वंदे मातरम! मित्रों! मिलिट्री एंड इंटेलिजेंस सीरीज को आगे बढ़ाते हुए आज बात करेंगे भारतीय सेना के शौर्य के एक और किस्से के बारे में, जिसमें भारतीय सेना के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र की सेना ने अफ्रीकी देश सिएरा लियोन में विद्रोही आतंकियों के दांत खट्टे कर दिए थे।

गोरखा कौन हैं और खुकरी क्या है?

सबसे पहले बात करते हैं खुकरी के बारे में जिसके नाम पर इस ऑपरेशन का नाम रखा गया। दरअसल खुकरी गोरखा (गुरखा या गोरखाली) लोगों का परम्परागत हथियार होता है। नीचे चित्र में आप एक गोरखा सैनिक को हाथ में खुकरी लिए हुए देख सकते हैं। अकेले खुकरी देकर अगर आप किसी गोरखा को जंगल में भी छोड़ देंगे तब भी वो विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को जिंदा रख लेगा।

 

गोरखा दरअसल नेपाली मूल के सैनिकों को कहते हैं, अगर आप नेपाल के बनने से पहले के गोरखा साम्राज्य के नक्शे को देखेंगे तो उसमें भारत का उत्तराखंड, मौजूदा नेपाल और सिक्किम मिल जाएंगे।

उसके बाद उत्तराखंड और सिक्किम वाले भाग को अंग्रेजों ने जीत लिया और बाद में ये भाग भारत में आ गया। गोरखा युद्धकौशल में इतने निपुण होते हैं कि आज भी विभिन्न देशों की सेनाएं नेपाल आकर इन्हें नौकरी का प्रस्ताव देती हैं। गोरखा रेजिमेंट आपको भारतीय सेना में, नेपाल आर्मी में, ब्रिटिश आर्मी में, सिंगापुर-ब्रुनेई में और संयुक्त राष्ट्र की सेना में मिल जाएगी। जिन लोगों को कारगिल की लड़ाई के बारे में जानकारी होगी उन्हें पता होगा कि कैसे गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने अपार वीरता दिखाते हुए पाकिस्तानी सैनिकों को भागने पर मजबूर कर दिया था और अंतिम स्तर की लड़ाई में भारत को जीत दिला दी थी। गोरखाओं की वीरता के किस्सों पर यदि किसी को यकीन नहीं है तो उन्हें भारतीय फील्ड मार्शल सैम माणिक शॉ के इस बयान पर सोचना चाहिए :
“If a man says he is not afraid of dying, he either lying or he is Gorkha.
अर्थात यदि कोई आदमी कहता है कि उसे मरने से नहीं डरता, तो या वो झूठ बोल रहा है या फिर वो गोरखा है।”

अब बात करते हैं सिएरा लियोन देश की तो ये पश्चिम अफ्रीका में स्थित है। अगर आपमें से किसी ने ब्लड डायमंड मूवी देखी हो या फ़िर किंबरले प्रोसेस वाला मेरा लेख पढ़ा हो तो इसमें इसी देश की बात की गई है।

ब्लड डायमंड के खनन से काले करोबार को बल मिलता है, आतंकी पोषित होते हैं। इस देश के पश्चिमी क्षेत्र में एक आतंकी संगठन हावी हो चुका था उसने काफी बड़ा भू भाग कब्जा रखा था जिसमें वो नागरिकों पर कई तरह के जुल्म कर रहे थे।

आप उपरोक्त चित्र में देख सकते हैं कि कितने बड़े भू भाग पर आतंकी लड़ाकों यानि RUF (Revolutionary United Front ) ने कब्जा कर रखा था। ये लड़ाके छोटे बच्चों का अपहरण करके उनको अपने बेड़े में शामिल कर रहे थे।

बच्चों-बूढों को जान से मारा जा रहा था और महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा था। लोग किसी राजनैतिक दल को वोट न दे पाएं, इसलिए उनके हाथ तक काटे जा रहे थे। सन 1991 से लगभग ऐसा ही चल रहा था इस देश में। करीब 50000 लोग मारे जा चुके थे और 2 मिलियन आसपास के देशों में शरणार्थी बनने को मजबूर थे।

