वंदे मातरम! ?? मित्रों! मिलिट्री एंड इंटेलिजेंस सीरीज को आगे बढ़ाते हुए आज हमारे पास भारतीय सेना के अदम्य साहस और शौर्य की कहानी है। हम आज बात करेंगे सियाचिन ग्लेशियर में स्थित दुनियाँ के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में तकरीबन 5000 मीटर की ऊंचाई पर तैनात उन जाबांज वीरों के बारे में जिन्हें विषम परिस्थितियों में देश की रक्षा करनी होती है। भारत अब तक करीब 900 से ज्यादा जवान खो चुका है इस युद्धक्षेत्र की रक्षा करने में, जबकि ये 900 जवान युध्द के दौरान शहीद नहीं हुए बल्कि वहां इंसानों के जीने के लिए दुर्गम परिस्थितियों की वजह से हुए हैं। भारत सरकार करीब 1 करोड़ रुपया रोज सियाचिन की सुरक्षा में खर्च करती है जबकि हमारे बुद्धिजीवी बड़ी आसानी से कह देते हैं कि ये क्षेत्र हमें स्वतः छोड़ देना चाहिए। आज हम देखेंगे ये क्षेत्र सामरिक दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है, यहां आजादी के बाद क्या क्या गतिविधियां हुई और किन कारणों से भारत को अपने सैनिक सियाचिन में भेजने पड़े।

ये तस्वीर है आज के जम्मू-कश्मीर क्षेत्र की। एक हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का है, पीले रंग से दिखाया गया भारत का हिस्सा है और सफेद रंग से दिखाया गया कश्मीर भी भारत का हिस्सा है लेकिन आतंकी घटनाएं और पत्थरबाजी यहीं पर होती रहती है, इस वजह से सबसे अशांत इलाका यही है। पाक-अधिकृत कश्मीर का एक छोटा हिस्सा पाकिस्तान ने चीन को गैर-कानूनी तरीके से दे दिया था वहीं अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर रखा है। आजादी के बाद भारत पाकिस्तान के बीच कराची समझौता हुआ था जिसमें लाइन ऑफ कंट्रोल (LOC) पर सहमति बनी थी। ये लाइन ऑफ कंट्रोल लद्दाख़ क्षेत्र में NJ9842 पॉइंट पर आकर खत्म हो जाती थी जबकि पाकिस्तान और चीन के मध्य आने जाने का रास्ता काराकोरम दर्रा से होकर था तो पाकिस्तान ने अपने मन से पॉइंट NJ9842 से लेकर काराकोरम दर्रे तक अपना क्षेत्र मान लिया।

अगर इस क्षेत्र का भौगोलिक नक्शा देखें तो सियाचिन ग्लेशियर को सल्टोरो पर्वत श्रृंखला पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से अलग करती है। वैसे देखा जाए तो बल्तिस्तान की बल्टी भाषा में ‘सिया’ का अर्थ एक प्रकार का जंगली गुलाब है और ‘चुन’ का अर्थ ‘बहुतायत’। अतः ‘सियाचिन’ नाम का अर्थ है : “गुलाबों की भरमार”।

सियाचिन ग्लेशियर के एकदम उत्तर में इंदिरा कोल है जहां भारत-पाकिस्तान-चीन से क्षेत्र मिलते हैं इसी वजह से ये क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। सलटोरो पर्वत श्रृंखला पर पर्वतारोहण करने के लिए पाकिस्तान की तरफ से आने में सरल पड़ता था चूंकि 70 के दशक में भारत-पाक दौनों ही इस क्षेत्र में सैन्य निगरानी नहीं करते थे इसलिए पाकिस्तान ने इसका फायदा उठाते हुए यूरोप से आने वाले पर्वतारोहियों को वीसा देना शुरू कर दिया। वहीं जब जर्मनी से एक पर्वतारोही टीम भारत सरकार से भारत की तरफ से सलतारो श्रृंखला पर पर्वतारोहण की आज्ञा मांगती है तब भारत सरकार के कान खड़े हो जाते हैं। उसके बाद भारत और पाकिस्तान दौनों की तरफ से कई पर्वतारोही इन चोटियों पर अपना वर्चस्व दिखाने के लिए जाते रहे।

