कुछ दिन पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री श्री सिद्दारमैया ने एक ट्वीट किया था जिसने काफी सुर्खियां बटोरी थी जिसमें उन्होंने दक्षिण भारत के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी उल्लेखित किया था। दरअसल ये पूरा मामला 15वें वित्त आयोग का है, जो अपनी रिपोर्ट 2011 की जनगणना के आधार पर बनाने वाली है। आइये इस पर विस्तार से जानते हैं कि आखिर मामला क्या है?

सबसे पहले तो 15वें वित्त आयोग से ये संभावनाएं उभरकर हमारे सामने आ सकती हैं –

  1. इस आयोग की रिपोर्ट के बाद हो सकता है उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच एक दरार बन सकती हैं जो देश की अखंडता के बेहद घातक सिद्ध हो सकती है ।
  2. अगर 15वां वित्त आयोग 2011 की जनगणना को आधार बनाता राज्यों को धन के वितरण पर अपनी रिपोर्ट बनाएगा तो इससे केरल, तमिलनाडु, पॉन्डिचेरी, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र को बहुत ज्यादा नुकसान हो सकता है। क्योंकि उत्तर भारत के राज्यों की जनसंख्या दक्षिण भारत के राज्यों की जनसंख्या से काफी ज्यादा हो चुकी है। फलस्वरूप उत्तर प्रदेश और बिहार को केन्द्र से ज्यादा धन मिल सकता है और दक्षिण भारत के राज्यों को भारी नुकसान हो सकता है।
  3. उत्तर भारत विकास के पथ पर अपेक्षित रूप से ज्यादा तरक्की कर सकता है।
  4. दक्षिण भारत में काम करने वाले लोगों को व्यक्तिगत रूप से काफी नुकसान झेलना पड़ सकता है क्योंकि अगर दक्षिण भारत में कोई आंदोलन उभर कर सामने आता है तो ये देश के लिए बहुत बुरा होगा।
  5. “द्रविड़ नाडु” का विचार जोर पकड़ सकता है जैसा कि इस समय देखा जा सकता है, तमिलनाडु में DMK नेता स्टॅलिन ने फिर से इस मुद्दे को उठाकर इसमें हवा दे दी है।

द्रविडनाडू :

आइये सबसे पहले हम बात करते हैं “द्रविड़ नाडु” पर; जैसा कि आपको आजकल पता ही होगा कर्नाटक हाई कोर्ट के कावेरी नदी के फैसले पर तमिलनाडू में काफी आंदोलन किये जा रहे हैं। इसी का फायदा उठाते हुए DMK नेता स्टालिन ने अलग द्रविड़ नाडु बनाने की वकालत कर दी है और ये सिद्दारमैया के उस ट्वीट की वजह से ज्यादा तेज हो गया जिसमें उन्होंने 15वें वित्त आयोग का विरोध करने की बात कही है। दरअसल अलग द्रविड़ नाडु का मतलब है दक्षिण भारत के सभी राज्य मिलकर गणतंत्र भारत से अलग हो जाएंगे क्योंकि वो सोचते हैं कि वो उत्तर भारत से ज्यादा विकसित और सांस्कृतिक रूप से अलग हैं। वैसे देखा जाए तो इन बातों को बल केवल दो वजह से मिला है; पहला कावेरी मुद्दा और दूसरा 15वां वित्त आयोग।

