीं है कि ‘कश्मीरियत‘ पर बड़ी बड़ी बातें करने वालों ने कोई सबक लिया हो। इसके बाद भी कश्मीर में हुए बड़े नरसंहार होते रहे हैं :

डोडा नरसंहार– अगस्त 14, 1993 को बस रोककर 15 हिंदुओं की हत्या कर दी गई।

संग्रामपुर नरसंहार– मार्च 21, 1997 घर में घुसकर 7 कश्मीरी पंडितों का अपहरण करके मार डाला गया।

वंधामा नरसंहार– जनवरी 25, 1998 को हथियारबंद आतंकियों ने 4 कश्मीरी परिवार के 23 लोगों को गोलियों से भून डाला।

प्रानकोट नरसंहार- अप्रैल 17, 1998 को उधमपुर जिले के प्रानकोट गांव में एक कश्मीरी हिन्दू परिवार के 27 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया, इसमें 11 बच्चे भी शामिल थे। इस नरसंहार के बाद डर से पौनी और रियासी के 1000 हिंदुओं ने पलायन किया था।

2000 में अनंतनाग के पहलगाम में 30 अमरनाथ यात्रियों की आतंकियों ने हत्या कर दी थी।

20 मार्च 2000 चित्तीसिंघपोरा नरसंहार, होला मोहल्ला मना रहे 36 सिखों की गुरुद्वारे के सामने आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

2001 में डोडा में 6 हिंदुओं की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

2001 में जम्मू रेलवे स्टेशन नरसंहार, सेना के भेष में आतंकियों ने रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी कर दी, इसमें 11 लोगों की मौत हो गई।

2002 में जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर आतंकियों ने दो बार हमला किया, पहला 30 मार्च और दूसरा 24 नवंबर को, इन दोनों हमलों में 15 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई।

2002 में कासिम नगर नरसंहार में 29 हिन्दू मजदूरों को मार डाला गया। इनमें 13 महिलाएं और एक बच्चा शामिल था।

2003 में नंदीमार्ग नरसंहार, पुलवामा जिले के नंदीमार्ग गांव में आतंकियों ने 24 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था।

मार्च 1998 में जिहादियों ने एक दूध पीते बच्चे का कत्ल किया।

2 फरवरी 1990 को सामाजिक कार्यकर्ता सतीश टिक्कु की हत्या कर दी गई। 23 फरवरी को कृषि विभाग के कर्मचारी अशोक की टांगों में गोली मारकर उन्हें घंटों तड़पाने के बाद सिर में गोली मारकर उनका कत्ल कर दिया गया। एक सप्ताह बाद नवीन सपरू का कत्ल कर दिया गया। 27 फरवरी को तेजकिशन को इन जिहादियों ने घर से उठा लिया और तरह-तरह की यातनाएं देने के बाद उसका कत्ल कर उसे बड़गाम में पेड़ पर लटका दिया।

19 मार्च को इखवान-अल-मुसलमीन नामक संगठन के जिहादियों ने टेलीकाम इंजीनियर बीके गंजु को घर में घुसकर पड़ोसी मुसलमानों की सहायता से मारा। उसके बाद राज्य सूचना विभाग में सहायक उपदेशक पीएन हांडा का कत्ल किया गया।

70 वर्षीय स्वरानंद और उनके 27 वर्षीय बेटे वीरेंद्र को जिहादी घर से उठाकर अपने कैंप में ले गए और उनकी पहले आंखें निकाली गईं, अंगुलियां काटी गईं फिर उनकी हत्या कर दी गई।

चूंकि कश्मीर के समर्थन में हजारों आतंकवादी संगठन रहते हैं, खाड़ी देशों से स्थानीय समाचार एजेंसियों को फंड आता है इसलिए ऐसी कई घटनाएं पत्रकार बड़ी चतुराई से दबा देते हैं जो हम तक पहुंच ही नहीं पाती। हम तक वो घटनाएं पहुंचती हैं जो ये पत्रकार पहुंचाना चाहते हैं जैसे जनवरी में हुई कठुआ की घटना तब नहीं पहुंची जब पहुंचनी चाहिए थी उसके 5-6 महीने बाद पहुंची जब पत्रकारों को उचित पारिश्रमिक दिया गया और आजकल यही पत्रकार कठुआ का नाम तक भूल गए जबकि पीड़ित परिवार न्याय के लिए भटक रहा है।

यही है “कश्मीरियत” और ऐसी कश्मीरियत पर धिक्कार है। जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला की मिलीभगत से आज कश्मीर की हालत ये है कि आज कश्मीरी पंडित अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं जबकि स्वयं की कश्मीरी पंडित कहने वाले जवाहर लाल नेहरू ने ही शेख अब्दुल्ला को ये जानते हुए भी शह दी कि वे हिन्दू राजा हरि सिंह को सत्ता से हटाकर जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बनकर इसे मुस्लिम बहुल प्रदेश में बदलना चाहते हैं।