इंदिरा कोल, काराकोरम दर्रा और NJ9842 के बीच का क्षेत्र अब महत्वपूर्ण होता जा रहा था। अगर देखा जाए तो सलटोरो पर्वत श्रृंखला में इंदिरा कोल से लेकर NJ9842 के बीच तीन मुख्य दर्रे हैं – सिया ला, बिलाफोंड ला और ग्योंग ला

सन 1978, भारतीय सेना सभी पर्वतारोही अभियानों को परमिशन देना शुरू करती है जो भारत की तरफ से सलटोरो श्रृंखला पर चढ़ रहे थे। कर्नल नरेंद्र ‘बुल’ कुमार टेराम कांगड़ी के लिए एक पर्वतारोही अभियान चलाते हैं और भारत का ध्यान इस क्षेत्र की ओर ले जाते हैं कि पाकिस्तान इस क्षेत्र को अपने कब्जे में लेना चाह रहा है। भारतीय थल सेना जब सियाचिन ग्लेशियर में ऐसे अभियान चलाती थी तब भारतीय वायुसेना चेतक हेलीकॉप्टर की मदद से रसद सामग्री पहुंचाया करती और कभी कभार कोई घायलों को बचाने वाला राहत अभियान भी चलाती।

पाकिस्तान की तरफ से अभियानों की तेजी को देखते हुए सन 1984 में भारतीय सेना भी इस क्षेत्र पर जल्द से जल्द अपना आधिपत्य चाहने की कोशिश में लग जाती है। इसी बीच पाकिस्तान सरकार सलटोरो श्रृंखला की एक चोटी रिमो आई को मापने के लिए जापानी टीम को अनुमति दे देती है। इसके बाद ये सिद्ध हो चुका था पाकिस्तान इस क्षेत्र को वैध बनाने की फिराक में है जिससे कि काराकोरम दर्रे का फायदा लेते हुए वो चीन के साथ व्यापार बढ़ा सके यदि ऐसा होता तो हम समरिक दृष्टि से बड़ी हार हार जाते।

अब भारतीय सेना हर हाल में एक बड़े अभियान के लिए खुद को तैयार करती है और इसी तैयारी में पर्वतारोहण सम्बन्धी उपकरण, जैकेट वगैरह सामान का एक बड़ा ऑर्डर यूरोप के एक बड़े वेंडर को दिए जाने की बात शुरू होती है। वेंडर ये ऑर्डर लेने को तैयार नहीं था क्योंकि उसके बाद थोक में ऐसा ही एक ऑर्डर पहले से था और वो ऑर्डर पाकिस्तान सेना की तरफ से था।

दरअसल पाकिस्तान ने ‘ऑपेरशन अबाबील‘ की प्लानिंग कर रखी थी जिसका मुख्य उद्देश्य 17 अप्रैल 1984 तक पूरी सलतारो श्रृंखला पर कब्जा करके सियाचिन ग्लेशियर को पाकिस्तान में मिला लिया जाए। भारतीय खुफिया एजेंसियों को पाकिस्तान के इस ऑपरेशन की भनक लग चुकी थी इसलिए भारत ने इस क्षेत्र पर 13 अप्रैल 1984 को ही कब्जा करने की प्लानिंग की और इस अभियान को नाम दिया गया महाकवि कालिदास के नाटक ‘मेघदूत‘ पर। जम्मू एवं कश्मीर के श्रीनगर में 15 कॉर्प के तत्कालीन जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून ने इस अभियान की अगुवाई की। भारतीय वायुसेना ने I06, AN12 और AN32 का उपयोग भण्डारण और सैनिकों के साथ-साथ हवाई अड्डों की आपूर्ति करने के लिए ऊंचाई वाले हवाई क्षेत्र में किया और वहां से MI7, MI8 और HAL-चेतक हेलीकॉप्टर द्वारा आपूर्ति सामग्री एवं सैनिको को ले जाया गया।