इतनी गम्भीर परिस्थितियों के बीच आखिरकार सन 1999 में संयुक्त राष्ट्र ने एक सहायता मिशन लांच करने का मन बनाया जिसका मुख्य उद्देश्य विद्रोहियों को अपने हथियार सौंपने के लिये मजबूर करना था और स्थानीय सरकार की मदद करने व्यवस्था को वापस सुचारू रूप से पटरी पर लाना था। मिशन का नाम दिया गया United Nations Assistance Mission in Sierra Leone (UNAMSIL) जिसमें भारत, घाना, ब्रिटेन और नाइजीरिया की फौजें शामिल थी। आतंकी विद्रोहियों से इस देश के दो इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित थे : कैलाहुन और दारू

भारत की फौज से 5/8वें गोरखा राइफल के 223 जवान (INDBATT-1) कैलाहुन में भेजी गई और इसी की करीब 6 राइफल कंपनी (INDBATT-2) दारू भेजी गई। इसके अलावा मैकेनाईज्ड इन्फेंट्री और पैरा कमांडो की एक क्विक रिएक्शन कम्पनी, 18th ग्रेनेडिअर, QRC मैकेनाईज्ड इन्फेंट्री, एक इंजीनियर्स की कम्पनी और पैरा सुपर कमांडो भारतीय फौज का हिस्सा थे। इसके अलावा 2-2 कम्पनी घाना और नाइजीरिया आर्मी की रिज़र्व में रखी गई थीं। इस मिशन में मेजर जनरल वी के जेटली ने भारतीय फौज का नेतृत्व किया था।

मेजर जनरल वी के जेटली

चूंकि ये संयुक्त राष्ट्र का शांति मिशन था इसी वजह से विद्रोहियों से केवल हथियार छोड़ने की उम्मीद करते हुए प्रयास किये जा रहे थे। इसी क्रम में कैलाहुन में शांतिवार्ता के लिए के कुछ प्रयास हो पाते उससे पहले ही RUF ने 1 मई 2000 को कीनिया की फौज पर मकेनी में हमला कर दिया। ये जगह दारू से करीब 250 किमी दूर थी। अलग अलग देशों की सेना होने की वजह से आपस में भाषा को समझने की परेशानी थी और इसी वजह से इस हमले का संदेश भारतीय फौज यानि INBATT-1 तक नहीं पहुंच पाया। अगले ही दिन INBATT-1 और RUF के बीच कैलाहुन में एक मीटिंग होने वाली थी। जैसे ही हमारी फौज मीटिंग करने पहुंचती है RUF पहले से सतर्क थी और उसने INBATT-1 के सभी जवानों को चारों तरफ से घेर लिया। इतना सब होने के बावजूद गोरखा सिपाहियों ने अपने हथियार नहीं डाले और वे RUF के साथ बातचीत करते रहे, आखिरकार कुछ बड़े मिलिट्री अफसरों को छोड़ दिया गया लेकिन अभी भी करीब 223 जवान और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी यहां फंसे हुए थे।

इधर भारत सरकार ने इस मिशन में शामिल सभी देशों के सामने आक्रमक सैन्य ऑपरेशन का सुझाव रखा। आखिरकार भारत के नेतृत्व में सभी देश ऑपेरशन ‘खुकरी’ के लिए तैयार हो गए। इस मिशन का नाम खुकरी क्यों रखा गया ये तो आप जान ही गए होंगे। इस ऑपरेशन को पांच फेज में चलाया जाना था :
फेज 1: संयुक्त राष्ट्र की सेना आगे बढ़ाया जाएगा।
फेज 2: हैलीकॉप्टर की सहायता से कैलाहुन में हमला किया जाएगा जिससे कि RUF की सेना बिखर जाए और उसके बाद उस क्षेत्र में सेना की सुरक्षा में कब्जा हो जाये। इसके बाद गोरखा राइफल के सैनिक जो फंसे हुए थे उनको बाहर निकाला जाएगा।
फेज 3: इसके बाद कैलाहुन में INBATT-1 को दारू में तैनात 5/8 गोरखा राइफल के जवानों से लिंक-अप करवाया जाएगा।
फेज 4: इसके बाद कैलाहुन और दारू से गोरखा फौज को पेंडेम्बू तक लाया जाएगा और यहां से उन्हें हेलीकॉप्टर की मदद से बाहर निकाल लिया जाएगा।
फेज 5: इसके बाद सारी फौजें एक साथ दारू में RUF से मोर्चा लेंगी।

