आम चुनाव 2019 के लिए कांग्रेस पार्टी ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है। इस घोषणापत्र में कांग्रेस ने कई अहम एवं बड़े वादे किए। जैसे- लोकसभा और विधानसभाओं तथा सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33% आरक्षण, गरीबों के लिए प्रति वर्ष 72,000 रुपए, आदि अनेकों वादे किए। इस घोषणापत्र में कांग्रेस ने अपने सबसे पुराने एवं अतिप्रिय मुद्दे राफेल डील को नहीं छोड़ा। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि सत्ता में आए तो राफेल डील की जांच कराएंगे। अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की शक्तियां कम करने की बातें भी कहीं।

लेकिन इन सबके बीच कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कुछ ऐसे वादे किए, जिन पर एक आम आदमी का ध्यान नहीं गया या गया भी होगा तो एक आम आदमी शायद इसे इनकार भी कर दे। वो वादे हैं- जम्मू कश्मीर में ‘AFSPA’ (Armed Forces Special Power Act) की समीक्षा करना और ‘देशद्रोह’ के कानून को खत्म करना। इसके साथ ही जम्मू कश्मीर में सभी हुर्रियतों तथा अलगाववादियों से बिना किसी शर्त बातचीत की जाएगी।

देशद्रोह के कानून को खत्म करने के पीछे कांग्रेस ने ये तर्क दिया कि हाल के वर्षों में इस कानून का मोदी सरकार ने दुरुपयोग किया है और निर्दोषों तथा मासूमों को फंसाया गया है। पार्टी का यह तर्क जेएनयू देशद्रोह कांड में आरोपित कन्हैया कुमार एंड कंपनी को लेकर था। बता दें कि इसी वर्ष 14 जनवरी को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान सहित 10 आरोपियों के खिलाफ पटियाला हाउस कोर्ट में 1200 पन्नों की चार्जशीट दायर की थी।

इसके बाद कांग्रेस के कई नेता देशद्रोह के आरोपियों के समर्थन में उठ खड़े हुए। पूर्व कानून एवं मानव संसाधन विकास मंत्री तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने उसी समय ये कह दिया था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो देशद्रोह के कानून को खत्म किया जाएगा। पार्टी के इस चुनावी घोषणा से देश में अब राष्ट्रविरोधी तत्वों के हौसले बढ़ने शुरू हो गए हैं। ज्यादा पीछे ना जाकर हाल ही में आपने पुलवामा आतंकी हमला देखा होगा, जिसमे सीआरपीएफ के 40 वीर जवान शहीद हो गए। इसके बाद से देश के कोने कोने से देशद्रोहियों की गिरफ्तारी हुई, जिन्होंने इन सैनिकों की शहादत पर खुशी मनाई थी और आतंकियों की सराहना की थी।

कांग्रेस के अनुसार, इस कानून का दुरुपयोग होता है तथा अंग्रेजों का बनाया कानून है और जनता को गुलाम बनाए रखने के लिए ऐसा किया जाता है। अगर ऐसा है, तो फिर इस कानून आजादी के तुरंत बाद ही समाप्त कर देना चाहिए था। लेकिन उन्हें यह भूलना चाहिए कि 2004 से 2014 के यूपीए शासनकाल के दौरान इस कानून के तहत देशभर में लगभग 8000 मुकदमे दर्ज किए गए थे। इनमे से अधिकांश ऐसे लोग थे, जो अपनी जमीन के लिए सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। बहरहाल, अगर देशद्रोह कानून खत्म होने के बाद कोई देश को गाली देता है या तिरंगे को जलाता है, तो उसके खिलाफ कौन सी कारवाई की जाएगी? यह कानून खत्म होने के बाद तो देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने वालों की संख्या में बड़ा इजाफा होगा और ये भी हो सकता है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर देश से प्यार करने वाले लोग कानून अपने हाथ में लेकर देशद्रोहियों को सजा देने लगें। अगर ऐसा हुआ तो आम जनता के खिलाफ ही विभिन्न धाराओं में केस दर्ज होगा और देशद्रोही आराम से सरकारी सुरक्षा में मौज उड़ाएंगे।

क्या होता है AFSPA?

