ओदंतापूरी एक बहुत ही अंजाना सा नाम.शायद ही आज के लोग इससे वाकिफ होंगे, लेकिन ये नाम है महान भारत के बहुत बड़े विश्वविद्यालय का जिसे इतिहास ने भी भुला दिया और हम भारतीयों ने भी !!!

ओदंतापूरी को उदंडपुर या ओदन्तपुरा के नाम से भी जाना जाता है, ये बिहार शरीफ, नालंदा जिले बिहार में  स्थित है ! यहां पर प्राचीन भारत के तीन सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक ओदंतापूरी विश्वविद्यालय हुआ करती थी, जिसे की बख्तियार खिलजी ने नष्ट करवा दिया था, और हम लोगो ने इसे भुला दिया | ये भारत के गौरवमयी इतिहास की एक भूल ही है, की हमारे देश में एक शहर का नाम इसी विश्वविद्यालय को नष्ट करने वाले बख्तियार के नाम पर रखा गया है |

ओदंतापूरी विश्वविद्यालय के अवशेष आज भी हिरण्य प्रभात पर्वत, बिहार सरीफ में मिल जायेंगे, जिसका की पूर्व वर्ती नाम ओदन्तपुर विहार या पदंतपुर बुद्धिष्ट विहार था, उस वक़्त में यहाँ से एक नदी पंचानन निकलती थी, जिसके तट पर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी | शहरों के नाम बदलने की जरूरत यूँ ही नहीं पड़ती, हमे अपने देश में किसी भी ऐसे व्यक्ति के नाम पर जगह के नाम रखने की जरूरत ही क्यों पड़त है, जिसने पूरे भारत और यहाँ की सभ्यता को नष्ट किया हो ? किसी भी जगह को नष्ट करने के लिए, दो ही तरीके सबसे कारगर हैं, जिनका कोई तोड़ नहीं.एक तो वहां की युवा पीढ़ी को बर्बाद कर दो दूसरा वहां सभ्यता को ख़राब कर दो | आपको किसी देश पर जहाज से हमला करने की जरुरत ही नहीं है, अगर आपने ये दोनों काम कर दिए तो वो देश स्वतः ही बर्बाद हो जायेगा !!!

कुछ ऐसा ही हमारे इतिहासकारों ने किया हैं, जब वो हमारी युवा पीढ़ी को महान भारत का असली इतिहास नहीं पढ़ते, हमें फर्क ही नहीं पता चल पाता की शिवाजी महान थे या अकबर ?

ओदंतापूरी विश्वविद्यालय की स्थापना आठंवी सदी में पाला वंश के राजा गोपाल ने की थी | ये उस समय की भारत में स्थापित छठवां विश्वविद्यालय था, ये बुद्धा के प्रचार प्रसार के साथ ही तंत्र विद्या के ज्ञान का भी क्षेत्र था, इसकी ख्याति चीन से लेकर रोम तक थी | उस समय में यह विश्वविद्यालय देश विदेश से आये हुए तक़रीबन १२००० छात्रों की शिक्षा का केंद्र था | ख़ास बात यह है, की हमारे इतिहासकारों ने इस शिक्षा के केंद्र का जिक्र ज्यादा किया ही नहीं है, लेकिन हकीकत में यह विश्वविद्यालय तिब्बतन शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था, और महत्वपूर्ण काव्यों की रचना भी इसी विश्वविद्यालय में ही थी, जिसे की भारत में बाद में इतिहासकारों ने मुग़ल काल का योगदान बता दिया | सं ११९३ ईस्वी में बख्तियार खिलजी ने इस विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया था, ये वही समय था जब नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट किया गया था |
पूरे तिब्बत में ज्ञान के प्रसार के लिए ओदंतापूरी विश्वविद्यालय ही केंद्र हुआ करता था, यहाँ के कई विद्वानों को चीन के राजा द्वारा बुलाया जाता था और उनसे हमारे भारत के संस्कृत में लिखे हुए ग्रंथों को उनकी भाषा में अनुवाद कराया जाता था !!! आप खुद सोच सकते हैं की भारत वंश का इतिहास कितना गौरवमयी रहा होगा, लेकिन इसे इतिहासकारों ने आज के इतिहास में जगह ही नहीं दी | दूसरा हमें ये सोचना होगा की जो हमने ऐसे शिक्षा के पवित्र संस्थानों को नष्ट किया है, उन लोगो को सम्मान देने की कितनी जरुरत है, फिर शायद आपको अंदाजा होगा की शहरों के नाम बदलने कितने जरुरी हैं !!!