वैसे अलग द्रविडनाडू की मांग कोई नई नहीं है ये बहुत पुरानी मांग है। दक्षिण भारत में तमिलनाडु में लोग इसका सबसे ज्यादा समर्थन करते हैं क्योंकि सबसे समृद्ध और बड़ा राज्य तमिलनाडु है जो अलग द्रविडनाडू बनने पर सबसे ज्यादा फायदा उठाएगा। केवल इसी वजह से बाकी के राज्य इस बात का कम समर्थन करते हैं, क्योंकि वो तमिलनाडु की अधीनता स्वीकार नहीं कर सकते। जब दक्षिण भारत में एक चेन्नई राज्य हुआ करता था तब तमिल लोगों में और तेलगु लोगों में काफी मतभेद हो गए थे जिसके निपटारा State Reorganization Act – 1956 बनाकर करना पड़ा और अलग राज्य तमिलनाडू-आंध्रप्रदेश बना दिये गए। ठीक ऐसा ही हाल मुम्बई राज्य का हुआ और महाराष्ट्र और गुजरात अस्तित्व में आये थे। भविष्य में ऐसा न हो इसलिए 1963 में देश से अलग होने की मांग को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। अब अगर ऐसा होता है तो इसे एक देशद्रोह की घटना माना जायेगा और केंद्र अपनी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र है। कुल मिलाकर इतना है अलग द्रविड़नाडु की मांग ज्यादा कारगर नहीं हो सकती।

15वां वित्त आयोग :

  1. इसे 2017 में बनाया गया था। इसके अध्यक्ष पूर्व राजस्व सचिव और राज्यसभा सदस्य N K सिंह हैं।
  2. आयोग का मुख्य उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकार के बीच कर (टैक्स) का आवंटन है।
  3. आयोग केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट अक्टूबर 2019 में सौंपेगा तथा केंद्र सरकार उन सुझावों पर अमल करना 2020 से 5 साल के लिए शुरू करेगी।
  4. आयोग अपनी रिपोर्ट 2011 की जनगणना के आधार पर बनाएगा।
  5. केंद्र सरकार प्रदेश की आबादी के अनुसार टैक्स का पैसा आबंटित करेगी।
  6. अभी तक के वित्त आयोग 1971 की जनगणना को आधार मानकर अपने सुझाव केंद्र को भेजते थे।
  7. टैक्स द्वारा जितना पैसा एकत्र किया जाएगा उसका 58% केंद्र सरकार देश के कामों में लगाएगी तथा बाकी का 42% राज्यों में आपस में बांटने में इस्तेमाल किया जाएगा।

आपकी जानकारी के लिए बता दूँ 2011 की जनगणना को आधार मानकर ही 14वें वित्त आयोग ने केंद्र सरकार को अपने सुझाव भेजे थे हालांकि तब 10% डेटा 2011 की जनगणना से लिया गया था और शेष 90% 1971 की जनगणना से लिया गया था।

हालांकि दक्षिण भारतीय लोगों का 15वें वित्त आयोग के प्रति विरोध मेरी व्यक्तिगत सहानुभूति रखता है क्योंकि

  1. 1971 से 2011 के बीच तमिलनाडु में जनसंख्या बृद्धि केवल 56% दर्ज की गई
  2. 1971 से 2011 के बीच केरल में जनसंख्या बृद्धि 75% दर्ज की गई और ये 75% एक विशेष समुदाय जिसका हम नाम नहीं लेते उसके योगदान की वजह से सम्भव हुई
  3. 1971 से 2011 के बीच उत्तर प्रदेश ने 138% की जनसंख्या बृद्धि दर्ज की। “हम दो हमारे दो” के जमाने में एक विशेष समुदाय ने इधर भी अपना कमाल दिखाया। यही हाल बिहार का भी है।
  4. अब बात करते हैं उस राज्य की जहां से टैक्स कलेक्शन बेहद कम रहता है, जहां के नागरिक आजादी चाहते हैं। हर बच्चा मुजाहिद्दीन बनना चाहता है। जी हां! सही समझा पत्थरबाजों के जम्मू कश्मीर में 171% की बृद्धि दर्ज की गई। ऐसा तब हुआ जब 1990 के कश्मीर दंगो के बाद लाखों हिन्दू कश्मीरी पंडित पलायन कर चुके थे। तो केवल 1971 से 2011 के बीच इतनी प्रचण्ड जनसंख्या कहाँ से बढ़ गई है? इसका कारण है एक विशेष समुदाय जिसका हम नाम नही लेते और रोहिंग्याओं का अवैध रूप से बस जाना, क्योंकि ये भी जनसँख्या में शामिल हो चुके हैं इनके पास भी आधार कार्ड और वोटर कार्ड है।
  5. महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक भारत के कुल कर राजस्व में आधे से ज्यादा हिस्सा देता है। ऐसे में इन्ही राज्यो को राजस्व का नुकसान झेलना वाकई न्यायोचित नहीं है।
  6. महाराष्ट्र का एक आदमी 33000₹ केंद्र की टैक्स बास्केट में देता है वहीं गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक में यह 20000₹ है। अगर बात की जाए उत्तरप्रदेश की तो यह मात्र 7000₹ है।

