नई दिल्ली : खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार बालाकोट एयर स्ट्राईक से ज़ोरदार धक्का लगने के बाद जैश-ए-मुहम्मद ने अब अपने आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप पाकिस्तान से अफगानिस्तान में शिफ्ट करने शुरू कर दिए हैं। यहाँ हम आगे जानेंगे कि जैशे मोहम्मद की इस कदम से भारत पर क्या फर्क पड़ेगा?

बालाकोट फाईल फ़ोटो

 

एजेंसियों के अनुसार कैंप शिफ़्ट करने का आधे से ज़्यादा काम जैश-ए-मुहम्मद कर चुकी है। अब देश के लिए चिन्ता का विषय यह है कि आतंकवादी संगठन जैश-ए-मुहम्मद अफगानिस्तान और खाड़ी के देशों में भारतीय ख़ुफ़िया मिशन की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कर सकता है और उन्हें किसी भी प्रकार का नुक़सान पहुँचाने की कोशिश कर सकता है। 

गुज़रे वक्त में अफगानिस्तान में आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने का काम आतंकवादी संगठन जैश-ए-मुहम्मद कर चुका है। तालिबान के साथ मिलकर कंधार (अफगानिस्तान) में आतंकवादियों को प्रशिक्षण दिया जाता रहा है। ज्ञात रहे कंधार वो ही जगह है जहाँ 24 दिसम्बर 1999 को इंडियन एयरलाईंस की उड़ान संख्या  IC-814 को हाइजैक करके उतारा गया था और 31 दिसम्बर को मसूद अज़हर की रिहाई के बाद छोड़ा गया था। तब जैश-ए-मुहम्मद की गतिविधियाँ अफगानिस्तान के अन्दर भी कुछ हिस्सों तक ही सीमित थी और बेस कैंप भी उस समय पाकिस्तान में था। खुफिया एजेंसियों के अनुसार ताज़ा स्थिति ये है कि बेस ट्रेनिंग कैंप शिफ़्ट हो चुका है और कुल काम में से 80% काम जैश-ए-मुहम्मद कर चुका है। दूसरे शब्दों में इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि आने वाले दिनों में जैश-ए-मुहम्मद पाकिस्तान के बजाय अब अफगानिस्तान से अपनी गतिविधियों का संचालन करेगा। 

आतंकवाद को लेकर भारत के अत्याधिक दबाव और FATF (Financial Action Task Force) की तरफ से मिली रही फटकार के कारण पाकिस्तान ने जैश-ए-मुहम्मद के आंतकवादी शिविरों को अफगानिस्तान में शिफ्ट करने का कदम उठाया है। गौरतलब है कि FATF ने पाकिस्तान को बार बार चेताया है कि वो अपनी धरती से आतंकवाद को समर्थन और आर्थिक मदद देना बन्द करे नहीं तो उसे भविष्य में ग्रे लिस्ट से निकाल कर ब्लैकलिस्ट और एक आतंकवादी देश घोषित कर दिया जाएगा। इन्हीं बातों के चलते पाकिस्तान की आर्थिक हालत बहुत खराब हो चुकी है और उसे अन्य देशों से लोन लेकर गुज़ारा करना पड़ रहा है और अब ये लोन प्रक्रिया भी बन्द होने के कगार पर है। 

ख़ुफ़िया एजेसिंयो के अनुसार बालाकोट एयर स्ट्राइक्स से जै़श-ए-मुहम्मद के साथ अन्य कई छोटे आतंकवादी संगठनों को भी नुकसान पहुँचा और उनमें अधिकतर अपने ट्रेनिंग कैंपों को कराची और पेशावर में ले गए। पर पाकिस्तान  पर बढ़ते भारतीय और अंतराष्ट्रीय दबाव के चलते जैश ने अपने शिविर अफगानिस्तान में शिफ्ट कर लेने का फैसला किया है। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि अफगानिस्तान में शिफ़्ट हुए अधिकतर आंतकवादी पेशावर के कैंपों से गए हैं। 

अफगानिस्तान से अपनी आतंकी गतिविधियाँ चलाना जैश के लिए और अधिक आसान होगा। चूँकि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के आतंकवादी संगठन तालिबान का कभी विरोध नहीं किया बल्कि तालिबान को समर्थन के चलते कई बार पाकिस्तान अफगानिस्तान सरकार और अमेरिका के खिलाफ जा चुका है और आज भी ये समर्थन बदस्तूर जारी है। नब्बे के दशक में तालिबान ने अफगानिस्तान सरकार का तख्ता पलट कर उस देश पर क़ब्ज़ा कर लिया था। और उससे कहीं आगे बढ़ते हुए तालिबान ने अफगानिस्तान का नाम भी आधिकारिक तौर पर बदल कर “तालिबान” ही कर दिया था। लगभग सात वर्ष तक अफगानिस्तान को तालिबान नाम झेलना पड़ा था ओैर उस समय भी तालिबान को एक देश के तौर पर मान्यता देने वाला एक ही देश था। वो देश था पाकिस्तान। अब इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि जैश ने बेस के लिए अफगानिस्तान को ही क्यों चुना।