आप भूल सकते हैं लेकिन इतिहास ने न जवाहर लाल नेहरू को कश्मीर मुद्दे पर माफ किया है न ही श्यामाप्रसाद मुखर्जी के बलिदान को भुलाया है। आज भी शेख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और सचिन पायलट कांग्रेस पार्टी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्बद्ध हैं। इसका ही परिणाम है कि 1990 में जिस कलंकित घटना ने कश्मीर से हिंदुओं को 15% से 4% पर समेट दिया वो घटना दोबारा कभी भी दोहराई जा सकती है और हिन्दूओं का अस्तित्व समाप्त कर सकती हैं। उसके बाद ‘अनंतनाग’ को जैसे इस्लामाबाद कर दिया गया है वैसे श्रीनगर का नाम भी बदल जायेगा और इस पर कोई सवाल इसलिए नहीं उठाएगा क्योंकि ये नाम बदलने वाला काम योगी आदित्यनाथ नहीं कर रहे होंगे।

दो दिन पहले महबूबा मुफ्ती आतंकियों से बात करने का बयान देती हैं और अगले ही दिन लाल चौक पर बम फोड़ दिए जाते हैं; ये मानसिकता कश्मीर को शेष भारत से अलग करती है। हर घर में दंगाई, आतंकी और पत्थरबाज पैदा करने वाले कश्मीरी जब शोषित होने का रोना रोते हैं, तो विडंबना आत्महत्या कर लेती है। कश्मीरी पंडितों के साथ जो किया उसकी माफी नहीं मांग सकते, भारतीय सेना पर पत्थर फेंकते हैं उसकी माफी नहीं मांग सकते, हर आतंकी हमले में इनका सहयोग होता है उसकी माफी नहीं मांग सकते।

पूरे जम्मू-कश्मीर राज्य में मुख्यमंत्री कश्मीर से निर्वाचित होकर आता है जबकि आर्थिक रूप से इनका योगदान देखिए न के बराबर। भारत सरकार की तरफ से इस राज्य को पैसा मदद के रूप में मिलता है जबकि ये राज्य अपने खुद के खर्चे नहीं निकाल सकता बिना मदद के। ऐसा नहीं है कि जम्मू-लद्दाख क्षेत्र भी ऐसे हैं, जम्मू और लद्दाख़ क्षेत्र ही राज्य के राजस्व में काफी योगदान देते हैं जबकि कश्मीर को जितना मिलता है उसका आधा भी नहीं देते। हमने कश्मीर के आर्थिक योगदान पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित कर रखी है : पढिये

भारत तेरे टुकड़े होंगे” ये सपना भी कश्मीर से देखा जा रहा है जिसके लिए हमारे कितने जवान शहीद हो गए। बाढ़ के दौरान इन्हें 1700 करोड़ का राहत पैकेज मिला जबकि आधे से ज्यादा केरल जलमग्न था और उसे मिला मात्र 500 करोड़, तमिलनाडु को चक्रवाती तूफान राहत में इससे भी कम जबकि ये दो राज्य भारत के राजस्व में जम्मू-कश्मीर से कई गुना योगदान देते हैं।

देश की आर्थिक तरक्की में न के बराबर योगदान जबकि सरकारी मदद सबसे ज्यादा, हर घर में पत्थरबाज-आतंकियों के मददगार पैदा करने वाले, कश्मीरी पंडितों को जान से मारने वाले-बहन-बेटियों के साथ बलात्कार करने वाले-घाटी से भगाने वाले, भारतीय सेना पर पत्थरबाजी करके आतंकियों की मदद करने वाले जब शोषित होने का रोना रोते हैं तो असलियत में “कश्मीरियत” का असली चित्रण होता है।

महमूद गजनवी से लेकर औरंगजेब तक, 9/11 का हमला हो या 26/11 का; दुनियाँ स्वयं ही सब देख रही है। दुनियाँ मजहबी तांडव देख रही है चाहे ISIS का हो, अलकायदा का हो या बोकोहराम का। ये ताडंव किसी न किसी विचारधारा से तो पैदा ही होता है जो इंसानों को इंसानियत से ही दूर करने लगती है। बस इसी विचारधारा का छोटा सा नमूना है : “कश्मीरियत”; जिसमें सर्दियों से रहते आये कश्मीरी पंडित भी नहीं हैं, तक्षशिला विश्वविद्यालय भी नहीं है और न ही है मार्तंड मंदिर।

चूंकि आप अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष नहीं करेंगे तो आपका अस्तित्व मिट जाएगा और आपको इसका भान भी नहीं होगा। जैसे ये सारी घटनाएं भूलकर आप समाचारों में देखतें हैं कि कश्मीरियों पर भारतीय सेना अत्याचार कर रही है जबकि असलियत आप जानना ही नहीं चाहते। आंखें बंद रखने से वास्तविकता नहीं मिट जाती, जागिये वरना कब तन्द्रा चिर-निंद्रा में बदल जाएगी पता ही नहीं चलेगा।

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  1. […] पंडित समुदाय की काफी समय से मांग है कि 1990 के दशक की शुरुआत में उन्हें अपनी जमी… की वजह से ओने-पोने दाम में बेचने को […]