अब बात आखिर आपको समझ आ गई होगी जब देश में सबसे ज्यादा टैक्स कलेक्शन दक्षिण भारत से होता है तो वो लोग उसी अनुपात में पैसा लेने का भी हक़ रखते हैं। हालांकि अंधे राजनेताओं ने इसे उत्तर भारत और दक्षिण भारत की लड़ाई बना रखी है जबकि आंकड़ो पर गौर करें तो इसके पीछे एक विशेष समुदाय नज़र आता है जो टैक्स देने में बेहद कमतर भी है और जिसे हर लाभ भी चाहिए।

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आप बताइए, आपको कैसा लगेगा जब आपकी मेहनत की गाढ़ी कमाई पत्थरबाजों को सुविधाएं देने में खर्च हो जाती हैं और वही पत्थरबाज हमारे टुकड़ो पर पलते हुए आंखे तरेरते हैं। ठीक वैसा ही लगता है दक्षिण भारत के लोगों को जब उनके टैक्स का पैसा यहां आंदोलनों में स्वाहा होता रहता है। मैं भारत की अखंडता में विश्वास करता हूँ, इसलिए अलग द्रविडनाडू का समर्थन नहीं करता लेकिन अगर अपने नाराज हों तो समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए, युद्ध नहीं।

आप ही बताइए, 1971 से 2011 के बीच जब दक्षिण भारतीय राज्य जनसँख्या पर लगाम लगाने के लिए प्रयासरत थे तब उत्तरप्रदेश, बिहार और जम्मूकश्मीर जनसँख्या बढ़ा रहे थे। यहां की सरकारें भी एक से बढ़कर एक मक्कार हुई हैं जिन्होंने कुछ नहीं किया। ऐसे में इधर के लोगों और सरकारों की गलती को दक्षिण भारतीय राज्य क्यों वहन करें। संलग्न चार्ट में आप देख सकते हैं कि जब दक्षिण भारत में जनसंख्या दर २०% की दर से कम हो रही थी तब उत्तर भारत में यही लगभग ४०% की दर से बढ़ रही थी; ऐसे में क्या उन्हें पुरुस्कार की जगह दंड मिलना चाहिए?

वैसे जो आंकड़े मुझे उपलब्ध हुए हैं उनसे से साफ है, कि किस समुदाय के गँवारू रवैये की वजह से ये आर्थिक असंतुलन की बात सामने आई है तो ऐसे में इन राज्यों के सारे नागरिकों को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। आप लोगों से निवेदन है इस प्रोपोगंडा को उखाड़ फेंकिये, किसी एक समुदाय की बदनीयती की वजह से देश टुकड़ों में नहीं बटना चाहिए। हमारी अखण्डता सर्वोपरि है; हमें अपने देशवासियों ने नहीं लड़ना है किसी भी कीमत पर।

नोट: मेरी उत्तरप्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर के लोगों से कोई दुश्मनी नहीं है न ही दक्षिण भारतीय राज्यों से विशेष अनुराग। मैं स्वयं उत्तरप्रदेश के निवासी हूँ। मुझे जो आंकड़े मिले उसके आधार पर मुझे जो सच लगा वो मैंने लिखा। और हां! डरता तो मैं किसी के बाप से नहीं।

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