कुमाऊं रेजिमेंट की एक पूर्ण बटालियन और लद्दाख स्काउट्स की इकाइयां युद्ध सामग्री के साथ जोजिला दर्रे से होते हुए सियाचिन की ओर बढ़ती हैं और लेफ्टिनेंट-कर्नल डी के खन्ना के आर्डर के अनुसार पैदल ही चलती हैं इसका कारण था पाकिस्तान के रडारों से बचना। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की नजरों से बचने और अपने सैनिकों को सियाचिन के मौसम के अनुकूल बनाने के लिए भारत ने अपने सैनिकों को अंटार्कटिका पर भी भेजा था।

मेजर आर एस संधू के नेतृत्व में आर्मी की पहली यूनिट इतनी ऊंचाई पर भारत के अनुकूल स्थिति स्थापित करती है। कैप्टन संजय कुलकर्णी के नेतृत्व में अगली यूनिट ने बिलाफोंड ला पर भारत का कब्जा करवा दिया। इसके बाद शेष यूनिट्स कैप्टन पी. वी. यादव के नेतृत्व में चार दिन तक चढ़ाई करते गए और साल्टोरो दर्रे की पहाड़ियों को सुरक्षित करने के लिए आगे बढ़े। लगभग 13 अप्रैल तक, तकरीबन 300 भारतीय सैनिकों को महत्वपूर्ण चोटियों पर भारतीय तिरंगा लहरा चुके थे। जब पाकिस्तान के सैनिक इस क्षेत्र ऑपेरशन अबाबील के तहत आये तो उन्होंने पाया कि भारत ने सिया ला, बिलफॉंड ला दरों के सभी तीन बड़े पर्वत पर अधिकार कर लिया है। पाकिस्तान सेना ये देखकर निराश हुई और उन्होंने भारतीय सेना पर हमला कर दिया लेकिन पहले से ऊंचाई पर अच्छी स्थिति में मौजूद भारतीय सेना से मुंह की खाकर वे केवल सलटोरों श्रृंखला के पश्चिमी ढलान पर कब्जा कर पाए।

इसके बाद 1987 तक आते आते भारत ने गिआन ला और पश्चिम सल्टोरो दर्रे सहित सियाचिन ग्लेशियर के सभी कमांडिंग हाइट्स पर नियंत्रण कर लिया। अभी भारतीय सेना लगभग 70 किलोमीटर लंबे सियाचिन ग्लेशियर और इसके सभी उपनदी ग्लेशियरों के साथ-साथ ग्लेशियर, सिआ ला, बिलाफोंड ला, और गियांग ला के पश्चिम में सल्टोरो दर्रे के तीन मुख्य गुटों को नियंत्रित करती है।

लेकिन पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आ जाये तो वो पाकिस्तान ही क्या; 1987 में और 1989 में पाकिस्तान ने भारत द्वारा नियंत्रित दर्रे पर कब्जा करने की कोशिश में हमला किया। पहले हमले का नेतृत्व ब्रिगेडियर-जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने किया था और शुरू में कुछ पहाड़ियों को हासिल करने में पाकिस्तान कामयाब भी हुआ और जीती हुई एक चोटी का नाम रखा गया पाकिस्तान के जन्मदाता ‘कायदे-आजम’ जिन्ना के नाम पर; ये पोस्ट यानि ‘कायदे‘ को भारतीय सेना ने बाना सिंह के नेतृत्व में “ऑपरेशन राजीव” चलाकर अपने कब्जे में ले लिया था। अदम्य शौर्य का प्रदर्शन करने वाले बाना सिंह को परामवीर चक्र भी प्रदान किया गया था। बाद में भारतीय सेना ने इस पोस्ट का नाम “बाना पोस्ट” बाना सिंह के नाम पर रखा, ये पोस्ट दुनियाँ की सबसे ऊंची युद्ध भूमि है। ऑपेरशन राजीव पर मैं अगले पोस्ट में विस्तार से बताऊंगा कि कैसे एक खड़ी चट्टान पर चढ़ाई करके असम्भव से लगने वाले युद्ध को कैसे जीता गया।