 

इस ऑपरेशन को सफल बनाने में कई सारी बाधाएं थी। नया देश था, भाषा की समस्या थी और सबसे बड़ी दिक्कत थी RUF के बारे में पता लगाने के लिए किसी मुखबिर का होना। चूंकि INBATT में 2nd पैरा कमांडो भी थे इसलिए इन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई। ये कमांडो RUF के कैम्प में प्रवेश कर गए और सेटेलाइट फ़ोन के जरिये सारी जरूरी सूचनाएं अपनी फौज में भेजते रहे। 15 जुलाई को हैलीकॉप्टर की मदद से पैरा कमांडोज को RUF के क्षेत्र में उतार दिया गया। देखते ही देखते बिना किसी के कवर के भी इन्होंने दुश्मन के क्षेत्र को अधिकृत करना शुरू कर दिया। कैलाहुन में सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारियों को छुड़ाया गया उसके बाद INBATT-1 के सिपाहियों को, ठीक ऐसा ही दारू में फंसे हुए गोरखा राइफल्स के जवानों को मुक्त करवाकर एक साथ हेलीकॉप्टर से पेंडेम्बू तक लाया गया यही वो जगह थी जहां पर RUF का हेडक्वार्टर था। सारी फौजें मिल चुकी थीं और आखिरी किला भेदना था। पहले हेलीकॉप्टर से RUF के किला बन चुके हेडक्वार्टर पर गोलीबारी की गई जिससे कि RUF के लड़ाके तितर बितर हो गए और उसके बाद पैरा कमांडोज और गोरखा राइफल्स के जवानों ने RUF पर हमला कर दिया। ऑपरशन सफल रहा और पांच घण्टे अंदर अंदर पेंडेम्बू से RUF का नामोनिशान मिट गया। अधिकतर आतंकी मारे गए थे या फिर भाग चुके थे।

इस ऑपेरशन को दुनियाँ के बड़े बड़े रक्षा विशेषज्ञ जटिल होने के बावजूद बेहद सफल मानते हैं। इस पूरे ऑपेरशन में केवल एक शहादत हुई। भारतीय सेना ने ये पूरा ऑपेरशन केवल कम खर्चे में खत्म कर लिया था वहीं अगर अमेरिका जैसे देश इसे अंजाम देते तो करीब 10गुना ज्यादा खर्च करते। भारतीय सैनिकों ने आपसे में गुप्त सांकेतिक बातचीत करने के लिए मलयालम भाषा का इस्तेमाल किया। इस मिशन के सफल होने का फायदा भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ दौनों को हुआ। भारतीय सेना का लोहा पूरी दुनियां ने माना वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ की भी हैसियत दूसरे देशों में बढ़ गई। इससे पहले तक ज्यादातर देशों के ये लगता था कि दुनियाँ के तमाम विवादो को सुलझाना संयुक्त राष्ट्र संघ के वश के बाहर था। इस ऑपेरशन के बाद जब दारू में भारतीय सेना मार्च करते हुए पहुंची तो लोगों ने उनका स्वागत किया और सिएरा लियोन में आज भी ऑपेरशन खुकरी की याद में खुकरी वॉर मेमोरियल भी बनाया है।

भारतीय सेना के शौर्य के किस्से यूंही इस श्रृंखला में चलते रहेंगे। उम्मीद करता हूँ आपको ये श्रृंखला पसन्द आ रही होगी। अगली कड़ी में फिर लेकर आएंगे भारतीय सेना की वीरता की एक और दास्तान। जय हिंद ????

मिलिटी इंटलीजेंस सीरीज के पिछले अंक यहाँ पढ़े

1- मिलिट्री एंड इंटिलजेन्स : भारत की आंख ‘रॉ’ के बारे में आप कितना जानते हैं? जाने कैसे हुआ रॉ का जन्म

2- मोरारजी देसाई की वजह से पाकिस्तान के पास आज है परमाणु बम

3- इंदिरा गांधी की कैबिनेट में कौन था सीआईए एजेंट जिसने की देश के साथ गद्दारी?

4- मिलिट्री इंटलीजेंस (ऑपरेशन कैक्टस) : जब मालदीव में भारतीय सेना ने तख्तपलट की साजिश कर दी थी नाकाम