51 साल पहले भारतीय संसद ने ‘AFSPA’ यानी Armed Forces Special Power Act 1958 को लागू किया, जो एक फौजी कानून है, जिसे “डिस्टर्ब” क्षेत्रों में लागू किया जाता है। यह कानून सुरक्षा बलों और सेना को कुछ विशेष अधिकार देता है। 1 सितंबर, 1958 को अफस्पा पूर्वोत्तर राज्यों में लागू किया गया। 1990 में यह कानून जम्मू और कश्मीर राज्य के लिए लागू किया गया था और तब से यह कार्यान्वित है।

AFSPA के अधिकार-

‘AFSPA’ के अनुसार, जो क्षेत्र “डिस्टर्ब” घोषित कर दिए जाते हैं वहाँ पर सशस्त्र बलों के एक अधिकारी को निम्नलिखित शक्तियाँ दी जाती हैं–

1. चेतावनी के बाद, यदि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है और अशांति फैलाता है, तो सशस्त्र बल के विशेष अधिकारी द्वारा आरोपी की मृत्यु हो जाने तक अपने बल का प्रयोग किया जा सकता है।
2. अफसर किसी आश्रय स्थल या ढांचे को तबाह कर सकता है जहाँ से हथियार बंद हमले का अंदेशा हो।
3. सशस्त्र बल किसी भी असंदिग्ध व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं। गिरफ्तारी के दौरान उनके द्वारा किसी भी तरह की शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है।
4. अफसर परिवार के किसी व्यक्ति, सम्पत्ति, हथियार या गोला-बारूद को बरामद करने के लिए बिना वारंट के घर के अंदर जा कर तलाशी ले सकता है और इसके लिए जरूरी, बल का इस्तेमाल कर सकता है।
5. सेना के पास इस अधिनियम के तहत अभियोजन पक्ष, अनुकूल या अन्य कानूनी कार्यवाही के तहत अच्छे विश्वास में काम करने वाले लोगों की रक्षा करने की शक्ति है। इसमें केवल केंद्र सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।

कांग्रेस के इस घोषणा के बाद जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने खुशी व्यक्त की है और कहा कि ये बहुत अच्छा कदम है। बकौल अब्दुल्ला, हमने बहुत पहले ही यूपीए सरकार से यह कानून खत्म करने की बात कही थी, लेकिन कांग्रेस के ही कुछ लोगों ने इसका विरोध किया था। अब मैं चिदंबरम साहब का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने हमारी बात को समझा। मालूम हो कि इस कानून के तहत सैनिकों द्वारा आतंकियों तथा पत्थरबाजों के खिलाफ की गई कारवाई को लेकर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं होती है। जिससे उनके अधिकारों की भी रक्षा होती है। अन्यथा अभी तक ना जाने कितने सैनिकों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता था और जम्मू कश्मीर को आधिकारिक रूप से पूर्णतः इस्लामिक राज्य घोषित कर दिया गया होता। कांग्रेस के इस वादे के बाद सेवानिवृत्त एवं सेवारत सैन्य अधिकारियों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इससे सैनिकों का मनोबल कम होगा और अलगाववादियों तथा आतंकियों के हौसले बढ़ेंगे।

अगर हम साधारण भाषा में कहें तो ‘AFSPA’ सैनिकों के लिए एक तरह से सुरक्षा कवच है, जिसके तहत वो आत्मरक्षा में हथियारों का प्रयोग करते हैं। कांग्रेस सेना के इसी सुरक्षा कवच को उससे छीनना चाहती है। गौरतलब है कि पिछले 5 वर्षों में जितने भी सैनिक शहीद हुए, उसे लेकर कांग्रेस सहित सभी विपक्ष ने सरकार पर हमेशा निशाना साधा, लेकिन ‘AFSPA’ के हटने के बाद सैनिकों के शहादत की जिम्मेदारी किसकी होगी? अभी तक विपक्ष के किसी भी दल ने कांग्रेस के इस घोषणापत्र पर आपत्ति नहीं जताई, तो यह क्यों न समझा जाए कि इसमे सभी विपक्षियों की सहमति है? निश्चय ही इन सवालों का जवाब विपक्ष से मिलना मुश्किल है ता यूं कहें कि नामुमकिन है।

लेखक- शिवांग तिवारी

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