ऑपेरशन मेघदूत और ऑपेरशन राजीव में मुंह की खाकर भी पाकिस्तान नहीं माना और 1989 में दूसरा हमला किया। ये हमला भी असफल रहा क्योंकि जमीनी स्थिति में रत्तीभर भी बदलाव नहीं हुआ।

इस क्षेत्र को अपने कब्जे में रखने के लिए भारतीय सैनिक बहुत बड़ी कीमत चुकाते हैं, दैनिक वस्तुओं के लिए भी हवाई सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है। इस क्षेत्र में औसतन बर्फबारी लगभग 35 फीट तक हो जाती है और तापमान -50℃ से भी नीचे चला जाता है। यदि पैर का जूता भी अलग हो जाये तो थोड़ी सी देर में पैर को काटने की नौबत आ जाती है। फेफड़ों में और दिमाग में पानी भर जाता है, ऊंचाई पर होने के कारण धीरे धीरे बीमारियां बढ़ जाती हैं। थकान बढ़ जाती है, भूख लगना बन्द हो जाती है, याददाश्त पर खराब असर पड़ने लगता है और नींद न आने की समस्या हो जाती है। कई बार अवलांचे की वजह से हमारे जवान शहीद हो जाते हैं। ये सारी समस्याएं दौनों ही देशों के जवानों के लिए हैं लेकिन चूंकि भारतीय जवान ज्यादा ऊंचाई पर हैं इसलिए हमारे जवानों की समस्याएं और गम्भीर हैं।

भारत-पाकिस्तान अपने अपने करीब 2700 जवान इसी क्षेत्र में खो चुके हैं। बहुत आसान है, सरकारी पैसों पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुफ्त की रोटी तोड़ते हुए ‘भारत तेरे टुकड़े होंगें’ कहना, बहुत आसान है आतंकी और पत्थरबाजों से दो-दो मोर्चों पर निपटते हुए जवानों पर उंगलियां उठाना, बहुत आसान है विदेशी चंदे पर NGO फंड के नाम पर अपनी जेब भरना और उनके इशारों पर प्रोपेगैंडा चलाना। ये देश के छिपे हुए गद्दारों को समझ में नहीं आएगा कि हमारे जवान अपनी ज़िंदगी कुर्बान करके इस देश की रक्षा करते हैं।

आपको अगर कोई गद्दार विष वमन करता मिले तो भारत माता की सौगंध खाकर उसे वहीं पर यथोचित जबाब दीजिये क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो कथित बुद्धिजीवियों की खाल में छिपे ये गद्दार न जाने कितने भोले भाले लोगों का ब्रेनवाश करके उन्हें भारतीय सेना के खिलाफ खड़ा कर देंगे। यदि हमारी सेना सामरिक तौर पर बाहरी दुश्मन से लड़ रही है तो आप उसके समर्थन में वैचारिक तौर पर अंदर के गद्दारों को सबक सिखाइये। जय हिंद ????✌️

मिलिटी इंटलीजेंस सीरीज के पिछले अंक यहाँ पढ़े

1- मिलिट्री एंड इंटिलजेन्स : भारत की आंख ‘रॉ’ के बारे में आप कितना जानते हैं? जाने कैसे हुआ रॉ का जन्म

2- मोरारजी देसाई की वजह से पाकिस्तान के पास आज है परमाणु बम

3- इंदिरा गांधी की कैबिनेट में कौन था सीआईए एजेंट जिसने की देश के साथ गद्दारी?

4- मिलिट्री इंटलीजेंस (ऑपरेशन कैक्टस) : जब मालदीव में भारतीय सेना ने तख्तपलट की साजिश कर दी थी नाकाम